Savitribai Phule Jayanti 2023: सावित्री बाई फूले की जयंती आज, जानें कैसे कुप्रथाओं की खिलाफ उठाई थी आवाज

Published by : Shaurya Punj Updated At : 03 Jan 2023 8:56 AM

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Savitribai Phule Jayanti 2023: स्त्रीवादी संघर्षों की यह यात्रा आसान नहीं रही है. विधवा विवाह, बाल विवाह, सतीप्रथा जैसी जघन्य कुरीतियां समाज में अपनी जड़ें जमाए थी. तब इन्हीं कुप्रथाओं के उन्मूलन के लिए सामने आती हैं सावित्री बाई फूले, जिनकी आज जयंती है.

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Savitribai Phule Jayanti 2023: आज का स्त्रीवादी विमर्श ‘मेरी रात मेरी सड़क’ जैसे मुद्दों पर स्त्री समानता को लेकर मुखरित हो रहा है. स्वतंत्र, सशक्त औऱ चेतनाशील स्त्रियां बेखौफ होकर पितृसत्तात्मक समाज से मुकाबला कर रही हैं. स्त्रीवादी संघर्षों की यह यात्रा आसान नहीं रही है. वह भारी बाधाओं और कष्ट-कंटकों से लड़ती भिड़ती यहां तक पहुँची है. इन संघर्षों का आरंभ बिंदु वह है जब महिलाओं का शिक्षण किसी आपराधिक कृत्य सरीखा था. विधवा विवाह, बाल विवाह, सतीप्रथा जैसी जघन्य कुरीतियां समाज में अपनी जड़ें जमाए थी. तब इन्हीं कुप्रथाओं की खिलाफत और उसके उन्मूलन के लिए सामने आती हैं सावित्री बाई फूले, जिनकी आज जयंती है.

सावित्री बाई फूले ने अपने आरंभिक दौर में ही ब्रिटिश सुधारवादी और उन्मूलनवादी टामसन क्लार्क्सन की जीवनी पढ़ी और अपने लोकोपकारी कार्यों में उनसे काफी प्रभावित हुईं. टामसन क्लार्क्सन ने नीग्रो लोगों पर हुए दमन के विरुद्ध लड़ाई लड़ी थी और इसके लिए कानून बनाने में भी सफलता पाई थी. उस समय के भारत में स्त्रियों और अछूतों की स्थिति भी नीग्रो समुदाय से कहां कमतर थी. सावित्री बाई फूले ने महिलाओं को लेकर तमाम रूढ़ियों औऱ जड़ताओं का हल शिक्षा में ढूंढ़ा औऱ समाज में शिक्षा की ज्योति जलाने की अपनी यात्रा में निकल पड़ीं.

लेकिन यह रास्ता बेहद दुष्कर था. क्योंकि तब पति की सेवा करने, बच्चा पैदा करने और चुल्हा-चौका करने कपरे महिलाओं का कोई जीवन नहीं समझा जाता था. उनकी इच्छा, उनके सपने और मान-सम्मान के लिए न कोई जगह थी न उनका मूल्य था. इन्हीं महिलाओं को जब शिक्षित करने सावित्री बाई निकलतीं तो उन्हें रोकने के लिए उनपर गंदगी और कीचड़ फेंके जाते. इसके लिए विद्यालय जाते हुए थैले में एक और साड़ी रखना उन्होंने पसंद किया लेकिन अपने रास्ते से नहीं डिगीं.

सावित्री बाई ने उठाया था साहसिक कदम

उन्नीसवीं सदी में ब्राह्मणवाद के पाखंड का आलम यह था कि असमय हुई विधवा स्त्रियों के लिए विवाह निषेध था. लेकिन उसी समाज और परिवार के पुरुष इन स्त्रियों से हठात बलात्कार करते या बहला-फुसलाकर उनसे संबंध बनाते, और इन स्थितियों में अगर गर्भ ठहर जाए तो दंड भुगतने का विधान अकेले स्त्रियों के लिए निर्मित था. ऐसी ही एक ब्राह्मण विधवा महिला काशी बाई की मदद के लिए सावित्री बाई ने साहसिक कदम उठाया. न सिर्फ उन्हें अपने घर लाकर उनका प्रसव कराया. बल्कि उनके बच्चे को गोद लेकर उसे उच्च शिक्षित किया और डॉक्टर बनाया.

