असहिष्णुता, असुरक्षा, भय और आतंक

Updated at : 07 Dec 2015 1:06 AM (IST)
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असहिष्णुता, असुरक्षा, भय और आतंक

असहिष्णुता, असुरक्षा, भय और आतंक तभी बढ़ता है, जब हम किसी की ‘कीर्तनमंडली’ में शामिल न हो कर स्वविवेक और तात्कालिकता से चालित होते हैं. क्या भारत में संघ विरोधी, भाजपाविरोधी और मोदी विरोधी को चुप कराया जायेगा? पिछले कुछ महीनों से असहिष्णुता पर जितनी अधिक चर्चा-बहस हो रही है, उससे बहुत-बहुत कम असुरक्षा, भय […]

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असहिष्णुता, असुरक्षा, भय और आतंक तभी बढ़ता है, जब हम किसी की ‘कीर्तनमंडली’ में शामिल न हो कर स्वविवेक और तात्कालिकता से चालित होते हैं. क्या भारत में संघ विरोधी, भाजपाविरोधी और मोदी विरोधी को चुप कराया जायेगा?
पिछले कुछ महीनों से असहिष्णुता पर जितनी अधिक चर्चा-बहस हो रही है, उससे बहुत-बहुत कम असुरक्षा, भय और आतंक हमारी चिंता का विषय रहा है. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी चार-पांच सप्ताह में अब तक पांच बार अपनी चिंता व्यक्त कर चुके हैं. उनका यह कथन एक प्रकार से स्वच्छता-अभियान पर टिप्पणी भी है कि गंदगी बाहर नहीं, हमारे मस्तिष्क में रहती है.

इसलिए मस्तिष्क की सफाई जरूरी है. सवाल यह है कि हमारे मस्तिष्क में गंदगी भरनेवाली और दिमाग को ‘कूड़ेदान’ बनानेवाली शक्तियां कौन हैं और कब से यह गंदगी भरी जा रही है? मस्तिष्क में गंदगी भरने से किसे लाभ प्राप्त होता है? गंदगी मिटाने का कार्य राजनीतिक दलों और सरकारों का है या शिक्षा और संस्कृति का? हमारी शिक्षण संस्थाएं हमारे मस्तिष्क को कितना उर्वर, रचनात्मक, उदार, प्रगतिशील, सामाजिक, नैतिक, विवेकवान, लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक सोच-दृष्टि-संपन्न बना रही हैं?

असहिष्णुता कोई नयी स्थिित नहीं है. राज्यसत्ता, धर्मसत्ता, पुरुष सत्ता तथा सभी सत्ताओं का संबंध कमोबेश असहिष्णुता से रहा है. भारतीय समाज कभी भी पूर्णत: सहिष्णु नहीं रहा है. ब्राह्मणवादी-मनुवादी व्यवस्था में सहिष्णुता के लिए स्थान नहीं था. असहिष्णुता का संबंध वर्चस्व से है. नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के दौर में असहिष्णुता बढ़ी है. जहां तक राजनीतिक दलों का सवाल है, विचारधारा का प्रश्न है, उनमें समान स्तर पर सहिष्णुता नहीं है.

बाबरी से दादरी तक भारतीय राजनीति क्रमश: अधिक असहिष्णु होती गयी है, बाबरी मसजिद ध्वंस (1992) के समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. दादरी घटना के समय उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार है. सरकारें किसी भी दल-विशेष की क्यों न हों, वे उन शक्तियों को निरस्त करने में असफल रही हैं, जो बहुलतावादी भारतीय संस्कृति को व्यवस्थित रूपों में निरंतर क्षतिग्रस्त करती रही हैं. उन्होंने वैसी शक्तियों को बढ़ाया-फैलाया है. कवियों, लेखकों, कलाकारों, फिल्मकारों, वैज्ञानिकों, इतिहासकारों का विरोध बेमानी है? अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा तक भारत की इस वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त कर चुके हैं.

अपने से विपरीत आवाजों को दबाना-कुचलना एक प्रकार की ‘सांस्कृतिक तानाशाही’ की दिशा में बढ़ना है. रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने आिर्थक प्रगति के लिए सहिष्णुता और आदर को आवश्यक माना है. आइआइटी दिल्ली के दीक्षांत भाषण में उन्होंने बीते 31 अक्तूबर को जो कहा है, उस पर कम ध्यान दिया गया है. राजन ने एक साथ नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री रॉबर्ट मर्टन सौलो (1924), भौतिकी के नोबेल पुरस्कार विजेता िरचर्ड फेनमैन (1918-1988), प्रख्यात वैज्ञानिक आइंसटाइन, तंझौर के वृहदेश्वर शैव मंदिर और महात्मा गांधी के साथ मनोविज्ञान के सिद्धांत का भी जिक्र किया, जो सब सहिष्णुता और बहुलतावाद के साथ थे. यह समझना चाहिए कि रॉबर्ट मर्टन सौलो को ‘आर्थिक संवृद्धि के विवेचन’ के लिए जो नोबेल पुरस्कार दिया गया था, वह आर्थिक संवृद्धि क्या एक असहिष्णु समाज और माहौल में संभव है? अर्थशास्त्र में उनका संवृद्धि मॉडल ‘सौलो-स्वान न्यू क्लासिकल ग्रोथ मॉडल’ के नाम से जाना जाता है.

