कूटनीति की बिसात

Updated at : 14 Sep 2016 6:36 AM (IST)
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कूटनीति की बिसात

अमेरिका, चीन और रूस के परस्पर विरोधाभासी हितों और नये सामरिक संबंधों से दक्षिण एशिया की परिस्थितियों में तेज बदलाव के संकेत हैं. शीत युद्ध के दौर में एक-दूसरे को शक की नजर से देखनेवाले भारत और अमेरिका अब इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव, खासकर साउथ चाइना सी में, के बरक्स अपने रक्षा […]

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अमेरिका, चीन और रूस के परस्पर विरोधाभासी हितों और नये सामरिक संबंधों से दक्षिण एशिया की परिस्थितियों में तेज बदलाव के संकेत हैं. शीत युद्ध के दौर में एक-दूसरे को शक की नजर से देखनेवाले भारत और अमेरिका अब इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव, खासकर साउथ चाइना सी में, के बरक्स अपने रक्षा और व्यापारिक संबंध मजबूत कर रहे हैं.

दूसरी ओर, पाकिस्तान और अमेरिका के पुराने रिश्तों में दरार पड़ने लगी है. ऐसे में पाकिस्तान अब रूस के साथ कई स्तरों पर साझेदारी की संभावनाएं तलाश रहा है. दोनों देश पहली बार साझा सैन्य अभ्यास की तैयारी कर रहे हैं. इसमें अगर कृषि उत्पादों के पाकिस्तान से निर्यात तथा रूस द्वारा अत्याधुनिक लड़ाकू विमान और अन्य रक्षा उपकरणों देने जैसे कारकों को भी जोड़ दें, तो संकेत साफ हैं कि दोनों देशों की निकटता बढ़ रही है. हालिया दिनों में एक तरफ भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा है, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय राजनीति की खींचतान ने अमेरिका और रूस को आमने-सामने ला खड़ा किया है. ऐसे समय में दक्षिण एशिया में भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में वियतनाम के अमेरिका की ओर बढ़ते झुकाव से रूस का चिंतित होना स्वाभाविक है. उधर, साउथ चाइना सी में चीन के दावों को रूसी समर्थन मिल रहा है, तो अमेरिका और भारत इस मामले में चीन के रवैये के विरोधी हैं.

अफगानिस्तान में स्थायित्व और शांति स्थापना के प्रयास में अमेरिका भारत को महत्वपूर्ण सहयोगी मानता है. इस मामले में वह पाकिस्तान पर अधिक भरोसा नहीं कर सकता है. हालांकि, रूस और भारत के पर्यवेक्षकों का मानना है कि नये समीकरणों के उभरने से रूस और भारत के ठोस पारंपरिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना बहुत कम है, पर इससे संतोष नहीं किया जा सकता है.

भू-राजनीति तथा सामरिक परिदृश्य में तेज बदलाव की पृष्ठभूमि में नये कूटनीतिक समीकरणों का बनना स्वाभाविक है. ऐसे में भारत नये संबंधों को मजबूत करने की कोशिश जरूर करे, लेकिन रूस जैसे पुराने और भरोसेमंद सहयोगियों को दरकिनार कर ऐसा करना कतई हितकर नहीं होगा. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की प्रभावी उपस्थिति को सुनिश्चित करने तथा नयी सामरिक चुनौतियों का सामना करने के लिए संतुलित कूटनीतिक पहलों की दरकार है.

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