यही बात कोई और कह देता तो..

Updated at : 10 Jun 2014 12:51 AM (IST)
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यही बात कोई और कह देता तो..

रुसवा साहब ने झल्लाते हुए फोन बंद किया और बोले- आजकल के लड़कों को समझाना हाथी को चड्ढी पहनाने से कम नहीं. ऐसी बेजोड़ मिसाल सुन कर मेरी हंसी छूट गयी. लेकिन वह संजीदा हो गये, ‘‘मियां यह मजाक की बात नहीं है.. तुम तो जानते ही हो कि बड़ा लड़का पुणो में साफ्टवेयर इंजीनियर […]

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रुसवा साहब ने झल्लाते हुए फोन बंद किया और बोले- आजकल के लड़कों को समझाना हाथी को चड्ढी पहनाने से कम नहीं. ऐसी बेजोड़ मिसाल सुन कर मेरी हंसी छूट गयी. लेकिन वह संजीदा हो गये, ‘‘मियां यह मजाक की बात नहीं है.. तुम तो जानते ही हो कि बड़ा लड़का पुणो में साफ्टवेयर इंजीनियर है. जब से वहां से खबर आयी है कि एक लड़के को सिर्फ इसलिए कत्ल कर दिया गया कि वह दाढ़ी-टोपी में था, बेगम साहिबा का रो-रो कर बुरा हाल है.

हठ ठाने बैठी हैं कि लड़के को घर बुला लो, दो पैसे कम कमायेगा, पर आंखों के सामने तो रहेगा. अब तुम्हीं बताओ, ऐसे में बच्चे का कैरियर चौपट हो जायेगा कि नहीं?’’ मैंने कहा, ‘‘मां का दिल है भाई, परेशान तो होगा ही! पर फिक्र मत कीजिए, कुछ दिनों में बात आयी गयी हो जायेगी. खैर, ये बताइए कि आप बेटे को समझा क्या रहे थे.’’ रुसवा साहब ने धीरे से कहा (इस बात का खास ख्याल रखते हुए कि पास में खड़े मुन्ना बजरंगी कहीं सुन न लें), ‘‘भाई, बात जैसी कोई बात नहीं है.

बस मैं उससे इतना कह रहा था कि जब तक माहौल ठीक नहीं हो जाता, खुद को मुसलमान जाहिर न होने दो. दाढ़ी कटवा लो और टोपी जेब में रखो. जब नमाज पढ़नी हो लगा लो, फिर वापस जेब में.’’ मैंने उन पर लानत भेजी, ‘‘बच्चे को आप अच्छी चाल सिखा रहे हैं! देखिए, मुङो तो खुदा-मजहब वगैरह पर ऐतबार नहीं, पर इस बात में यकीन जरूर है कि इनसान अपने अकीदे को जाहिर करने से घबराये नहीं. आप जो हैं सो हैं, उसे छुपाना क्या? 84 के दंगे में सिख दोस्तों की लाशें देख कर भी उतनी तकलीफ नहीं हुई थी जितनी यह देख कर हुई कि कुछ ने केश कटवा लिये. मौत से ज्यादा तकलीफदेह एक इनसान का दूसरे इनसान से डरना और एक दूसरे पर से भरोसा उठ जाना है.’’ रुसवा साहब थोड़ा ङोंप गये, बोले- ‘‘तुम ठीक कह रहे हो. क्या करूं, मैं तो बस रिजवान की अम्मी के दबाव में आ गया था.’’ तभी, हमारी बातों पर कान लगाये बैठे पप्पू पनवाड़ी मुझसे मुखातिब हुए, ‘‘भाई साहब, दूसरों को भाषण देना आसान है. आप खुद अल्पसंख्यक होते, तो समझ पाते कि उसके दिल के किस-किस कोने में कौन-कौन से डर खामोश छिपे रहते हैं जिसकी हवा तक दूसरों को नहीं लगने पाती. वह आपकी तरह बिंदास नहीं बोलता, बल्कि नाप-तोल कर मुंह खोलता है.’’ मैंने कहा, ‘‘आज कुछ ज्यादा ही ऊंचे उड़ रहे हो, जरा साफ -साफ कहो.’’ पप्पू ने कहा, ‘‘अच्छा, इसे एक मिसाल से समङिाए.

रविवार को मोदीजी ने फरमाया कि तिरंगे में जो नीले रंग का चक्र है, उससे नीली क्रांति यानी मछली पालन की प्रेरणा लेनी चाहिए. अब सोचिए, अगर यही बात कोई मुसलमान कह देता, तो क्या होता? लोग उसे विधर्मी, देशद्रोही करार देने लगते- बताइए, कैसा नीच है कि महान अशोक चक्र में इसे मांस-मछली की बात सूझ रही है!’’ वाकई, पप्पू की बात में दम है.

सत्य प्रकाश चौधरी

प्रभात खबर, रांची

satyajournalist@gmail.com

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