सीजफायर का समय उचित नहीं

Updated at : 18 May 2018 6:48 AM (IST)
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सीजफायर का समय उचित नहीं

II अजय साहनी II रक्षा विशेषज्ञ ajaisahni@gmail.com जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने रमजान शुरू होने से लेकर अमरनाथ यात्रा तक के दौरान घाटी में सीजफायर की अपील की थी, जिसे केंद्र सरकार ने मान लिया था. हालांकि, इस सीजफायर में किसी नये ऑपरेशन को नहीं शुरू करना था, लेकिन जवाबी कार्रवाई तो हर हाल […]

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II अजय साहनी II
रक्षा विशेषज्ञ
ajaisahni@gmail.com
जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने रमजान शुरू होने से लेकर अमरनाथ यात्रा तक के दौरान घाटी में सीजफायर की अपील की थी, जिसे केंद्र सरकार ने मान लिया था. हालांकि, इस सीजफायर में किसी नये ऑपरेशन को नहीं शुरू करना था, लेकिन जवाबी कार्रवाई तो हर हाल में करनी ही होती है. फिर भी मैं कहूंगा कि सीजफायर का यह फैसला जरूरी नहीं था, क्योंकि सेना के कामकाज को धार्मिक अवसरों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए.
वहां घाटी में अमन-शांति हो, इस बात से कभी इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन एक राज्य के मुख्यमंत्री की आस्था उसकी व्यक्तिगत आस्था से बिल्कुल अलग होती है.
महबूबा मुफ्ती ने जनता के बीच जिस तरह से इसका एलान या अपील की थी, कि ऐसा होना चाहिए, इसमें किसी तरह का कोई गहरा विचार-विमर्श नजर नहीं दिखता है. जबकि, सीजफायर एक रणनीति का मामला है, ताकि उसका फायदा उठाकर आपको कोई नुकसान न पहुंचाने पाये. इसलिए पहले गंभीरता से विचार करना चाहिए था और पूरी तैयारी के साथ कोई निर्णय लेना चाहिए था.
जब भी कभी सीजफायर का निर्णय लिया जाता है, तो उसके लिए पहले एक ठोस तैयारी होती है और संवेदनशील क्षेत्रों की मौजूदा गतिविधियाें व परिस्थितियों पर विचार-विमर्श किया जाता है, ताकि सीजफायर के उल्लंघन की स्थिति में किसी बड़ी क्षति को टाला जा सके.
सीजफायर के पहले बहुत काम करने की जरूरत होती है. सेना, पुलिस, अलगाववादी संगठन, चरमपंथी आदि से किसी न किसी तरह से बातचीत करनी होती है, उनसे विचार-विमर्श होता है, तब कहीं जाकर सीजफायर का फैसला लिया जाता है. लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं किया गया, सिवाय इसके कि जनता के बीच इसकी घोषणाभर कर दी गयी.
इसके पहले भी महबूबा मुफ्ती ने ऐसे और भी फैसले लिये हैं. मसलन, उन्होंने ही यह बात कही थी कि पत्थरबाजों को छोड़ दिया जाये. बहरहाल, मजे की बात तो यह है कि सीजफायर की घोषणा के बाद इस बात पर चर्चा और बहस शुरू हुई कि सीजफायर होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए.
आस्था या किसी धार्मिक अवसर पर शांति की बहाली की अपील होनी चाहिए, लेकिन इस बात की अनदेखी किये बगैर तो कतई नहीं कि इससे किसी को कोई नुकसान हो.
दरअसल, हमारे देश में जिस तरह का माहौल बना हुआ है, उसमें यह एक समझ बनती दिखती है कि अगर सरकार किसी एक समुदाय को ध्यान में रखकर कोई फैसला लेती है, तो जाहिर है कि उसके खिलाफ कोई बोलना नहीं चाहेगा. मसलन, अगर मैं यह कहूं कि अमुक क्षेत्र में अमन होना चाहिए, लेकिन इसके जवाब में आप कहते हैं कि यह सही कदम नहीं है, तो इसका मतलब यह हुआ कि आप अमन के दुश्मन हो गये. ऐसे में अगर कोई यह कहे कि रमजान में सीजफायर नहीं होना चाहिए, तो लोग उसे हिंसा का समर्थक मान लेंगे.
बस यही बात महबूबा के इस फैसले में नजर आती है और कोई बता नहीं रहा है कि यह फैसला तब तक नहीं लेना चाहिए, जब तक कि ठोस तैयारी के साथ मुस्तैदी न हो. क्योंकि सच्चाई तो यही है कि सीजफायर के बाद भी दुश्मनों के हमले नहीं रुके और न ही आगे ये रुकनेवाले हैं.
इसका मतलब साफ है कि जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री ने बहुत ही बेकार किस्म का राजनीतिक सट्टा खेला है, जिसका कुछ भी फायदा नहीं मिलनेवाला है. क्योंकि इसके पहले जो राजनीतिक तैयारी होनी चाहिए थी, वह कहीं नजर नहीं आ रही है.
अगर आंकड़ों पर गौर करें, तो इस साल पाकिस्तान की तरफ से सीजफायर का उल्लंघन की घटनाएं भी खूब बढ़ी हैं और बीते सालों के मुकाबले ज्यादा बढ़ी हैं. जाहिर है, इन उल्लंघनों को देखते हुए भी गंभीर विचार-विमर्श के बाद किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए था.
किसी राज्य के मुख्यमंत्री के किसी एलान को केंद्र नकारता नहीं है, खास तौर पर ऐसा केंद्र जो हिंदुत्ववाद से जुड़ा हुआ है, वह तो बिल्कुल भी नहीं नकार सकता.
क्योंकि केंद्र को पता है कि अभी वह नकारेगा, तो लोग सरकार को मुस्लिम िवरोधी मानने लगेंगे और उसके लिए यह गलत राजनीतिक कदम जैसा होगा. सीजफायर के ऐलान से पहले यह नहीं सोचा गया कि इसका सेना के चल रहे ऑपरेशनों पर क्या असर पड़ेगा.
यह नहीं सोचा गया कि पहले इस संबंध में अपने दुश्मन से कोई समझौता कर लिया जाये, यह अलग बात है कि हमारे दुश्मन इस बात को मानने से रहे, बल्कि वे तो ऐसे मौके खोजकर अपने हमले तेज करने की फिराक में रहते हैं.
दोनों तरफ से आपसी सहमति-समझौता तो जरूरी है कि इधर से हम कुछ नहीं करेंगे, उधर से आप भी कुछ मत करना. तब कहीं जाकर ही सीजफायर की स्थिति बनती है. और जब वे ऐसे समझौते मानने से रहे, तो फिर हमें ही एकतरफा सीजफायर क्यों करनी चाहिए?
पूरी तरह से यह फैसला एक गैरजिम्मेदाराना फैसला है और इसमें केंद्र को महबूबा मुफ्ती ने फंसा दिया है. लेकिन, केंद्र को भी इस पर राय-मशवरे के साथ गंभीर विचार-विमर्श और तैयारी के बाद ही सीजफायर के फैसले तक पहुंचना चाहिए था.
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