आपसी सद्भाव बनाये रखें
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 10 Nov 2019 2:02 AM
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आशुतोष चतुर्वेदी दे श के सबसे बड़े और सबसे पुराने अयोध्या विवाद का शनिवार को अंत हो गया. सुप्रीम कोर्ट में लगातार 40 दिन की सुनवाई के बाद पांच जजों की पीठ ने शनिवार को फैसला सुनाया. अब भारत के सभी लोगों को समझदारी से पेश आना होगा क्योंकि यह फैसला न तो किसी एक […]
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आशुतोष चतुर्वेदी
दे श के सबसे बड़े और सबसे पुराने अयोध्या विवाद का शनिवार को अंत हो गया. सुप्रीम कोर्ट में लगातार 40 दिन की सुनवाई के बाद पांच जजों की पीठ ने शनिवार को फैसला सुनाया. अब भारत के सभी लोगों को समझदारी से पेश आना होगा क्योंकि यह फैसला न तो किसी एक समुदाय की जीत है और न ही किसी दूसरे समुदाय की हार है. भारत के विकास के लिए यह आवश्यक है कि हम आपसी वैमनस्य और द्वेष के दुश्चक्र में न फंसे और अमन व भाईचारा बनाये रखें.
सुप्रीम कोर्ट के सभी जज जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस धनंजय चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर और विशेष रूप से मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई प्रशंसा के पात्र हैं, जिन्होंने लगातार 40 दिनों तक सुनवाई कर इतने लंबे समय से चल रहे विवाद पर फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में विवादित जमीन राम मंदिर के लिए दी है.
दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए अयोध्या में ही किसी उपयुक्त स्थान पर पांच एकड़ जमीन देने का निर्देश राज्य और केंद्र सरकार को दिया है. राम मंदिर निर्माण के लिए कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन महीने के अंदर ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया है. अयोध्या में विवाद की नींव करीब 400 साल पहले पड़ी थी. अदालत की दहलीज तक अयोध्या का मामला 1885 में पहुंचा था.
बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद में निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुबर दास ने 1885 में फैजाबाद की जिला अदालत में पहली बार याचिका दायर की थी. उन्होंने फैजाबाद कोर्ट से बाबरी मस्जिद के पास ही राम मंदिर निर्माण की इजाजत मांगी थी. हालांकि, अदालत ने महंत की अपील ठुकरा दी. इसके बाद से कानूनी दांव-पेच में उलझता ही चला गया. आजादी के 70 साल बाद अब इस विवाद पर फैसला आया है.
इस एक मुद्दे के कारण देश में कई बार अशांति फैली. इस मुद्दे की बुनियाद पर कई सरकारें बनीं और कई सरकारें गिरा दी गयीं, लेकिन विवाद जस-का-तस रहा. हम सभी को सतर्क रहना होगा कि कोई भी व्यक्ति अथवा संगठन इस अवसर का लाभ उठाकर सामाजिक शांति और सद्भाव भंग न करने पाए.
हम देख चुके हैं कि छह दिसंबर, 1992 के बाद देश में सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ा था, जिसका लाभ आतंकवादी संगठनों ने उठाया था और देश में कई स्थानों पर बम धमाके हुए थे. हम सब की यह जिम्मेदारी है कि हर हाल में सांप्रदायिक सद्भाव और भाईचारा बनाये रखें. यह फैसला न तो किसी समुदाय की जीत है, न ही किसी की हार.
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