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बकाया राशि का भुगतान नहीं कर पाई ये टेलीकॉम कंपनियां, जानिए उपभोक्ताओं पर क्या होगा असर

Updated at : 15 Feb 2020 12:39 PM (IST)
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बकाया राशि का भुगतान नहीं कर पाई ये टेलीकॉम कंपनियां, जानिए उपभोक्ताओं पर क्या होगा असर

नयी दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद केंद्र सरकार की दूरसंचार कंपनी ने एयरटेल और वोडाफोन समेत पांच टेलीकॉम कंपनियों को उनका बकाया चुकाने के लिए 14 फरवरी यानी शुक्रवार की मध्य रात्रि तक का समय दिया था लेकिन तय मियाद तक कंपनियां ऐसा करने में असफल रहीं. इसमें से केवल भारती एयरटेल ने […]

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नयी दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद केंद्र सरकार की दूरसंचार कंपनी ने एयरटेल और वोडाफोन समेत पांच टेलीकॉम कंपनियों को उनका बकाया चुकाने के लिए 14 फरवरी यानी शुक्रवार की मध्य रात्रि तक का समय दिया था लेकिन तय मियाद तक कंपनियां ऐसा करने में असफल रहीं. इसमें से केवल भारती एयरटेल ने कहा कि वो 20 फरवरी तक 10 हजार करोड़ रुपये की रकम चुका देगी और बाकी की रकम बाद में चुकाएगी. बाकी किसी ने भी इस संबंध में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

ऐसी स्थिति में संभव है कि या तो टेलीकॉम कंपनियां खुद को दिवालिया घोषित कर दें या भारत सरकार उनको यहां सेवाओं के संचालन से मना कर दे. ऐसी स्थिति में भारत में केवल दो ही टेलिकॉम कंपनियां रह जाएंगी. पहली भारती एयरटेल और दूसरी रिलायंस जिओ.

23 जनवरी थी पिछली डेडलाइन

दरअसल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अरूण मिश्र की पीठ ने अपने 15 जनवरी के फैसले में कहा था कि दूरसंचार कंपनियों को कुल 1.47 लाख करोड़ रुपय की बकाया राशि का भुगतान 23 जनवरी तक कर देना चाहिए. कंपनियों ने इसकेे खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की थी लेकिन इसे खारिज कर दिया गया था.

इसी बीच दूरसंचार विभाग के एक डेस्क अधिकारी ने संबंधित संवैधानिक पद पर बैठे अधिकारियों को पत्र लिखा था जिसमें कहा गया था कि अगले आदेश तक किसी भी प्रकार की राशि का भुगतान नहीं करना है.

इस पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अरूण मिश्र ने नाराजगी जाहिर की थी. उन्होंने कहा कि एक डेस्क अधिकारी कैसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना कर सकता है. साथ ही उन्होंने टेलीकॉम कंपनियों से कहा था कि क्यों ना उनके खिलाफ न्यायालय की अवहेलना का मामला चलाया जाए.

कोर्ट ने जताई थी काफी नाराजगी

यही नहीं, कोर्ट ने भारत सरकार की तरफ से पेश सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि क्या इस देश में कानून नाम की चीज रह गयी है. इस पर तुषार मेहता ने माफी मांगी और कहा कि डेस्क अधिकारी के काम का संज्ञान लेंगे. तब तक कोई कार्रवाई ना की जाए.

तब कोर्ट ने कहा था कि 14 फरवरी की मध्य रात्रि तक बकाया राशि की वसूली की जाए. लेकिन तय मियाद तक ऐसा नहीं हो पाया.

14 फरवरी की मियाद भी पूरी हुई

केंद्र सरकार के दूरसंचार विभाग ने निम्नलिखित पांच टेलीकॉम कंपनियों को ब्याज और लाभांश सहित एजीआर चुकाने के लिए 14 फरवरी तक की समय सीमा दी थी लेकिन कंपनियों ने इस नहीं चुकाया. दूरसंचार विभाग ने सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद ये कदम उठाया था. आपको बता दें कि किस कंपनी पर कितना बकाया है. सीएजी द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक भारती एयरटेल 21,682.13 करोड़ रुपये वोडाफोन आइडिया- 19,823.71 करोड़ रुपये रिलायंस कम्युनिकेशंस- 16,456.47 करोड़ बीएसएनएल- 2,098.72 करोड़ रुपये और एमटीएनएल- 2,537.48 करोड़ रुपये का बकाया है.

