अब कुछ चाैंकानेवाले फैसले भी लेने चाहिए

Updated at : 13 Nov 2016 7:59 AM (IST)
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अब कुछ चाैंकानेवाले  फैसले भी लेने चाहिए

अनुज कुमार सिन्हा कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री ने अचानक राष्ट्र के नाम संदेश में पांच साै आैर हजार के नाेट काे बंद करने की घाेषणा कर देश-दुनिया काे चाैंका दिया. यह चाैंकानेवाला फैसला था ही. इसी के लिए माेदी जाने जाते हैं. वक्त आ गया है, जब झारखंड सरकार काे भी कुछ चाैंकानेवाले (कुछ कड़े […]

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अनुज कुमार सिन्हा
कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री ने अचानक राष्ट्र के नाम संदेश में पांच साै आैर हजार के नाेट काे बंद करने की घाेषणा कर देश-दुनिया काे चाैंका दिया. यह चाैंकानेवाला फैसला था ही. इसी के लिए माेदी जाने जाते हैं. वक्त आ गया है, जब झारखंड सरकार काे भी कुछ चाैंकानेवाले (कुछ कड़े भी संभव हाें) फैसले लेने चाहिए. दाे दिन बाद झारखंड राज्य का स्थापना दिवस है. झारखंड के लिए पवित्र दिन. इसी दिन भगवान बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था. इसी दिन राज्य का गठन भी हुआ.

स्वाभाविक है, लाेगाें काे इस दिन कुछ उम्मीद (कुछ घाेषणा) रहती है. इस बार भी रहेगी. चाैंकानेवाले फैसले से सरकार झारखंड में चल रही असमंजस की स्थिति काे अपने पक्ष में भी कर सकती है. क्या हाे सकते हैं ये फैसले, यह ताे सरकार का विषय है, सरकार का अधिकार है, सरकार पर निर्भर करता है. वही तय करे, यही उचित हाेगा. पर लाेकतंत्र में राह दिखाने, बिन मांगे सलाह देने में कहां मनाही है? यही ताे लाेकतंत्र की खूबसूरती है.

इसमें बहस की काेई गुंजाइश नहीं है कि सरकार के तमाम प्रयास के बावजूद झारखंड काे जहां हाेना चाहिए था, वहां खड़ा नहीं है. यही सत्य है आैर इस सत्य काे स्वीकारना हाेगा. 16 साल में ऐसे अनेक सरकारें आयीं, जिन्हें इस हालात के लिए बराबर का दाेषी माना जा सकता है. यह वक्त राेने-धाेने का नहीं है, बल्कि ऐसे कदम उठाने का है जिससे बेहतर हालात बने, आपसी विश्वास बढ़े, राजनीतिक मतभेद के बावजूद स्टेट के मुद्दे पर दलाें के स्वर एक हाें, अधिक से अधिक लाेगाें काे राेजगार मिले, सम्मान मिले, सभी के चेहरे पर खुशी चमके. पर यह हाे ताे कैसे? हर कुछ संभव है. झारखंड के आंदाेलनकारियाें के लिए आयाेग ताे बना, पर अपवाद काे छाेड़ दें ताे किसी काे पेंशन नहीं मिली. सरकारी दाव-पेंच में मामला अब तक फंसा हुआ है. इसका बड़ा लाभ आदिवासी-मूलवासी काे ही मिलता. क्या यह संभव नहीं है कि झारखंड आंदाेलन के पुराेधाआें (अगर वे जीवित हैं ताे उन्हें, अगर दिवंगत हैं ताे उनके परिजनाें काे) काे घर पर जाकर सरकार में शीर्ष पदाें पर बैठे लोग सम्मान देकर आते.

