ताइवान में साई इंग-वेन ने दोबारा जीता चुनाव, चीन को झटका

By Prabhat Khabar Digital Desk
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साइ इंग-वेन ताइवान में दोबारा राष्ट्रपति चुनी गई हैं.

ताइवान की राष्ट्रपति इंग-वेन ने आम चुनाव में ज़ोरदार जीत के साथ दूसरा कार्यकाल हासिल कर लिया है.

साई इंग विन को आम चुनाव में 57 प्रतिशत से ज़्यादा मत मिले हैं, उन्हें रिकॉर्ड स्तर पर 82 लाख मत प्राप्त हुए. इतने मतों के साथ उन्होंने कुओमिनटांग पार्टी के खान ग्वो यी को बहुत पीछे छोड़ दिया.

साई इंग-वेन की जीत, दुनिया के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि वह चीन के साथ नज़दीकी संबंधों का विरोध करती आई हैं.

अपनी जीत के बाद उन्होंने एक बार फिर से चीन को ताइवान पर काबिज होने के विचार को रद्द करने को कहा है.

उन्होंने संवाददाता सम्मेलन में कहा, "ताइवान ने दुनिया को दिखाया है कि हम अपनी स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के चलते अपने देश को कितना सेलिब्रेट करते हैं."

अमरीका ने साई की जीत पर ख़ुशी जताई है और कहा कि यह जीत से लोकतांत्रिक व्यवस्था के हक़ में है. अमरीकी विदेश मंत्रालय ने कहा, 'साई के दूसरे कार्यकाल में ताइवान और अमरीका के रिश्ते और मज़बूत होंगे. हम लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और लोगों की ख़ुशहाली के लिए साथ मिलकर काम करेंगे.'

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चीन पर साई की दो टूक

साई इंग-वेन ने इसी महीने कहा था कि वो चीन के 'एक देश, दो व्यवस्था' वाले प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेंगी.

चीन ने ताइवान के सामने यह राजनीतिक फॉर्मूला पेश किया था, जिसे ताइवान ने ख़ारिज कर दिया है. ताइवान का कहना है कि यह फॉर्मूला हॉन्ग कॉन्ग में पूरी तरह से नाकाम हो गया है, ऐसे में इसे स्वीकार करने का सवाल ही पैदा नहीं होता है. ताइवान के चुनावी कैंपेन में चीन का डर सबसे बड़ा मुद्दा था. चीन शासित हॉन्ग कॉन्ग में महीनों से चल रहे सरकार विरोधी प्रदर्शन के कारण ताइवान के चुनाव में 'चीन का डर' बड़े मुद्दे के तौर पर उभरकर सामने आया था.

चुनावी कैंपेन में साई ने कहा था, "हॉन्ग कॉन्ग के लोगों ने हमें बता दिया है कि 'एक देश, दो व्यवस्था' निश्चित तौर पर नाकाम फॉर्मूला है."

हॉन्ग कॉन्ग ब्रिटिश उपनिवेश था, जिसे ब्रिटेन ने 1997 में स्वतंत्रता के कुछ ख़ास प्रावधानों के बदले चीन के हवाले कर दिया था.

साई ने कहा, "हॉन्ग कॉन्ग में 'एक देश, दो व्यवस्था' के तहत हालात दिन-ब-दिन बदतर हो रहे हैं. चीन ने शक्ति का दुरुपयोग करते हुए 'एक देश, दो व्यवस्था' की विश्वसनीयता को संदिग्ध बना दिया है. ऐसे में इसे स्वीकार करने का सवाल ही पैदा नहीं होता है."

हॉन्ग कॉन्ग में महीनों से चीन की सरकार विरोधी प्रदर्शन चल रहे हैं. चीन इसे नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है. हॉन्ग कॉन्ग में चीन विरोधी प्रदर्शनकारियों का कहना है कि स्वायत्तता के प्रावधान के बावजूद चीन इसका उल्लंघन कर रहा है. ताइवान की संसद ने एक जनवरी को चीन के ख़तरे को देखते हुए एंटी-इन्फिल्ट्रेशन लॉ पास किया था. इस क़ानून के पास होने के बाद से ताइवान और चीन में तनाव चरम पर है.

साई का कहना है कि इस क़ानून से ताइवान के लोकतंत्र की रक्षा होगी. उन्होंने यह भी कहा था कि इससे चीन से कारोबारी संबंध प्रभावित नहीं होगा. चीन को संदेह है कि साई की डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी ताइवान को औपचारिक रूप से स्वतंत्र देश बनाने को लेकर काम कर रही हैं और उसने धमकी दी है कि अगर ज़रूरत पड़ी तो ताइवान की सरकार के ख़िलाफ़ बल का इस्तेमाल किया जा सकता है.