जानिए, एजीआर होता क्या है

दूरसंचार कंपनियों को नियम के मुताबिक एजीआर का तीन फीसदी स्पेक्ट्रम फीस और 8 प्रतिशत लाइसेंस फीस के तौर पर सरकार को देना होता है. सवाल ये है कि एजीआर क्या होता है. दूरसंचार ट्रिब्यूनल 2015 के मुताबिक किराया, स्थायी संपत्ति की बिक्री से लाभ, डिविडेंड और ब्याज जैसे गैर प्रमुख स्त्रोत से हासिल राजस्व को छोड़कर बाकी प्राप्तियां एजीआर में शामिल होंगी.

लेकिन दूरसंचार विभाग किराया, स्थायी संपत्ति की बिक्री से लाभ और कबाड़ की बिक्री से प्राप्त रकम को भी एजीआर में मानता है. इसी आधार पर बकाया शुल्क की मांग की जा रही है. लेकिन टेलीकॉम कंपनियों का कहना है कि इन्हें एजीआर में शामिल ना किया जाए.

सीएजी की रिपोर्ट में हुआ था खुलासा

एक सवाल ये भी है कि आखिर ये कार्रवाई क्यों की जा रही है. नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने अपनी एक रिपोर्ट में दूरसंचार कंपनियों पर 61,065.5 करोड़ रुपये की बकाया राशि बताई थी. इसी में दूरसंचार विभाग द्वारा दायर याचिका में विभाग ने कुल बकाया शुल्क बर ब्याज, जुर्माना और जुर्माने पर ब्याज की मांग की. इसका टेलीकॉम कंपनियों ने विरोध किया. अदालत ने केंद्र सरकार को कंपनियों से एजीआर की वसूली की अनुमति दे दी है जो 92,641 करोड़ रुपये है.

रिपोर्ट के मुताबिक इसमें केवल 25 फीसदी ही वास्तविक बकाया है, बाकी रकम ब्याज, जुर्माना और जुर्माने पर ब्याज है. कंपनियों की मांग है कि ब्याज और ब्याज पर जुर्माने की राशि की वसूली ना की जाए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट या सरकार ये मानने को तैयार नहीं है. बता दें कि पिछले कुछ सालों में सस्ती कॉल दरों और डाटा को मुफ्त करने की होड़ में कंपनियों को घाटा हुआ. हालांकि भारत सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी की बदौलत उनकी सेवाएं जारी रहीं. हालांकि इस बीच बकाया बढ़ता रहा.

एजीआर की अवधारणा का विकास साल 1999 में दूरसंचार नीति के तहत हुआ था. इसी नीति के तहत कंपनियों को लाइसेंस शुल्क और आवंटित स्पेक्ट्रम के उपयोग शुल्क का भुगतान राजस्व अंश के तौर पर करना होता है.

आम उपभोक्ताओं पर क्या होगा असर?

अब चिंता इस बात को लेकर है कि बकाया राशि का भुगतान नहीं करने के बाद टेलीकॉम कंपनियों के बंद होने का आम उपभोक्ताओं पर क्या असर पड़ेगा. आशंका है कि कंपनियों द्वारा खुद को दिवालिया घोषित करने या भारत सरकार द्वारा उन पर कार्रवाई करने, दोनों की दशा में भारत में केवल दो ही टेलीकॉम कंपनियां रह जाएंगी.

भारती एयरटेल और रिलायंस जिओ. इसमें से एयरटेल, वोडाफोन के साथ मोबाइल टावर शेयर करता आया है. इसके बंद होने की स्थिति में एयरटेल को नए सिरे से टॉवर लगवाने होंगे. इसमें खर्चा आएगा जिसकी भरपाई डाटा और कॉल दरों में बढ़ोतरी से की जाएगी. वैसे भी नए साल में एयरटेल और जिओ, दोनों ने डाटा और कॉल दरों में बढ़ोतरी कर दी थी.

जाहिर है कि अब, जब प्रतिस्पर्धा नहीं रहेगी तो दोनों ही कंपनियां डाटा सहित कॉल दरों में बढ़ोतरी करेगी जिसका सीधा असर आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा.

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