काशीबाई की घटना ने उन्हें 1853 में ‘बाल-हत्या प्रतिबंधक-गृह’ की स्थापना करने की प्रेरणा दी, जहाँ विधवाएँ अपने बच्चों को जन्म दे सकती थी और यदि वो उन्हें अपने साथ रखने में समर्थ नहीं हैं तो बच्चों को इस गृह में रख कर जा सकती थीं। इस गृह की पूरी देखभाल और बच्चों का पालन पोषण सावित्रीबाई फुले किया करती थीं. बुराइयों को तात्कालिकता में देखने के बजाय सावित्री बाई ने उसके जड़ पर चोट कर उसके खात्मे की दिशा में कदम बढ़ाया. विधवा महिलाओं को विद्रूप बनाने के लिए नाईयों से उनके मुंडन की कुप्रथा समाज में विद्यमान थी. सावित्री बाई नाई समाज के लोगों को यह समझाने में कामयाब रहीं कि वे विधवा स्त्रियों का मुंडन करके एक बड़ी बुराई में हिस्सेदार हो रहे हैं.

सामाजिक सुधार के लिए किया कार्य

नाई समुदाय के लोग उनसे प्रेरित हुए और उन्होंने इस मुंडन प्रथा के खिलाफ हड़ताल कर दिया. सामाजिक सुधार के इन्हीं कार्यों को आगे बढ़ाते हुए और महिलाओं के अधिकार, गरिमा व अन्य सामाजिक मुद्दों के बारे में जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से उन्होंने महिला सेवा मंडल की स्थापना की. जिसे उनके महत्वपूर्ण कार्यों में से गिना जाता है. उस समय अधिकांश माता-पिता यह मानकर चलते थे कि लड़कियों को शिक्षा देना पाप का भागीदार होना है. तब सावित्री बाई फूले ने ऐसे मां-पिताओं के साथ लगातार बैठक की और उन्हें बेटियों को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित किया. वे कहती थीं कि शिक्षित और अनुशासित बच्चे किसी भी समाज का भविष्य होते हैं जो आगे चलकर समाज का नेतृत्व करने में अहम् भूमिका निभाते हैं. इस नाते शिक्षा, विद्यार्थियों और शिक्षकों का बहुत ही अहम् रिश्ता है और समाज निर्माण में इनका मुख्य किरदार होता .

आखिरी क्षणों तक पीड़ितों की सेवा को समर्पित रहीं सावित्री बाई फूले

आज स्कूलों में जो पैरेन्ट्स-टीचर मीटिंग की परंपरा है, उसकी शुरूआत यहीं से मानी जाती है. सावित्री बाई फूले अपने आखिरी क्षणों तक पीड़ितों की सेवा को समर्पित रहीं. जब मुम्बई प्लेग के भीषण प्रकोप से ग्रसित था और बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यू हो रही थी तब उन्होंने प्लेग रोगियों की सेवा में खुद को झोंक दिया. इसी क्रम में किसी ने उन्हें प्लेग से ग्रसित एक बच्चे के बारे में बताया, वह उस गंभीर बीमार बच्चे को पीठ पर लादकर हॉस्पिटल लेकर गयी. इस प्रक्रिया में यह महामारी उन्हें भी लग गयी और 10 मार्च 1897 को सावित्रीबाई फुले इस बीमारी के चलते निर्वाण को प्राप्त हुईं. भारतीय स्त्री आंदोलन की यात्रा में सावित्री बाई फूले का जीवनकर्म एक अहम कड़ी है; जिसे बिना समझे-जाने स्त्रीवादी आंदोलन और सुधारों को समग्रता में देखने की दृष्टि विकसित नहीं की जा सकती. अफसोस है कि इतिहास ने उन्हें वह स्थान नहीं दिया, जिसकी वह हकदार थीं.

