क्या सोनिया गांधी के नये राजनीतिक उदय से भाजपा को सावधान हो जाना चाहिए?
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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राहुल सिंह सोनिया गांधी का हाल के दिनों में नया राजनीतिक उदय हुआ है. सामान्यत: आपके प्रतिद्वंद्वी ही आपके दौड में आगे या पीछे होने के बडे कारक होते हैं. यही स्थिति सोनिया गांधी की भी है और नरेंद्र मोदी की भी थी. भूमि अधिग्रहण विधेयक के मौजूदा स्वरूप के प्रति नरेंद्र मोदी सरकार के […]
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राहुल सिंह
सोनिया गांधी का हाल के दिनों में नया राजनीतिक उदय हुआ है. सामान्यत: आपके प्रतिद्वंद्वी ही आपके दौड में आगे या पीछे होने के बडे कारक होते हैं. यही स्थिति सोनिया गांधी की भी है और नरेंद्र मोदी की भी थी. भूमि अधिग्रहण विधेयक के मौजूदा स्वरूप के प्रति नरेंद्र मोदी सरकार के संकल्प ने ही सोनिया गांधी को नया राजनीतिक बढत हासिल करने का मौका दिया है.
लगता है कि कांग्रेस के बडे नेताओं का वह आग्रह काम कर गया कि सोनिया गांधी फिलहाल सक्रिय राजनीति के पटल से ओझल नहीं हों और पूर्व की तरह सक्रियता से पार्टी का कामकाज संभालती रहें. सोनिया ने पिछले दो तीन सालों से अपनी राजनीतिक सक्रियता को धीरे धीरे कम करना शुरू किया था. इसका कारण था राहुल को कांग्रेस के सर्वमान्य व निर्विवाद नेता के रूप में स्थापित करना. पर, लगता है कि उनकी यह रणनीति सफल नहीं हो सकी. इसलिए सूत्रों के हवाले से ही अब यह खबर आ रही है कि राहुल गांधी को अप्रैल अधिवेशन में अध्यक्ष की जिम्मेवारी नहीं दी जायेगी. चर्चा है कि अब उन्हें अगले साल के आरंभ में पार्टी अध्यक्ष की जिम्मेवारी दी जायेगी.
सडक यात्र और किसानों से मिलने का कार्यक्रम
सोनिया गांधी ने पिछले एक पखवाडे में अपने राजनीतिक जीवन की दूसरी पारी शुरू की है. पखवाडे भर पहले तो यह दृश्य नजर आ रहा था कि सोनिया गांधी राजनीति के रंगमंच से नेपथ्य की ओर बढ रही हैं. लेकिन, घरेलू व बाहरी मोर्चो से लगातार पार्टी को मिल रहे दर्द के बाद सोनिया का ममत्व जग गया है. वे नेपथ्य की ओर से अपना कदम घुमा ली हैं और रंगमंच पर बिल्कुल सामने आ खडी हुई हैं. डॉ मनमोहन सिंह की अदालत में पेशी संबंधी अदालती आदेश के बाद उनके समर्थन में कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड से डॉ सिंह के आवास मोतीलाल नेहरू मार्ग तक पैदल मार्च और फिर उसके बाद भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर संसद से राष्ट्रपति भवन तक 14 दलों का नेतृत्व करते हुए पैदल मार्च करना यही सूचित करता है. सोनिया तो अब किसानों से मिलने के लिए देश भ्रमण पर निकल चुकी हैं. शुक्रवार को वे राजस्थान के कोटा में किसानों से मिलीं और शनिवार को वे हरियाणा में किसानों से मिल रही हैं. लोगों का आकर्षण भी साफ दिख रहा है. सोनिया किसानों से बेमौसम बारिश से हुई फसल बर्बादी का हाल पूछ रही हैं, उनका दर्द जान रही हैं. क्या सोनिया का यह अवतार नरेंद्र मोदी सहित पूरे सत्तापक्ष के लिए चिंता की बात नहीं होनी चाहिए?
पुराने नेताओं की बढी सक्रियता और गैरभाजपावाद
जब कोई पार्टी सबसे मजबूत स्थिति में होती है, तभी उसके विरोध पर केंद्रित राजनीति की शुरुआत होती है. 2014 से पहले तक देश में गैरकांग्रेसवाद की राजनीति होती थी, लेकिन 2014 में मोदी के नेतृत्व में भाजपा की करिश्माई जीत के बाद देश में गैर भाजपावाद की राजनीति शुरू हो गयी है. वे दल भी जो हमेशा कांग्रेस के विरोधी रहे आज कांग्रेस के आसपास खडे नजर आते हैं. सोनिया और कांग्रेस आज देश में गैर भाजपावादी राजनीति की धुरी हैं. सोनिया की इस नयी सक्रियता से कांग्रेस के पुराने नेताओं में भी नयी जान आयी है. पिछले दिनों कांग्रेस में भाजपा की तरह पीढीगत बदलाव होता दिख रहा था, लेकिन अब कुछ समय के लिए लगता है, इस पर विराम लग गया है. एके एंटोनी, अंबिका सोनी, गुलाम नबी आजाद, दिग्विजय सिंह, कमलनाथ जैसे कद्दावर नेता सोनिया के नेतृत्व में नये सिरे से सक्रिय होते दिख रहे हैं.
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सोनिया के राष्ट्रपति भवन मार्च के दौरान तमाम समाजवादी नेता भी उनके साथ खडे नजर आये. यह संकेत है कि उन्हें भविष्य में सोनिया के नेतृत्व से परहेज नहीं है.
क्या भाजपा को चिंतित होना चाहिए?
केंद्र में प्रबल बहुमत के साथ भाजपा की सरकार बनने के बाद भाजपा अध्यक्ष की दो टिप्पणियां बेहद अहम हैं. एक, उनकी अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकारोक्ति की मोदी लहर अब कम हुआ है, दूसरा काला धन को तुरंत वापस लाना एक चुनावी जुमला था. उनकी दूसरी टिप्प्णी पर देश की राजनीति में व्यापक प्रतिक्रिया हुई है. उसके बाद भूमि विधेयक के मौजूदा स्वरूप पर भाजपा की जिद ने सुस्त पडी कांग्रेस को बैठे बिठाये एक बडा मुद्दा दे दिया. जो कांग्रेस हांफती और पस्त दिख रही थी, उसमें एक नयी जान आ गयी है. याद कीजिए 1997 से 1999 के बीच सोनिया का सक्रिय राजनीति में भी इसी तरह आगमन और फिर उदय हुआ था. वह समय कांग्रेस के लिए बेहद बुरा दौर था, जिससे सोनिया ने अपने दादा ससुर, सास व पति की पार्टी को बडी कुशलता से बाहर निकाल लिया था. उस समय पार्टी में कोई सर्वमान्य नेता नहीं था. तब भ्रमित कांग्रेस ने हाथों हाथ सोनिया का नेतृत्व स्वीकार किया और कुछ ही वर्षो बाद पार्टी को दस साल तक देश पर शासन करने का मौका मिला. इसलिए भाजपा को अपनी एनडीए वन सरकार के पतन और सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस के पुराने उदय से चिंतित तो नहीं कम से कम चौकन्ना तो जरूर होना ही चाहिए. क्या पता इतिहास फिर से खुद को दोहरा दे और भाजपा के सावधान होने तक बहुत देर हो जाये!
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