इसे एेसे समझिए. शिबू साेरेन, एके राय (अब ताे बेड पर ही रहते हैं) खुद या फिर जयपाल सिंह, एनई हाेराे, विनाेद बिहारी महताे के परिजन (कुछ आैर भी पुराेधा-दिग्गज इनमें हाे सकते हैं) अब जाकर सम्मान का दावा नहीं करेंगे. अगर इन्हें घराें पर सम्मान लेकर काेई पहुंचे, उन्हें प्रदान करें ताे कल्पना कीजिए झारखंड में कैसा माहाैल बनेगा. अगर इनमें से कुछ के पास खुद मुख्यमंत्री चले जायें (ध्यान रखिए िक अटल िबहारी वाजपेयी को भारत रत्न सम्मान देने के िलए परंपरा तोड़ कर खुद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी उनके घर चले गये थे.), ताे सबसे बेहतर हाेगा. सम्मान देकर जिंदगी में बहुत कुछ पाया जा सकता है. अभी ऐसे प्रयास की जरूरत है. बेहतर माहाैल बनेगा. इससे सरकार की प्रतिष्ठा बढ़ेगी, समर्थन बढ़ेगा ही. हाल में खुद मुख्यमंत्री रघुवर दास देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह के साथ बिरसा मुंडा के गांव-घर गये.
क्या उत्साह था, क्या माहाैल था. पूरे गांव के सभी आवासाें काे पक्का करने की घाेषणा का किसने स्वागत नहीं किया था. यह बेहतर पहल थी. राज्य में अब जाकर नियुक्ति हाे रही है. 16 साल में ऐसे बहुत कम अवसर आये. नाैकरी की राह ताकते-ताकते झारखंड के युवा बुजुर्ग हाे चले हैं. नाैकरी की उम्र खत्म हाे गयी. उनका सवाल है-जैसे अब बहाली हाे रही है, वह दस साल पहले हाे जाती, ताे उन्हें नाैकरी मिल जाती. अब बहाली हाे रही है, लेकिन इसका लाभ उन्हें नहीं मिल रहा. बेराेजगार ही मरेंगे, ऐसी टिप्पणी ये बेराेजगार करते हैं.

अगर उनमें याेग्यता है ताे उम्र क्याें आड़े आती है. क्या सरकार (यह बड़ा फैसला हाेगा) यह निर्णय कर सकती है कि 35-40 ही नहीं, झारखंड में 50 साल भी अगर किसी की उम्र है, उसमें याेग्यता है ताे वह सरकारी पद के लिए आवेदन भर सकता है. चयन हाे या नहीं, यह मायने नहीं रखता लेकिन उस व्यक्ति काे यह संताेष हाेगा कि सरकार ने उसे माैका ताे दिया. अगर उसे 50 साल में नाैकरी मिली आैर उसने दस साल भी नाैकरी कर ली ताे उसके खाते में बुढ़ापे के लिए कुछ राशि हाेगी. किसी के आगे हाथ पसारना नहीं पड़ेगा. साेचिए, अगर ऐसे चाैंकानेवाले फैसले हाेते हैं, ताे झारखंड के एक बड़े तबके के चेहरे पर क्या खुशी हाेगी. इसका लाभ ताे भी उसी सरकार काे मिलेगा, जाे ऐसे बाेल्ड निर्णय लेगी. अनेक ऐसे विभाग हैं (अनाैपचारिक शिक्षा, प्राेजेक्ट स्कूल, वन विकास निगम) जहां लंबे समय से काम कर रहे लाेगाें काे हटा दिया गया. जिसने नियम ताेड़ा, जिसने बहाली में नियम काे नहीं माना, उस अफसर का कुछ नहीं बिगड़ा. ये बेचारे अधेड़ उम्र में फंस गये. ऐेसे मामलाें पर बड़े फैसले चाहिए. शिक्षा व स्वास्थय के क्षेत्र में मिशनरी से जुड़े विशेषज्ञाें से राय ली जा सकती है कि कैसे बेहतर तरीके से काम हाे सकता है. ऐसे प्रयासाें से धारणाएं बदलेंगी आैर राज्य काे चलाने में मदद ही मिलेगी. ऐसी बात नहीं कि ये काम नहीं हाे सकते. इसके लिए संकल्प चाहिए. राजनीतिक आैर ब्यूराेक्रैटिक दाेनाें. अफसराें की जिम्मेवारी है कि वे सिर्फ गाेल-गाेल बातें नहीं करें, नियम-कानून बता कर काम फंसाये नहीं, बल्कि रास्ता दिखायें, समाधान बतायें. मुख्यमंत्री जाे कह देते हैं, घाेषणा कर देते हैं, उसे पूरा करने में लग जायें. डाेभा बनाने के आदेश काे छाेड़ दिया जाये ताे बाकी के क्रियान्वयन में अफसराें काे गंभीरता दिखानी हाेगी, क्याेंकि यह मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा से भी जुड़ा हाेता है. मसलन- जब मुख्यमंत्री ने कह दिया कि फ्लाइआेवर (रांची में बननेवाला) का शिलान्यास इस तारीख काे हाेगा, ताे उसे हर हाल में कर देना था. जब मुख्यमंत्री ने रिंग राेड का शिलान्यास कर दिया ताे हर हाल में उस काम काे तेजी से करना था. रांची-टाटा राेड पर बार-बार मुख्यमंत्री ने आदेश दिया कि काम जल्द हाे, लेकिन न ताे ठेकेदार बात सुनता है आैर न ही अफसर इसे गंभीरता से लेते हैं. मुख्यमंत्री ने आदेश कर दिया आैर अस्पताल के लिए जमीन नहीं मिली. या ताे घाेषणा हाे नहीं आैर अगर हाे ताे उसे अफसर पूरा करें. इससे विश्वास बढ़ेगा. ऐसा ही एक मामला है रांची में सदर अस्पताल का, सरकार को इस पर जल्द ही कोई ठोस निर्णय ले लेना चाहिए. हां, हाल में कुछ कड़े फैसले लिये गये हैं. शिक्षक अगर स्कूल में पढ़ाते नहीं हैं, ताे क्याें बढ़ेगा उनका वेतन. करते रहिए हड़ताल.

