...मौत के कगार पर दो शहर

Updated at : 30 Jun 2016 11:51 AM (IST)
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...मौत के कगार पर दो शहर

-हरिवंश- भोपाल गैसकांड या चासनाला जैसी दुर्घटनाएं होने पर सरकार मातमपुरसी के लिए जरूर चौकस हो जाती है, लेकिन संभावित बड़ी दुर्घटनाओं को रोकने की कोशिश किसी स्तर पर नहीं होती. रानीगंज (बंगाल) और झरिया (बिहार) आग के ऊपर बसे शहर हैं. अकसर इन शहरों में जमीन धंसने या जानमाल की बरबादी की घटनाएं होती […]

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-हरिवंश-

भोपाल गैसकांड या चासनाला जैसी दुर्घटनाएं होने पर सरकार मातमपुरसी के लिए जरूर चौकस हो जाती है, लेकिन संभावित बड़ी दुर्घटनाओं को रोकने की कोशिश किसी स्तर पर नहीं होती. रानीगंज (बंगाल) और झरिया (बिहार) आग के ऊपर बसे शहर हैं. अकसर इन शहरों में जमीन धंसने या जानमाल की बरबादी की घटनाएं होती रहती हैं. अंदरूनी सरकारी रपटों में नौकरशाह इस समस्या को तत्काल सुलझाने की बात लिखते हैं. लेकिन काम के स्तर पर खास प्रगति नहीं हो रही है. आग से प्रभावित जगहों से लौट कर हरिवंश की रिपोर्ट. तसवीरें ली हैं कृष्णमुरारी किशन ने.
रानीगंज (बंगाल) और झरिया (धनबाद) में लाखों लोग आग के मुहाने पर जीवन गुजार रहे हैं. पता नहीं कब जमीन नीचे धंस जाये, मकान गिर जाये या पूरा का पूरा इलाका बैठ जाये. प्राय: इस अंचल में मकान धंसने और लोगों के बेमौत मरने की घटनाएं होती रही हैं. भोपाल गैस कांड जैसी त्रासदी की पुनरावृत्ति अगर इस इलाके में हुई, तो कोई आश्चर्य नहीं. एक और गहरा संकट है. अवैज्ञानिक ढंग से खुदाई के कारण नीचे जमीन पोपली हो गयी है या वहां पानी भर आया है. इससे कोयले की खुदाई के दौरान आसपास के खदानों में दुर्घटना की आशंका बढ़ गयी है. प्रशासन और कोल इंडिया के वरिष्ठ अधिकारी इन संभावित हादसों से वाकिफ हैं, लेकिन हाथ पर हाथ रख कर मौज-मस्ती कर रहे हैं और कोयले की लूट में सहभागी बने हुए हैं.

झरिया की कोयला खदानों में पिछले 80 वर्षों से आग लगी हुई है. परिणामस्वरूप 186 करोड़ 40 लाख टन कोयला निकालने का काम ठप पड़ा हुआ है. नीचे ही नीचे यह आग 17 वर्ग किमी में फैल चुकी है. अब तक इस आग में तीन करोड़ सत्तर लाख टन कोयला जल कर नष्ट हो चुका है.
खदानों के नीचे आग लगने के अनेक कारण हैं. पहले अवैज्ञानिक ढंग से खदानों की खुदाई होती थी. परित्यक्त खदानों में लोग दहकते अंगारे फेंक देते थे. इससे आग भड़क उठी. गैर कानूनी ढंग से शराब बनाने का धंधा भी इधर बड़े पैमाने पर होता रहा है. इसके लिए अवैध भट्ठियां बनायी जाती रही हैं. शराब बनाने के बाद लोग उन्हें बिना बुझाये छोड़ देते हैं. कोयला निकलाने के लिए प्रथम विश्वयुद्ध के समय 1916 के आसपास अंधाधुंध खुदाई हुई. तब से यह आग लगी है. आज यह आग झरिया कस्बे के चारों ओर करीब 70 स्थानों पर फैल चुकी है और लगातार फैल रही है.

