नयी मां को चिंता हो तो सतर्कता है जरूरी

Updated at : 28 Jun 2017 12:25 PM (IST)
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नयी मां को चिंता हो तो सतर्कता है जरूरी

रश्मि, उम्र-27 साल, 15 दिन पहले ही मां बनी थी. बच्चे के जन्म के बाद से लगातार उनकी नींद और भूख में गिरावट आ रही थी. वे धीरे-धीरे अपने बच्चे और पति से भी दूरी बनाती चली गयी थीं. किसी बात पर चिढ़ कर गुस्सा हो जाना और छोटी-मोटी बातों पर भी रोने लग जाना […]

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रश्मि, उम्र-27 साल, 15 दिन पहले ही मां बनी थी. बच्चे के जन्म के बाद से लगातार उनकी नींद और भूख में गिरावट आ रही थी. वे धीरे-धीरे अपने बच्चे और पति से भी दूरी बनाती चली गयी थीं. किसी बात पर चिढ़ कर गुस्सा हो जाना और छोटी-मोटी बातों पर भी रोने लग जाना उनके लिए सामान्य बातें हो चली थी.

पहले तो घर वालों ने इसे हल्के में लिया, पर जब उन्होंने अपने ही बच्चे को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, तब स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ. और तब घरवाले उन्हें मेरे पास लेकर आये. सभी लक्षणों को जानने के बाद मैंने उनको सीपिया ओफ्फिसिनालिस 200 शक्ति की होम्योपैथिक दवाई दी. एक महीने के अंदर रश्मि पहले की तरह सामान्य हो गयीं. रश्मि को जो समस्या थी उसे पोस्टपार्टम डिप्रेशन कहते हैं.

पोस्टपार्टम डिप्रेशन एक गंभीर बीमारी है, जो महिलाओं में बच्चे के जन्म के बाद होती है. यह एक मनोरोग है, जिसमें महिलाएं बच्चे को जन्म देने के बाद उदास या तनाव में रहने लगती हैं. यह स्थिति तब हो सकती है, जब महिला का गर्भपात हो जाये या बच्चा मृत पैदा हो. ये हालात किसी भी महिला के लिए अंदरूनी तौर पर झकझोरनेवाला होता है. ऐसे में महिला निराशा के बादलों से घिर जाती है और उसे खुद के प्रति बिल्कुल भी मोह नहीं रह जाता है. इस दौरान महिला अपने बच्चे की ओर ध्‍यान तक नहीं देना चाहती है. उसके साथ उसका भावनात्मक जुड़ाव कम या फिर बिल्कुल भी नहीं रहता. यह जरूरी नहीं कि ऐसा सभी महिलाओं के साथ हो, कुछ महिलाएं इस स्थिति से बड़ी आसानी से बाहर निकल आती हैं.

जब हालात बिगड़ जाएं : कुछ दुर्लभ मामलों में महिला अधिक अवसाद से घिर जाती हैं. इसे पोस्‍टपार्टम साइकोसिस कहते हैं. इस दौरान महिला काफी अजीब व्यवहार कर सकती हैं. उसे वे आवाजें सुनायी दे सकती हैं, जो वास्तव में वहां मौजूद ही न हों. साथ ही वे गैरमौजूद चीजों को देखने का दावा भी कर सकती हैं. ये हालात स्वयं उसके और उसके बच्चे दोनों के लिए खतरनाक हो सकते हैं. यह एक आपातकालीन स्थिति है और इसे काफी गंभीरता से लेने की जरूरत होती है. इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि ऐसी स्थिति काफी तेजी से खराब हो सकती है. इससे न केवल महिला, बल्कि उसके आस-पास के लोगों को भी खतरा होता है.

बेबी ब्लूज नहीं है पोस्टपार्टम डिप्रेशन

डिप्रेशन महिलाओं के शरीर में हुए शारीरिक व हार्मोनल परिवर्तन के कारण होता है. पोस्टपार्टम का डिप्रेशन और ‘बेबी ब्लूज’ दोनो ही स्थितियां एक-दूसरे से अलग हैं. बेबी ब्लूज तीन में से एक महिला में पायी जाती है. प्रसव के बाद कुछ हफ्तों में शरीर में हुए हार्मोनल परिवर्तन की वजह से यह विकार होता है और आमतौर पर 3-4 दिनों में ठीक हो जाती है. कई बार डिप्रेशन बढ़ कर महीनों तक पहुंच जाती है. इसे पोस्टपार्टम डिप्रेशन कहा जाता है. इस स्थिति में बच्चे को जन्म देनेवाली मां कभी-कभी खुद को बेकार और दोषी मानने लगती है. यहां तक कि वह अपने बच्चे की जरूरतों का भी ध्यान नहीं रखती. वह चिंताग्रस्त और संवेदनशील हो जाती है. उसके मन में कई विचार बार-बार आने से उसको बच्चे के स्वास्थ्य की भी चिंता होने लगती है. ऐसे में नयी मां बार-बार एक ही कार्य करती है, जैसे- बच्चे की बार-बार जांच करती है या फिर लगातार डॉक्टर को फोन करके सवाल पूछती है. कई बार मां को खुद के साथ ही अपने शिशु से भी घृणा होने लगती है, जिसके कारण आत्महत्या व बच्चे की हत्या जैसा कदम उठा लेती हैं. 60 प्रतिशत महिलाओं को पोस्टपार्टम ब्लूज से गुजरना पड़ता है, वहीं 15-20 फीसदी महिलाएं ही पोस्टपार्टम डिप्रेशन की शिकार होती हैं.

डॉ रागिनी ज्योति

बीएचएमएस, सीजीओ, आदर्श होमियो क्लीनिक, राजीव नगर, पटना

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