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खूंखार माओवादी गणपति करेगा सरेंडर ! बड़ी नक्सली घटनाओं को दे चुका है अंजाम

देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बने माओवादी गणपति के सरेंडर करने की खबरें आ रही है. विभिन्न रिपोर्ट से प्राप्त जानकारी के अनुसार वो जल्द ही आत्मसर्पण कर सकता है. उसके सरेंडर के लिए उसकी और सरकार के बीच हो रही बातचीत का यह अंतिम चरण चल रहा है. बताया जा रहा है कि लंबी बीमारी के कारण गणपति ने आत्मसमर्पण करने का फैसला किया है.

देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बने माओवादी गणपति के सरेंडर करने की खबरें आ रही है. विभिन्न रिपोर्ट से प्राप्त जानकारी के अनुसार वो जल्द ही आत्मसर्पण कर सकता है. उसके सरेंडर के लिए उसकी और सरकार के बीच हो रही बातचीत का यह अंतिम चरण चल रहा है. बताया जा रहा है कि लंबी बीमारी के कारण गणपति ने आत्मसमर्पण करने का फैसला किया है.

बताया जा रहा है कि माओवादी गणपति के सरेंडर के पीछे तेंलगाना पुलिस ने बड़ा रोल निभाया है. अंग्रेजी वेबसाइट न्यूज 18 की खबर के मुताबिक केंद्र सरकार भी इसके लिए तैयार है. गणपति सीपीआई (माओवादी) का पूर्व नेता और पूर्व सचिव रह चुका है. उसका पूरा नाम मुपल्ला लक्ष्मण राव है. बताया जा रहा है कि 71 वर्षीय गणपति ने बीमारी के कारण दो वर्ष पहले ही पार्टी से इस्तीफा दे दिया था.

नाम नहीं बताने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया कि गणपति शीर्ष माओवादी नेता था. उसके ऊपर महाराष्ट्र ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ बिहार समेत केंद्रीय एंजेसिंयो ने ढाई करोड़ रुपये का इनाम रखा था. गणपति हमेशा अपने विश्वसनीय लोगों की सुरक्षा घेरा में रहता था. जिसमें सात से 70 लोगों का हथियार से लैस दस्ता रहता था. उसने पास मुखबिरों की अपनी फौज भी थी.

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हालांकि गणपति के आत्मसमर्पण की खबरों को खारिज करते हुए अब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने एक बयान जारी किया है. सीपीआई (एम) की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि गणपति गणपति उनके वरिष्ठ नेता हैं और वो कभी भी पुलिस के सामने आत्मसमर्पण नहीं करेंगे. बयान में कहा गया है कि केंद्र और छत्तीसगढ़ सरकार इस तरह की खबरों को मीडिया में प्लांट करवा रही हैं. इसका मकसद उनके आंदोलन को बदनाम करना है.

माओवादी गणपति ने 1995 में डीएसपी समेत 25 पुलिसकर्मियों को एक वैन में उड़ाकर पहला बड़ा हमला किया था. इस हमले में उन सभी पुलिसकर्मियों की मौत हो गयी थी. इसके बाद उसने वर्ष 2006 में सलवा जुड़ूम अभियान का विरोध करते हुए अपने सहयोगियो के साथ मिलकर बस्तर के एराबोर इलाके में 35 आदिवासियों की बेरहमी से हत्या कर दी थी. वर्ष 2006 में ही उसने उपलेटा कैंप में 22 पुलिसकर्मियों की हत्या की थी और 14 नागा सैनिकों को ले जा रहे एक वैन का उड़ा दिया था. वर्ष 2008 में उसने सीआईएसएफ के हिरोली माइंस कैंप पर हमला किया जिसमें आठ जवान मारे गए थे.

पेशे से शिक्षक गणपति बड़े आंदोलन में विश्वास रखता था. उसने उत्तर पूर्व में विद्रोहियों के समूहों के साथ संपर्क स्थापित किया. इसके अलावा श्रीलंका में लिट्टे के साथ और फिलीपींस जैसे अन्य देशों में विद्रोही समूहों के साथ उसने संपर्क स्थापित किया था. जिससे उसे राशन और हथियार प्राप्त करने में मदद मिलती थी.

Posted By : Pawan Singh

Prabhat Khabar Digital Desk
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