कोयला खुद ज्वलनशील पदार्थ है और हवा में ऑक्सीजन होने से वह तेजी से जलता है. 1972 के आसपास झरिया में कोयला निकालने के काम में तकरीबन 500 निजी ठेकेदार लगे हुए थे. कोयला निकालने के बाद इन लोगों ने बहुत से खदानों को खुला छोड़ दिया. तकनीकी रूप से आवश्यक है कि जहां से कोयला निकाला जाता है, उस जगह को बालू, मिट्टी, पत्थर आदि से ढंक दिया जाये. लेकिन ठेकेदार कड़ाई से इस नियम का अनुपालन नहीं करते. फलस्वरूप जमीन नीचे बैठने लगती है. आग लग जाती है या पानी जमा होता है. ऑस्ट्रेलिया में यह नियम है कि कोयला निकलाने के टेंडर के साथ ही उस जगह को पाटने के लिए भी टेंडर आमंत्रित किये जाते हैं. यह कानूनी रूप से अनिवार्य प्रावधान है. फलस्वरूप कोयले की खुदाई से जमीन बैठने, खदानों में आग लगने, लोगों के मरने या पर्यावरण दूषित होने का खतरा वहां उत्पन्न नहीं होता है.

कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण के बाद इस गंभीर समस्या पर विचार-विमर्श आरंभ हुआ. लेकिन इस दिशा में ठोस काम 1977 के बाद हुए. तब से आज तक 19 स्थानों पर आग बुझाने के प्रयास कर करीब 19 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन महज 5 जगहों पर ही आंशिक सफलता हासिल हुई है. आग बुझाने के लिए अधिकारियों ने जो योजना बनायी है, उसके तहत 48 स्थानों पर आग बुझाने में 125 करोड़ रुपये खर्च होंगे. अगर आग पर तत्काल काबू पा लिया गया, तो एक अनुमान के अनुसार 160 करोड़ टन कोयला अभी भी बचाया जा सकता है. एक और गंभीर समस्या है. लगातार खुदाई के कारण कोयले का भंडार कम हुआ है. अधिक नीचे से कोयला निकालने पर लागत व्यय भी बढ़ेगा. झरिया और रानीगंज दोनों क्षेत्रों से आसानी से उम्दा किस्म का कोयला निकाला जा सकता है, लेकिन आग के कारण फिलहाल इन क्षेत्रों में खुदाई मुमकिन नहीं है.

मुकुंद परियोजना (बजट 2400 करोड़ रुपये) में भी आग लगी हुई है. यहां आग बुझाने के लिए सोवियत संघ की सहायता ली गयी है. कोयला खदानों में नीचे आग लगने से जमीन का ऊपरी भाग फट जाता है, जिससे अंदर हवा पहुंचने लगती है. ऑक्सीजन सुलभ होने से आग तेजी से सुलगती है. इस आग के परिणामस्वरूप रेलवे लाइन, मकान, सड़क-जल निकासी व्यवस्था आदि पर गहरा असर पड़ा है. वैज्ञानिकों के अनुसार इस अंचल में तीन तरह से आग लगी हुई है. 1. जमीन के भीतर लगी आग, जो धीरे-धीरे ऊपर आ जाती है. 2. जमीन के ऊपर खदानों में गड़्ढों में लगी आग और 3. जमीन के नीचे लगी आग, जो भीतर ही सुलग और फैल रही है.

आग बुझाने के लिए प्रथम चरण में जमीन के ऊपर पड़ी दरारों को बंद किया जाता है, ताकि हवा भीतर प्रवेश न कर पाये. आग बुझाने का एक और प्रभावी तरीका है, जमीन के भीतर आज बुझानेवाले रसायन पहुंचाना. दक्षिण तिरसा खान में कार्बन डाईऑक्साइड गैस और सीमेंट डालने से आग बुझ गयी. बरसात के दिनों में आग की लपटें तेज होती हैं, लेकिन यह विकल्प काफी खर्चीला है. 1979 में जोगता खान क्षेत्र में आग बुझाने का काम आरंभ हुआ. इस कार्यक्रम पर खर्च के लिए 11 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया. ऊर्जा मंत्री के बयान के अनुसार जोगता परियोजना में आग बुझाने से 56 करोड़ रुपये का कोयला बचाया जा सकता है. आग को नियंत्रित करने के बाद यहां 20 हजार पेड़ भी लगाये गये हैं.

