क्योंकि मृत्यु ही अंतिम सत्य है

अंशुमाली रस्तोगी व्यंग्यकार जीवन मिथ्या है. इच्छा भ्रम है. मृत्यु ही अंतिम सत्य है. फिर इच्छा-मृत्यु से क्या घबराना! यों भी, मृत्यु को समझने का कोई फायदा नहीं. मृत्यु तो एक न एक दिन आनी ही है. वह गाना है न- ‘जिंदगी तो बेवफा है एक दिन ठुकरायेगी…’ तो जो ठुकरा दे, उससे मोह पालना […]
अंशुमाली रस्तोगी
व्यंग्यकार
जीवन मिथ्या है. इच्छा भ्रम है. मृत्यु ही अंतिम सत्य है. फिर इच्छा-मृत्यु से क्या घबराना!
यों भी, मृत्यु को समझने का कोई फायदा नहीं. मृत्यु तो एक न एक दिन आनी ही है. वह गाना है न- ‘जिंदगी तो बेवफा है एक दिन ठुकरायेगी…’ तो जो ठुकरा दे, उससे मोह पालना बेकार है.
सच बताऊं, मुझे तो बड़ी कोफ्त होती है लोगों के जीवन, मृत्यु, मूर्ति के प्रति भीषण आसक्ति देख-सुनकर.अभी हाल इच्छा-मृत्यु पर फैसला क्या आया, लोग भिन्न-भिन्न कोणों से चिंतित होते हुए दिखने लगे हैं. अमां, इच्छा-मृत्यु पर क्या चिंतित होना? मृत्यु तो आनी है. चाहे इच्छा से आये या बे-इच्छा. जब भीष्म पितामह मृत्यु से पार न पा पाये, तो हम-आप किस खेत की मूली हैं बंधु!
खुदकुशी से कहीं बेहतर विकल्प है इच्छा-मृत्यु. खुदकुशी की अपनी दिक्कतें हैं. हर किसी में इतना साहस होता भी नहीं कि अपनी जान की बाजी फ्री-फंड में लगा दे. जो लगा देते हैं वे ‘कायर’ हैं. लेकिन इच्छा-मृत्यु का तो सीन ही बिल्कुल अलग है. बस मृत्यु के प्रति आपको अपनी इच्छा जाहिर करनी है.
आपको एहसास भी न होगा कि कब इस दुनिया-ए-फानी से रुखसत हो लिये. न किसी से चिक-चिक न किसी से हुज्जत. अपनी मौत, अपनी मर्जी.
मैंने तो अपनी इच्छा पत्नी को बतला भी दी है कि मुझे मेरे अंत समय में इच्छा-मृत्यु ही चाहिए. मैं किसी का एहसान लेकर मरना नहीं चाहता. न पत्नी से अपने लिए सेवा-टहल करवाना चाहता हूं. न यमराज को कष्ट देना चाहता हूं कि वे धरती पर मुझे लेने आएं. उनकी जान को छत्तीस काम रहते हैं. वे उन्हें निबटाएं. अंततः इससे टाइम उन्हीं का बचना है.
अधिक मशहूर होकर मरना भी कम मुसीबतों से भरा नहीं. लोग इस कदर आस्थावादी हैं कि इधर मशहूर बंदा खिसका नहीं, उधर तुरंत उसकी मूर्ति बनाके खड़ी करी दी. समाज में मूर्तिपूजा का क्या कम बोलबाला है, जो मूर्ति पर मूर्तियां तैयार होती रहती हैं.
किसी सरफिरे ने मूर्ति के साथ अगर छेड़खानी या मार-तोड़कर दी, तो अलग झाड़.इसलिए जीवन में मैंने इस बात का खास ख्याल रखा है कि मशहूर न होने पाऊं. मैं तो कहता हूं, ये मूर्ति-फूर्ति, जीवन-मोह आदि सब क्षणिक हैं. अंतिम सत्य है मृत्यु ही. और अगर इच्छा-मृत्यु है, तो सोने पे सुहागा.
इच्छा-मृत्यु का अनुभव मैं भी लेना चाहता हूं. सुख-सुविधा से इतर कुछ डायरेक्ट अनुभव भी जीवन में जरूर लेने चाहिए, ताकि ऊपर वाले को भी हमसे यह शिकायत न रहे कि हम धरती पर केवल सुख ही भोगकर आये हैं.
जिन्हें इच्छा-मृत्यु में खामियां तलाशना है, वे शौक से तलाशें. खाली आदमी कुछ तो करेगा, यह ही सही.फिलहाल मुझे तो अंतिम सत्य (मृत्यु) को जानना है और वह मैं इच्छा-मृत्यु के बहाने जानकर रहूंगा.
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