मोदी के अफ्रीका दौरे के निहितार्थ

Updated at : 11 Jul 2016 12:53 AM (IST)
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मोदी के अफ्रीका दौरे के निहितार्थ

भारतीय प्रधानमंत्री का यह अफ्रीका दौरा उनकी पिछली विदेश यात्राअों की तरह जोशो-खरोश पैदा करता नजर नहीं आ रहा. क्या यह समझा जाये कि हिंदुस्तानियों का मोहभंग उनके अति सक्रिय राजनय से होने लगा है? मंत्रिमंडल के विस्तार तथा विभागों के नाटकीय फेरबदल के बाद तमाम लाल बुझक्कड़ों का ध्यान फिलहाल आंतरिक राजनीति पर ही […]

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भारतीय प्रधानमंत्री का यह अफ्रीका दौरा उनकी पिछली विदेश यात्राअों की तरह जोशो-खरोश पैदा करता नजर नहीं आ रहा. क्या यह समझा जाये कि हिंदुस्तानियों का मोहभंग उनके अति सक्रिय राजनय से होने लगा है? मंत्रिमंडल के विस्तार तथा विभागों के नाटकीय फेरबदल के बाद तमाम लाल बुझक्कड़ों का ध्यान फिलहाल आंतरिक राजनीति पर ही केंद्रित है.

इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि एनएसजी की सदस्यता को जितना तूल दिया गया अौर अंततः ठोस कुछ हाथ लगा नहीं, उससे भी सरकार के मुखिया का करिश्माई प्रभामंडल कम हुआ है. पंजाब के चुनावों की सरगर्मियां अौर दिल्ली सरकार के साथ केंद्र की नोक-झोंक भी हमारा ध्यान बंटाती रही हैं. फिर भी, इन सब विघ्न बाधाअों के बावजूद इस दौरे को जल्दी खारिज नहीं किया जाना चाहिए.

अफ्रीकी महाद्वीप के देशों की यात्रा मोदी किसी अन्य भारतीय प्रधानमंत्री के दस साल बाद कर रहे हैं. इंदिरा गांधी के शासन काल तक दक्षिण अफ्रीका के साथ-साथ केन्या, तंजानिया अौर यूगांडा महत्वपूर्ण समझे जाते थे. जोमो केन्याटा हों या जूलियस न्येरेरे, इनका समाजवादी रुझान नेहरूवादी प्रगतिशीलता का पर्याय समझा जाता था. इस भूभाग में प्रवासी भारतीयों की मौजूदगी को भी राजनयिक दृष्टि से बहुत उपयोगी था. जो अफ्रीकी देश राष्ट्रकुल के सदस्य थे (बर्तानवी साम्राज्य का हिस्सा रहे थे), उनके साथ अंगरेजी भाषा तथा कानूनी प्रणाली के साम्य के कारण सहकार की संभावना बेहतर समझी जाती थी. आज यह सब बातें प्रागैतिहासिक नहीं तो पौराणिक ही लगती हैं.

1970 के दशक में ही मोजाम्बिक अौर अंगोला में सशस्त्र क्रांतिकारिता का दौर उफान पर था अौर नस्लवादी मानसिकता उभरने लगी थी. भारत ने इस ‘निर्णायक’ दौर में अफ्रीका को वह तवज्जो नहीं दी, जिसकी दरकार थी अौर वह इस महाद्वीप से अलग-थलग पड़ गया. राजीव गांधी के शासन काल में (मणिशंकर अय्यर की सलाह से) अफ्रीका फंड स्थापित करने की पेशकश की गयी, पर यूपीए सरकार के आते-आते भूमंडलीकरण की आंधी में अफ्रीका अचानक हाशिये पर पहुंच गया.

आज अफ्रीका हिंदुस्तान को ही नहीं हमारे मुख्य प्रतिद्वंद्वी चीन को भी खाद्य सुरक्षा अौर ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में आकर्षक लगने लगा है. जिन देशों का दौरा मोदी ने हाल में संपन्न किया है, उनमें ऊर्जा सुरक्षा के मामले में कोई नाइजीरिया की बराबरी नहीं कर सकता, परंतु खाद्य सुरक्षा- खासकर दालों के आयात के लिए- मोजाम्बिक की भूमिका को गंभीरता से लिया जाना चाहिए. शायद इसीलिए वहां से ही अफ्रीका अभियान आरंभ हुआ. यह सच है कि कुछ साहसी भारतीय उद्यमी अौर सार्वजनिक क्षेत्र की कुछ इकाइयां अपना कारोबार बढ़ाने की चेष्टा में लगी हैं, पर यह कल्पना करना नादानी ही कहा जा सकता है कि कोई बड़ा बदलाव जल्दी देखने को मिलेगा.

सबसे बड़ी चुनौती दक्षिण अफ्रीका पेश कर रहा है. भारत के प्रति सद्भावना का ज्वार भाटे में बदल चुका है. भारतीय मूल के गुप्ता परिवार की दक्षिण अफ्रीका की राजनीति में दखलंदाजी इधर लगातार सुर्खियों में रही है. स्वयं राष्ट्रपति इस उद्यमी परिवार के साथ गंठजोड़ कर दैत्याकार भ्रष्टाचार को पोसते रहे हैं. अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी इस बारे में चौंकन्नी हैं कि भारतीय उद्यमियों के प्रवेश से उनके स्वार्थों को नुकसान न होने पाये. रंगभेद का अंत हो गया है, पर आज भी दक्षिण अफ्रीका को अश्वेतों का स्वाधीन देश मानना कठिन है. सोने, हीरे, सामरिक महत्व के खनिजों अौर पर्यटन-मेजबानी जैसे कमाऊ धंधों पर गोरों का ही कब्जा है. कहने को यह देश ब्रिक्स में भारत का साथी है, पर हाल के दिनों में इस जमावड़े में उसका रुझान भारत से अधिक चीन की तरफ दिखता रहा है. भारती समूह की एयरटेल कंपनी की बहुचर्चित परियोजना बरसों से गतिरोध का शिकार है. यह चर्चा भी बहुधा होती रही है कि भारतीय दवा निर्माता तथा अॉटो उद्योग के लिए यह बड़ा बाजार है, पर अब तक अनुभव यही दर्शाता है कि यहां भी किसी मरीचिका के पीछे भागने जैसा ही हाल रहा है.

जाहिर है, मोदी इन चुनौतियों से बेखबर नहीं. इनको ध्यान में रख कर ही इस समय इस दौरे को अहमियत दी जा रही है. यह संदेश है चीन के लिए कि हम किसी भी मोर्चे पर उससे पिछड़ने को तैयार नहीं. यह संकेत है अमेरिका के लिए भी कि भारत को ‘दक्षिण एशियाई मंच’ (अफ-पाक मोर्चे पर उलझा कर) बौनी, उपक्षेत्रीय ‘महाशक्ति’ की महत्वाकांक्षा से भटकाया नहीं जा सकता. लाभ-लागत के साथ यह समस्या अवसर-लागत की पड़ताल की भी है.

पुष्पेश पंत

वरिष्ठ स्तंभकार

pushpeshpant@gmail.com

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