हाल ही में झरिया के गद्दा मुहल्ले में अचानक अर्द्धरात्रि में जमीन का एक बड़ा भू-भाग नीचे बैठ गया. यह हिस्सा 5-20 फीट नीचे चला गया. और यहां से अचानक गैस निकलने लगी. ऐसी ही दुर्घटना 1982 में कुल्टी में हुई थी, जिसमें तकरीबन 25 मकान क्षतिग्रस्त हुए थे. रानीगंज में तो अकसर ऐसी घटनाएं होती रहती हैं. बीच-बीच में केंद्र सरकार के अधिकारी-मंत्री इस समस्या पर बयान दे कर अपनी चिंता जाहिर करते रहे हैं. हाल ही में 9 नवंबर को ऊर्जा मंत्री बसंत साठे ने लोकसभा में कहा कि झरिया के कोयला खदानों में लगी आग के कारण ‘भयानक स्थिति’ पैदा नहीं होने दी जायेगी. हालांकि काफी पहले यह भयावह हो चुकी है. उनके बयान के अनुसार यह आग करीब सौ साल पहले लगी थी. अब इसे बुझाने के लिए अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग हो रहा है. उपलब्ध सूत्रों और रेकॉर्ड के अनुसार 1916 में ऐसी आग लगी होने की सूचना दर्ज है. श्री साठे के बयान के अनुसार भारत कोकिंग कोल लिमिटेड के चालीस कोयला खदानों में 70 जगहों पर आग लगी है. सरकारी रेकॉर्ड के अनुसार यह आग 17.31 वर्ग किलोमीटर में फैली हुई है.

केंद्रीय खान योजना एवं डिजाइन संस्थान की पूर्व रिपोर्ट के अनुसार 80 लाख टन कोयला इस आग के कारण निकालना नामुमकिन है. लेकिन कोल इंडिया लिमिटेड की एक विशेषज्ञ समिति ने रिपोर्ट दी है कि एक अरब 86 करोड़ 40 लाख टन कोयला आग के कारण निकालना संभव नहीं है. हाल ही में यह रिपोर्ट ऊर्जा मंत्रालय को दी गयी है. श्री साठे के बयान के अनुसार 32 स्थानों पर लगी आग को बुझाने के लिए 20 परियोजनाओं द्वारा काम हो रहा है. छह स्थानों पर आग पर काबू पाया जा चुका है. श्री साठे द्वारा लोकसभा को दिये गये आश्वासन के अनुसार आठवीं योजना के अंत तक झरिया कोयला क्षेत्र में लगी आग पर काबू पा लिये जाने की संभावना है. ऊर्जा मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि आग नहीं बुझने की स्थिति में झरिया के नागरिकों के पुनर्वास की योजना भी तय की गयी है.

ऊर्जा मंत्री का बयान सरकार की संवेदनहीनता का लिखित प्रमाण है. झरिया के कोयला खदानों में लगी आग फैल रही है. अकसर घर-बस्ती गिर रहे हैं. लोग मर रहे हैं. जमीन धंस रही है. सरकार खुद कबूलती है कि आज करोड़ों टन कोयला इस आग के कारण निकलना नामुमकिन है. यानी सरकारी दस्तावेज-रिपोर्ट यह बताते हैं कि आग फैल रही है. फिर भी झरिया के नागरिकों के पुनर्वास की योजना अधर में लटकी हुई है. इस इलाके में इस आग की तबाही के यथेष्ट प्रमाण हैं. जमीन के ऊपर ही जगह-जगह आग सुलगती दिखाई देती है. झरिया के पुराने बाशिंदों का कहना है कि पहले आग सतह पर नहीं थी. अब जमीन के नीचे से सतह पर आ गयी है.