हालांकि साई ने स्वतंत्रता की बात से इनकार किया है और उन्होंने इस बात को दोहराया कि वो चीन के साथ यथास्थिति को एकतरफ़ा होकर बदलना नहीं चाहती हैं.

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ताइवान और चीन का विवाद

चीन 1949 में गृह युद्ध की समाप्ति के बाद से ही ताइवान पर अपना दावा करता आया है.

एक ओर जहां ताइवान ख़ुद को स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र मानता है, वहीं चीन का मानना है कि ताइवान को चीन में शामिल होना चाहिए और फिर इसके लिए चाहे बल प्रयोग ही क्यों न करना पड़े.

साई ने चुनावी जीत के बाद ताइपे में कहा है, "चीन को अपनी सेना की धमकी देना बंद करना चाहिए."

उन्होंने यह भी कहा, "मुझे उम्मीद है कि बीजिंग प्रशासन, यह समझेगा कि ताइवान और यहां की चुनी हुई सरकार किसी तरह के ख़तरे और धमकाने के दबाव में नहीं आएगी."

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साई इंग-वेन की वेबसाइट के मुताबिक़ वो मौजूदा प्रणाली और तरीक़ों को ही बनाए रखना चाहती हैं. वो ताइवान की स्वतंत्रता से समझौता नहीं करना चाहतीं.

पिछले साल जून में हॉन्ग-कॉन्ग विरोध प्रदर्शनों के दौरान उन्होंने कहा था, 'जो भी ताइवान की संप्रभुता और लोकतंत्र को कमज़ोर करने या राजनीतिक सौदेबाजी के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश करेगा, वो असफल हो जाएगा.'

वो हॉन्ग-कॉन्ग की तरह 'एक देश, दो सिस्टम' की राजनीतिक व्यवस्था को भी ख़ारिज करती हैं. उनका कहना है कि ये अब बेकार है.

इस हफ़्ते बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि ताइवान को हॉन्ग-कॉन्ग से सबक लेना चाहिए. अगर हम ज़ोर नहीं देंगे (ताइवान की स्वतंत्रता बनाए रखने पर) तो जो कुछ भी हमारे पास है, उसे खो देंगे.

63 साल की साई इंग विन राजनीति में आने से पहले प्रोफ़ेसर रही हैं. उन्होंने अमरीका में कॉरनल यूनिवर्सिटी, लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स और ताइवान में पढ़ाई की है.

उन पर संभ्रात होने के आरोप लगते रहे हैं लेकिन समलैंगिक विवाह, भाषाई अधिकार और अन्य मुद्दों ने उन्हें युवा मतदाताओं के बीच समर्थन दिलाया है.

ताइवान का स्टेट्स

जिसे हम चीन कहते हैं उसका आधिकारिक नाम है 'पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना' और जिसे ताइवान के नाम से जानते हैं, उसका अपना आधिकारिक नाम है 'रिपब्लिक ऑफ़ चाइना.' दोनों के नाम में चाइना जुड़ा हुआ है.

'पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना' और 'रिपब्लिक ऑफ़ चाइना' एक-दूसरे की संप्रभुता को मान्यता नहीं देते. दोनों ख़ुद को आधिकारिक चीन मानते हुए मेनलैंड चाइना और ताइवान द्वीप का आधिकारिक प्रतिनिधि होने का दावा करते रहे हैं.

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चीन किसी भी उस देश के साथ राजनयिक संबंध नहीं रखता जो ताइवान को एक स्वतंत्र देश की मान्यता देता है.

बहुत कम देश हैं जो ताइवान को स्वतंत्र देश का दर्जा देते हैं हालांकि, कई देशों के ताइवान के साथ व्यापारिक संबंध ज़रूर हैं.

साई की जीत के मायने क्या हैं?

ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग विन के लिए 80 लाख से ज़्यादा वोट हासिल करना असाधारण कामयाबी है. उन्हें एक तरह से अपार बहुमत मिला है और दूसरी तरफ़ यह चीन के लिए बड़ा झटका है.

इस चुनाव में हमने देखा है कि चीन के साथ ताइवान का संबंध अहम मुद्दा बनकर उभरा और इसका पूरा फ़ायदा साई इंग विन को मिला.

हालांकि उनकी जीत में एक निश्चित राजनीतिक विडंबना भी शामिल है.

दरअसल, ताइवान की जनता ने एक तरह से बीजिंग के अधिनायकवादी दृष्टिकोण और विस्तृत चाइना की अवधारणा को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया है.

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने ताइवान पर दबाव नहीं बनाया होता, हॉन्ग कॉन्ग की समस्या के निदान के लिए कहीं ज़्यादा समझदारी दिखाई होती तो साई की जीत इतनी ज़ोरदार नहीं होती.

बहरहाल, नतीजे आने के बाद बीबीसी ने साई से पूछा कि क्या वो अपनी जीत का श्रेय चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को देंगी?

इसके जवाब में वो मुस्कुराने लगीं.

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