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siwan

  • Aug 13 2019 11:53AM
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बहन की अस्मिता के लिए भाई ने दी थी जान, अब भाई-बहन के प्रेम का अमर संदेश दे रहा भीखाबांध का मंदिर

बहन की अस्मिता के लिए भाई ने दी थी जान, अब भाई-बहन के प्रेम का अमर संदेश दे रहा भीखाबांध का मंदिर
भीखाबांध स्थित मंदिर.

ब्रजेश कुमार @ दरौंदा, सीवान

भाई-बहन के प्रेम के किस्से तो बहुत हैं. लेकिन, सीवान जिले में भाई-बहन के प्रेम की पूजा के लिए एक मंदिर बनाया गया है, जहां रक्षाबंधन के दिन श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है. भाई-बहन के प्रेम के प्रतीक के रूप में यहां स्थित एक खास पेड़ में भी राखी बांधी जाती है. बहनें यहां राखी चढ़ा कर भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं. दरौंदा प्रखंड के भीखाबांध गांव  स्थित यह मंदिर 'भैया-बहनी' के नाम से जाना जाता है. यूं तो सालों भर यहां श्रद्धालु पूजा कर मन्नतें मांगते हैं. लेकिन, श्रावण, पूर्णिमा और भाद्र शुक्ल पक्ष अनंत चतुर्दशी के दिन सीवान, सारण, गोपालगंज, पश्चिमी और पूर्वी चंपारण, पटना आदि जिलों के अलावा और झारखंड से भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु आकर पूजा-अर्चना करते हैं और मन्नते मांगते हैं.

क्या है मंदिर का इतिहास

लोक कथाओं के मुताबिक, मुगल शासनकाल में एक व्यक्ति अपनी बहन की रक्षा के दो दिन पूर्व उसकी ससुराल भभुआ से विदा कराकर घर ले जा रहा था. भीखाबांध के समीप मुगल सैनिकों की नजर उन पर पड़ गयी और मुगल सिपाहियों की नीयत खराब हो गयी. वे डोली को रोक कर बहन के साथ बदतमीजी करने लगे. इसके बाद मुगल सिपाहियों से बहन को विदा करा कर आ रहा भाई भिड़ गया. सिपाहियों की संख्या अधिक होने के कारण भाई अकेला और कमजोर पड़ गया. मुगल सिपाहियों ने उसे मार डाला.


बहन खुद को असहाय देख कर भगवान को पुकारने लगी. कहा जाता है कि अचानक धरती फटी और दोनों धरती के अंदर चले गये. डोली लेकर चल रहे चारो कहार भी बगल के कुएं में कूद कर अपनी जानें दे दी थीं. कहते हैं कि जहां भाई-बहन धरती में समाये थे. वहीं, दो बरगद के पेड़ उग आये. दोनों वट वृक्ष ऐसे हैं कि देखने में ऐसा प्रतीत होता है कि भाई अपनी बहन की रक्षा कर रहा है. वटवृक्ष अब करीब पांच बीघा जमीन में फैल गया है. उस स्थान पर पहले मिट्टी का मंदिर बनवाया गया था. इसके बाद जैसे-जैसे मंदिर का महत्व बढ़ने पर श्रद्धालुओं ने मंदिर का पक्का निर्माण कराया. यह आज भाई-बहन के प्रेम का केंद्र बन गया है.


अतिक्रमण का शिकार हुआ मंदिर परिसर

मंदिर के लिए आज तक कोई पूजा समिति नहीं गठित की गयी है. ना ही इसके बचाव की कोई पहल की गयी है. इस ऐतिहासिक मंदिर परिसर में कभी छह बीघे में फैले वटवृक्ष अब कुछ कट्ठे में सिमट गया है. भूमि पर मकान आदि बनाकर अतिक्रमण किया जा रहा है.


रक्षाबंधन के दिन जुटते हैं श्रद्धालु

यह एक तरह से बलिदान स्थल है. इस स्थान के प्रति लोगों की अटूट आस्था है. पूजा के वक्त यहां काफी भीड़ लगती है. लोगों की मान्यता है कि यहां मन्नत मांगने से पूरी होती है. रक्षाबंधन के दिन यहां पेड़ में भी राखी बांधी जाती है. बहनें यहां राखी चढ़ा कर अपने भाइयों की कलाइयों में बांधती है.



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