इस आग के अन्य हानिकर प्रभावों से भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) चिंतित नहीं है. खुदाई विशेषज्ञ स्वीकारते हैं कि जमीन के नीचे कोयला खदानों में लगी आग से पारस्थितिकी (इकोलॉजी) पर अत्यंत प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है. इससे पूरे क्षेत्र और आसपास में पेड़-पौधों की हरियाली खत्म हो गयी है. इससे जमीन की उर्वरा शक्ति क्षीण हो जाती है. जमीन में जो उपजाऊ तत्व होते हैं, वे सूखते हैं और नमक की मात्रा बढ़ती है. इससे जमीन अनुर्वर हो जाती है. धीरे-धीरे पूरा इलाका बंजर और हरियालीविहीन हो जाता है.

जिन खदानों में आग लगी है, वहां अकसर दरार पड़ती है और जानमाल की हानि होती है. ऐसी जगहों पर (खदान के नीचे) 40-50 सेंटीग्रेड तापमान होता. वहां से सल्फर ऑक्साइड गैस निकलती है. क्योंकि कोयले में सल्फर की मात्रा भी रहती है. आसपास के इलाके में स्थित खेती-बारी या हरियाली को यह गैस चौपट कर देती है. इस ऊंचे तापमान को नियंत्रित करने के लिए काफी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है. दूसरी जगह से पानी निकालना और अंदर प्रभावित जगह पर पहुंचाना काफी खर्चीला काम है. वस्तुत: कोयलांचल में कोयला खनन के बाद उस जगह को बालू से भरने के लिए ठेके दिये जाते हैं. यह ठेका अरबों रुपये का होता है. धनबाद के मशहूर माफिया गिरोहों की आर्थिक प्रगति का राज इस बालू ढुलाई में भी है. वस्तुत: ये लोग पर्याप्त बालू नहीं डालते. एक ट्रक बालू ढोने को कागज पर 10 ट्रक दिखाया जाता है. इसमें सबकी मिलीभगत होती है.

हाल ही में कोल इंडिया द्वारा गठित विशेषज्ञों की समिति ने राय दी है कि इस भयंकर स्थिति से निबटने के लिए युद्ध स्तर पर कार्रवाई अपेक्षित है. इस आग को बुझाने की कार्रवाई में कोताही से पूरे अंचल की पारस्थितिकी-पर्यावरण खतरे में है. इस रिपोर्ट के अनुसार इस आग में प्रतिक्षण इस इलाके के पर्यावरण में विष घुल रहा है.
झरिया से सटे ही बंगाल के मशहूर औद्योगिक केंद्र रानीगंज की हालत तो और भी बदतर है. वहां जमीन धंसने, घर गिरने और जानमाल की हानि झरिया से भी अधिक हो रही है. हाल ही में कोल इंडिया के आग्रह पर विशेषज्ञों ने इस इलाके का सर्वेक्षण किया और अपनी रिपोर्ट तैयार की.

इस रिपोर्ट के अनुसार रानीगंज शहर 1197 एकड़ मैं फैला है. रिपोर्ट के अनुसार इस पूरे इलाके में सरकारी और निजी संपत्ति तकरीबन 200 करोड़ रुपये की है. जबकि शहर के नीचे तकरीबन 100 मिलियन टन कोयला है, जो 300 रुपये प्रति टन मूल्य के अनुसार 3000 करोड़ रुपये की संपत्ति है. इस रिपोर्ट के अनुसार शहर के पुनर्वास की तत्काल व्यवस्था आवश्यक है. भारत में कोयला उत्खनन का इतिहास मात्र 150 वर्ष पुराना है और रानीगंज शायद कोयला उत्खनन का सबसे पुराना केंद्र है. यहां भी राष्ट्रीयकरण के पूर्व जमीन के नीचे अवैज्ञानिक तरीके से बड़े पैमाने पर खुदाई हुई. इसलिए जमीन धंसने और आग लगने की घटनाएं अब काफी बढ़ गयी हैं. रानीगंज में चूंकि कोई रेकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, इसलिए विशेषज्ञों की राय है कि जमीन धंसने की घटनाएं कब-कहां किस रूप में होंगी, कहना मुश्किल है. हां, समिति ने रिपोर्ट में यह अवश्य उल्लेख किया है कि शहर का ऊपरी भाग हमेशा खतरे में है. कब-कहां जमीन धंसने का प्रकोप हो, कहा नहीं जा सकता. अवैज्ञानिक पद्धति से कोयला उत्खनन के कारण रानीगंज के बहुत से खदानों में पानी भर गया है. इस पानी से भी नुकसान का खतरा है, दूसरी ओर इसके कारण नीचे से बेहतर कोयला निकालना मुश्किल हो गया है.