16 मई, 1914 के बाद भारत में स्थितियां पूर्ववत हैं या बदली हुई हैं? इनका बदलाव किस दिशा में है? यह सच है कि देश में असहिष्णुता, असुरक्षा, भय और आतंक का माहौल फिलहाल कम है, पर पिछले डेढ़ वर्ष में भाजपा के विधायक, सांसद, केंद्रीय मंत्री आदि जिस प्रकार के बयान देते रहे हैं और देते जा रहे हैं, वे इस बनते माहौल के पक्ष में हैं या विरोध में? कवि-कलाकार, चिंतक-विचारक, लेखक-बुद्धिजीवी, तर्कवादी-वैज्ञानिक देख रहे हैं कि आकाश में घने बादल छा रहे हैं. निश्चित रूप से इसका विचारधारा और उससे जुड़े राजनीतिक दल से संबंध है.
डॉ आंबेडकर का जिस प्रकार गुणगान किया जा रहा है, उसमें एक बड़ा तथ्य ओझल हो जाता है कि आंबेडकर ‘हिंदुइज्म’ के खिलाफ थे, जबकि सावरकर और गोलवलकर की परिकल्पना में ‘हिंदू राष्ट्र’ था. आरएसएस की असली टकराहट केवल आंबेडकर से है, गांधी-नेहरू-पटेल से नहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संविधान को ‘धर्मग्रंथ’ कहना जनमानस में ‘धर्म’ को और गहरे बैठाना है. मोदी की भाषा के गूढ़ार्थों, निहितार्थों और संकेतार्थों को कम समझा गया है. उनके अनुसार संविधान का जश्न, उत्सव हाेना चाहिए. वे ‘धर्मग्रंथ’ का जश्न मनाने की बात करते हैं. वक्तत्व और कर्तत्व का अंतर समझे बगैर वक्तता और वाक्जाल की सराहना तार्किक क्षमता और शक्ति को नष्ट करना है. अब अगर आज उदय प्रकाश संसद में दिये प्रधानमंत्री के भाषण सुन कर मंत्रमुग्ध हो रहे हैं और यह कह रहे हैं कि भारत के किसी भी प्रधानमंत्री ने अब तक ऐसा भाषण नहीं दिया है, तो उनकी समझ की अवश्य ‘प्रशंसा’ की जानी चाहिए.
क्या जो व्यक्ति सत्ता-व्यवस्था का विराेधी है, भाजपा-संघ िवरोधी है, वह राष्ट्र-विरोधी भी है? लोकतंत्र विरोधी भी है? क्या वह राष्ट्रद्रोही है. असहमति और विरोध-प्रतिरोध की आवाजों पर अंकुश लगानेवाले क्या सचमुच लोकतांत्रिक है? असहिष्णुता, असुरक्षा, भय और आतंक तभी बढ़ता है, जब हम किसी की ‘कीर्तनमंडली’ में शामिल न हो कर स्वविवेक और तात्कालिकता से चालित होते हैं. क्या भारत में संघ विरोधी, भाजपा िवरोधी और मोदी विरोधी को चुप कराया जायेगा? यह असुरक्षा, भय और आतंक के माहौल को बढ़ाना होगा? संघ सांस्कृतिक संगठन है या नहीं है? भारतीय जनसंघ और भाजपा की विचारधारा हिंदू राष्ट्रवाद और हिंदुत्व है. यह दक्षिणपंथी वैचारिक कट्टरता है.

वैचारिक कट्टरता का संबंध असहिष्णुता, असुरक्षा, भय और आतंक से है. यह वैचारिक कट्टरता भारतीय संविधान और लोकतंत्र की विरोधी है. प्रश्न कट्टर राजनीतिक विचारधारा का है. कांग्रेस और वामदलों में यह वैचारिक कट्टरता नहीं थी. ‘‘अत्यधिक ध्रुवीकृत समुदाय परमाणु बम की तरह खतरनाक है.’’ सम्मान लौटानेवाले बेशक कट्टर भाजपा विरोधी थे. उनका विरोध वैचारिक कट्टरता से था. क्या भारत में यह दक्षिणपंथी वैचारिक कट्टरता समाप्त होगी? उम्मीद कम है. यह समय-समय पर रुकने और थमने का आभास भर देती है. जब तक वैचारिक कट्टरता रहेगी, हिंदू राष्ट्र का एजेंडा रहेगा. उससे असहमत लोगों में भय, असुरक्षा और आतंक का माहौल भी बना रहेगा. अनुदार, असहिष्णु ताकतें फिलहाल अधिक नहीं हैं. भारत की जनता ने पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को मात्र 31 प्रतिशत वोट दिये हैं. दोगुनी संख्या अपने विचारों में साफ है. बगीचा तभी सुंदर होता है, जब उसमें सौ तरह के फूल खिले हों.

रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
delhi@prabhatkhabar.in
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