चार माह तक बच्चाें की पढ़ाई काे बरबाद करनेवाले शिक्षक अपने दिल से पूछें कि क्या उन्हाेंने उचित किया? डॉक्टराें ने भी ताे यही किया था. हड़ताल की धमकी दी. सरकार काे ऐसे मामलों में कड़े फैसले लेने चाहिए, धमकी से भयभीत हुए बगैर. यह संदेश जाना चाहिए. अगर तय कर लें कि स्टेट में सुधार लाना है, ताे कैसे नहीं आयेगा. राजनीतिक हस्तक्षेप अगर नहीं हाे ताे अच्छे अफसर बहुत कुछ कर सकते हैं. राजधानी रांची में तमाम अड़चनाें के बावजूद एक ट्रैफिक एसपी ने सभी काे हेलमेट ताे पहना दिया. यह काम जुनून आैर ऊपर से मिली आजादी से ही हाे सकता है. एक अन्य अफसर हैं राजीव रंजन. सिमडेगा में उन्हाेंने नक्सली घटनाआें से पीड़ित महिलाआें काे एक मंच पर ला दिया. उसी मंच पर नक्सलियाें की पत्नी काे बुला कर पीड़िताें की पीड़ा सुनायी. यह मानवीय संवेदना का अनूठा उदाहरण है. ऐसे प्रयास इस राज्य में अन्य अच्छे अफसर भी कर रहे हैं. इसे आैर बढ़ाने की जरूरत है.

अंत में. यह टिप्पणी सरकार के कामकाज में दखल देने के लिए नहीं है. अच्छे अफसराें के मनाेबल काे बढ़ाने के लिए, राज्य में बेहतर माहाैल बनाने के लिए (ताकि राज्य समृद्ध हाे सके, विकास कर सके), बेराेजगाराें के चेहरे पर भी खुशी लाने के लिए है. राजनीतिज्ञ (चाहे वे सत्ता पक्ष के हाें या विपक्ष के), यह जरूर साेचें कि राज्यहित दलहित से ऊपर हाेता है. इतिहास आपकाे तभी याद करेगा जब आपने कुछ अनूठा किया हाे.

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