पल्लव आनंद

(पॉलिटिकल रिसर्चर एवं स्वतंत्र पत्रकार)

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By Shaurya Punj

शौर्य पुंज विशेष रूप से दैनिक राशिफल, साप्ताहिक एवं मासिक भविष्यफल, पूजा-पाठ, व्रत-त्योहार, शुभ मुहूर्त, ज्योतिषीय उपाय, वास्तु टिप्स और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी खबरों एवं लेखों पर फोकस कर रहे हैं. वो डिजिटल मीडिया जगत के अनुभवी पत्रकार हैं और वर्तमान में प्रभातखबर.कॉम में सीनियर कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. पाठकों की रुचि और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए वे सरल, सहज और तथ्यपूर्ण धार्मिक एवं ज्योतिषीय कंटेंट तैयार करते हैं. डिजिटल मीडिया में 15 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ शौर्य खबरों की नब्ज को समझने और जटिल विषयों को आसान भाषा में प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 2008 में ग्रेजुएशन के दौरान दैनिक हिंदुस्तान, प्रभात खबर, दैनिक जागरण और तरंग भारती (हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र) के लिए फ्रीलांस लेखन से की थी. वर्ष 2011 में उन्होंने दैनिक जागरण के टैब्लॉइड समाचार पत्र iNext में इंटर्नशिप की. इसी दौरान उन्हें प्रभात खबर के डिजिटल सेक्शन में कार्य करने का अवसर मिला और अप्रैल 2011 से उन्होंने प्रभातखबर.कॉम के एंटरटेनमेंट सेक्शन में काम शुरू किया. यहां उन्होंने बॉलीवुड फिल्म रिव्यू, बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट और मनोरंजन जगत की प्रमुख खबरों पर लेखन किया. साल 2020 के दौरान उन्होंने लाइफस्टाइल, हेल्थ, एजुकेशन और अन्य नॉन-न्यूज कैटेगरी में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया. Health & Fitness, Beauty & Fashion, Relationship & Family, Food & Recipes, Travel, Astrology & Vastu, Career & Motivation, Festival & Culture जैसे विषयों पर उन्होंने सैकड़ों उपयोगी और जानकारीपूर्ण लेख तैयार किए. शिक्षा शौर्य पुंज का जन्म रांची, झारखंड में हुआ. उनकी प्रारंभिक शिक्षा डीएवी पब्लिक स्कूल, हेहल, रांची से हुई. इसके बाद उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन में बी.ए. (ऑनर्स) की डिग्री प्राप्त की. पत्रकारिता की उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें समाचार लेखन के मूल सिद्धांत 5Ws और 1H — क्या, कौन, कहां, कब, क्यों और कैसे के आधार पर तथ्यपूर्ण, संतुलित और प्रभावी कंटेंट तैयार करने में सक्षम बनाती है. विशेषज्ञता के क्षेत्र दैनिक राशिफल साप्ताहिक एवं मासिक भविष्यफल ज्योतिषीय उपाय पूजा-पाठ एवं धार्मिक अनुष्ठान व्रत-त्योहार एवं शुभ मुहूर्त वास्तु शास्त्र धार्मिक मान्यताएं एवं परंपराएं लाइफस्टाइल एवं वेलनेस हेल्थ एवं फिटनेस डिजिटल कंटेंट राइटिंग एवं SEO पाठकों तक विश्वसनीय, उपयोगी और आसान भाषा में जानकारी पहुंचाना शौर्य पुंज की लेखन शैली की सबसे बड़ी विशेषता है.

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