चूंकि रानीगंज और झरिया में ही यह खतरा अधिक है, इसलिए विशेषज्ञों की राय के अनुसार इन दोनों जगहों की स्थिति पर नजर रखने के लिए विशेषज्ञों की एक निगरानी समिति का तत्काल गठन आवश्यक है. रिपोर्ट के अनुसार इसीएल की 26 खदानों और बीसीसीएल की 15 खदानों पर हमेशा चौकस निगाह रखना आवश्यक है. इस विषय पर गहराई से अध्ययन करनेवाले एक भू-वैज्ञानिक का कहना है कि अगर सरकार की उदासीनता ऐसी ही बनी रही और इस समस्या को निपटाने और आग पर काबू पाने के लिए रोजाना नयी योजनाएं ही बनती रहीं, तो भविष्य में चासनाला की पुनरावृत्ति अवश्यंभावी है. हालांकि आग बुझाने के काम में भारत सरकार का ऊर्जा मंत्रालय, कोयला विभाग (भारत सरकार) बीसीसीएल, इसीएल, सीएमपीडीआइ, सीएमआरएस, डीजीएमएस आदि अनेक संगठन लगे हैं, पर इनमें आपसी सहयोग का अभाव है. लगभग संवादहीनता की स्थिति है.

समिति की राय में झरिया और रानीगंज में जो स्थिति है, वैसी स्थिति अमेरिका और जर्मनी (पूर्व) में भी थी. वहां इस पर काबू पा लिया गया. बहरहाल, यह पूरा अंचल अभूतपूर्व प्राकृतिक संकट के कगार पर है, लेकिन कहीं भी किसी भी स्तर पर इससे निजात पाने के लिए सुगबुगाहट नहीं है. प्रशासन को शायद किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार है.

धनबाद के सांसद शंकरदयाल सिंह स्वीकारते हैं कि यह समस्या गंभीर है. भारत सरकार इससे चिंतित है. उनका कहना है कि कोल इंडिया के अधिकारियों, वरिष्ठ तकनीशियनों और विदेशी जानकारों की मदद से इस समस्या को सुलझाने की पुरजोर कोशिश हो रही है. श्री सिंह के अनुसार यह समस्या अवैज्ञानिक ढंग से कोयले की खुदाई की देन है, और काफी पुरानी है. इस कारण इससे निजात पाने में थोड़ा समय लगेगा. खदानों में पानी भर जाने से कोयला उत्खनन में होनेवाली कठिनाई, जमीन धंसने या अंदर-ही-अंदर आग फैलने की स्थिति से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर अकसर सर्वेक्षण-अध्ययन और वैज्ञानिक विश्लेषण होते रहे हैं. खासकर धनबाद केंद्रीय खनन शोध संस्थान के वैज्ञानिक एनसी सक्सेना और एसके परती ने इस दिशा में उल्लेखनीय काम किये हैं. जोगता खान क्षेत्र में आग बुझाने में मिली सफलता से वैज्ञानिक उत्साहित हैं.

वैज्ञानिकों का तर्क है कि बड़े पैमाने पर इस समस्या को सुलझाने की कोशिश की जाये, तो कोई कारण नहीं कि आग बुझाने में सफलता न मिले. लेकिन एक और गंभीर समस्या है. अवैधानिक तरीके से कोयला उत्खनन का काम पूर्ववत चल रहा है. अगर इसे तत्काल रोका न गया, तो समस्या निरंतर उलझती जायेगी.
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