विवेकहीन ताकतों से यह कैसा डर!

Published at :08 May 2015 6:08 AM (IST)
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विवेकहीन ताकतों से यह कैसा डर!

विश्वनाथ सचदेव वरिष्ठ पत्रकार तो क्या भीड़तंत्र के डर के मारे मैंने निताई को सलाह दे दी थी कि वह विवाद बढ़ाने के बजाय विपरीत स्थिति बनने पर चित्र हटा ले? मेरी सलाह व्यावहारिक हो सकती है, पर मुझे इसके औचित्य पर शंका हो रही है. आखिर कब तक हम विवेकहीन ताकतों से डरते रहेंगे? […]

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विश्वनाथ सचदेव

वरिष्ठ पत्रकार

तो क्या भीड़तंत्र के डर के मारे मैंने निताई को सलाह दे दी थी कि वह विवाद बढ़ाने के बजाय विपरीत स्थिति बनने पर चित्र हटा ले? मेरी सलाह व्यावहारिक हो सकती है, पर मुझे इसके औचित्य पर शंका हो रही है. आखिर कब तक हम विवेकहीन ताकतों से डरते रहेंगे?

पिछले दिनों मुङो एक कला-प्रदर्शनी में जाने का मौका मिला था. बंगाल के युवा चित्रकार निताई दास के चित्रों की प्रदर्शनी थी. चटख गहरे रंगों में निताई ने जिस तरह मानव-मन की गहराइयों को चित्रित करने की कोशिश की है, वह दस साल पहले के निताई के काम से अलग एक नया कला-संसार रच रहे थे.

जब मैं लौट रहा था तो निताई ने वह बात बतायी, जो मैं आपने पाठकों के साथ बांटना चाहता हूं. उन्होंने बताया कि गैलरी के प्रबंधकों को उनके कुछ चित्रों से शिकायत है, उन्हें इस बात का खतरा लग रहा है कि कुछ उपद्रवी तत्व इन चित्रों, खासकर एक चित्र, को लेकर गड़बड़ कर सकते हैं. प्रबंधक चाहते थे, वह चित्र प्रदर्शित न किया जाये. अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भावों की निर्मलता के चलते चित्रकार अपनी बात दर्शकों तक पहुंचाना चाहता था. मुङो उस चित्र में कहीं कुछ गलत नहीं लगा था.

मुङो ही नहीं वहां उपस्थित कई प्रबुद्ध लोगों को भी वह चित्र पसंद आया था. वस्तुत: उन सभी चित्रों को देख कर हमारी भावनाएं आहत नहीं हुई थीं. फिर भी मैंने उसे सलाह दी कि यदि उपद्रवी तत्व गड़बड़ी करते हैं, तो वह विवादास्पद चित्र को हटा दे, ताकि लोग बाकी चित्र तो देख सकें.

लेकिन, मैं तबसे एक सवाल से घिरा हुआ हूं, क्या मेरी सलाह सही थी? मुद्दा सिर्फ एक चित्र का नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति के उस अधिकार का है, जिसे जनतांत्रिक व्यवस्था में एक उपलब्धि की तरह देखा जाता है. लेकिन, यहीं सवाल किसी की भावनाओं के आहत होने का भी है. स्वतंत्रता का अधिकार हमें उच्छृंखल होने की आजादी नहीं देता. लेकिन उस सीमा-रेखा को कौन तय करेगा जो किसी स्वतंत्रता को उच्छृंखलता में बदल देती है? इस संदर्भ में कानून से अधिक महत्व व्यक्ति और समुदाय के विवेक का है. हमारा विवेक तय करेगा कि हम सही से गलत के पाले में कब पहुंच जाते हैं!

भावनाओं का सवाल महत्वपूर्ण है, लेकिन भावनाएं तो दोनों पक्षों की होती हैं. रहा सवाल पौराणिक कथाओं अथवा माइथोलॉजी का, तो उस पर भी किसी एक पक्ष का अधिकार नहीं होता. बहरहाल, मुद्दा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का है.

दुनिया भर में इसे लेकर विवाद होते रहते हैं. फ्रांस में कुछ ही अरसा पहले काटरूनों को लेकर उठे विवाद में मामला पत्रकारों की निर्मम हत्याओं पर जा पहुंचा था; दुनियाभर में लेखक उन तत्वों के शिकार होते रहे हैं, जो पौराणिकता पर अपना अधिकार समझते हैं. हमारे अपने देश में अभिव्यक्ति की इस स्वतंत्रता पर अकसर सवाल उठते रहे हैं- किताबों, कला-कृतियों पर बंदिशें लगाने के लिए आंदोलन होते रहे हैं.

कभी किसी हुसैन को देश छोड़ना पड़ता है और कभी किसी मुरुगन जैसे लेखक को घोषणा करनी पड़ती है कि ‘लेखक मुरुगन मर चुका है.’ ये दोनों उदाहरण पीड़ादायक हैं और दोनों ही इस बात के उदाहरण भी हैं कि धार्मिक भावनाओं के आहत होने के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल उठाये जाते हैं और अकसर विवेक पर भावनाएं हावी होती देखी गयी हैं.

प्लेटो ने अपनी पुस्तक ‘दि रिपब्लिक’ में महाकवि होमर के ‘इलियड’ और ‘ओडेसी’ जैसे ग्रंथों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी. उनका तर्क यह था कि होमर के पात्र पाठकों को दिग्भ्रमित कर सकते हैं.

यह ढाई हजार साल पुरानी बात है. हमने पिछले कुछ सालों में किताबों को जलाये जाते देखा है, शोध-संस्थानों में तोड़-फोड़ होती देखी है, रचनाकारों के खिलाफ फतवे जारी होते रहे हैं, नाटकों का प्रदर्शन बाधित किया गया है. ऐसे उदाहरण हमारे जनतंत्र की सार्थकता पर भी सवाल उठाते हैं और यह सोचने के लिए भी बाध्य करते हैं कि हम कितने असहिष्णु या असंवेदनशील होते जा रहे हैं.

सरकारें भी अकसर अपने हितों को देखते हुए सेंसरशिप का सहारा लेती रही हैं. ऐसा सिर्फ आपातकाल में ही नहीं हुआ था. हमने मुंबई जैसे आधुनिक महानगर में बैठी सरकार को ‘इप्टा’ जैसी नाट्य-संस्था पर प्रतिबंध लगाते देखा है और यहीं कुछ तत्वों के दबाव में विश्वविद्यालय को पाठ्यक्रम से पुस्तकें हटाते देखा है. ये उदाहरण समाज और व्यवस्था की असंवेदनशीलता के ही नहीं हैं.

इस तरह के उदाहरण यह भी बताते हैं कि अकसर ऐसे मामलों में विवेक को ताक पर रख कर निर्णय लिये जाते हैं, कार्रवाई की जाती है. ऐसे में जनतंत्र पर भीड़तंत्र हावी होता है. इस तंत्र में विवेक के लिए कोई जगह नहीं होती, जबकि जनतंत्र के मूल में विवेक ही होता है.

तो क्या भीड़तंत्र के डर के मारे मैंने निताई को सलाह दे दी थी कि वह विवाद बढ़ाने के बजाय विपरीत स्थिति बनने पर चित्र हटा ले? मेरी सलाह व्यावहारिक हो सकती है, पर मुझे इसके औचित्य पर शंका हो रही है. आखिर कब तक हम विवेकहीन ताकतों से डरते रहेंगे? डरने की यह स्थिति कब तक बनी रहेगी? और क्यों बनी रहनी चाहिए?

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