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‘गर्म हवाओं' से बढ़ रहा है बुजुर्ग और बीमार लोगों के लिए खतरा, हो रहा है गर्मी से संबंधित समस्याएं

Updated at : 07 Jul 2022 8:00 PM (IST)
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‘गर्म हवाओं' से बढ़ रहा है बुजुर्ग और बीमार लोगों के लिए खतरा, हो रहा है गर्मी से संबंधित समस्याएं

Risk of Hot Rising Winds: अध्ययन में सामने आया कि युवा और स्वस्थ महिलाओं और पुरुषों में पर्यावरणीय गर्मी सहने की क्षमता 35 डिग्री सेल्सियस की सैद्धांतिक सीमा से भी कम है. यह 31 डिग्री सेल्सियस के वेट बल्ब तापमान के आसपास पाई गई.

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Risk of Hot Rising Winds: जलवायु परिवर्तन के साथ ही गर्म हवाओं (हीट वेव) का खतरा बढ़ता जा रहा है. हीट वेव अब ज्यादा समय तक रहती है, बार-बार आती है और पहले से अधिक गर्म है. बहुत से लोग यह सवाल करते हैं कि “युवा और स्वस्थ वयस्कों की दैनिक गतिविधियों और कामकाज के लिए बेहद गर्मी की स्थिति कब पैदा होती है?” इसका जवाब थर्मामीटर पर दिखने वाला तापमान ही नहीं, बल्कि आर्द्रता भी है. हमारे अनुसंधान में सामने आया है कि इन दोनों के संयोजन से खतरा और बढ़ जाता है. वैज्ञानिक और अन्य अनुसंधानकर्ता बेहद गर्मी के साथ आर्द्रता की आवृत्ति में वृद्धि को लेकर चिंतित हैं और उन्होंने इसे ‘वेट बल्ब तापमान’ करार दिया है.

दक्षिण एशिया में 2022 में मई और जून के महीने में उष्ण लहर ने कहर बरपाया और इस दौरान पाकिस्तान के जैकोबाबाद में अधिकतम वेट बल्ब तापमान 33.6 डिग्री सेल्सियस था. दिल्ली में यह तापमान सबसे ज्यादा था जो सैद्धांतिक रूप से मानव शरीर द्वारा सहनीय गर्मी की ऊपरी सीमा के करीब था. लोग अकसर 2010 में प्रकाशित एक अध्ययन का हवाला देते हैं जिसमें अनुमान लगाया गया कि 35 डिग्री वेट बल्ब तापमान (जो कि सौ प्रतिशत आर्द्रता के साथ 95 फारेनहाइट या 50 प्रतिशत आर्द्रता के साथ 115 फारेनहाइट के बराबर है) वह अधिकतम सीमा है जिसके बाद मानव शरीर पसीना निकालकर खुद को ठंडा नहीं रख सकता.

हाल में इस सीमा का प्रयोगशाला में मानव पर परीक्षण किया गया. इस परीक्षण के नतीजों में चिंता के और बड़े कारण सामने आए. हमने पेंसिल्वेनिया स्टेट विश्वविद्यालय की नोल प्रयोगशाला में एक परीक्षण किया जिसमें नियंत्रित वातावरण में युवा और स्वस्थ महिलाओं तथा पुरुषों पर गर्मी के प्रभाव का अध्ययन किया गया.

इस प्रयोग से पता चला कि तापमान और आर्द्रता का कौन सा संयोजन सबसे स्वस्थ व्यक्तियों के लिए भी नुकसानदायक सिद्ध हो सकता है. हर प्रतिभागी को एक ‘टेलीमेट्री’ की गोली निगलने के लिए दी गई ताकि उनके शरीर के भीतरी तापमान का पता चल सके. उन्हें एक पर्यावरण चैम्बर में बिठाया गया जिसमें ऐसा कृत्रिम माहौल बनाया गया जैसा आमतौर पर दैनिक गतिविधियों जैसे कि रहने, भोजन पकाने और खाने के दौरान होता है.

अनुसंधानकर्ताओं ने इसके बाद धीरे-धीरे चैंबर में तापमान या आर्द्रता का स्तर बढ़ाना शुरू किया. जिस तापमान और आर्द्रता के संयोजन पर व्यक्ति के शरीर का तापमान बढ़ना शुरू होता है उसे “महत्वपूर्ण पर्यावरणीय सीमा” कहा जाता है. इस सीमा से कम पर शरीर अपना तापमान स्थिर रख सकता है. इस सीमा से अधिक होने पर तापमान बढ़ता है और गर्मी से संबंधित समस्याएं बढ़ने लगती हैं. जब शरीर ज्यादा गर्म हो जाता है तब ऊष्मा निकालने के लिए हृदय को त्वचा में रक्त का प्रवाह तेज करने के वास्ते अधिक मेहनत करनी पड़ती है तथा जब पसीना निकलता है तो शरीर के द्रव्य कम होते हैं.

सीधे तौर पर, ज्यादा गर्मी से जान जाने की आशंका होती है. इससे बचने के लिए तत्काल ठंडक पहुंचाने और चिकित्सा की जरूरत होती है. हमारे अध्ययन में सामने आया कि युवा और स्वस्थ महिलाओं और पुरुषों में पर्यावरणीय गर्मी सहने की क्षमता 35 डिग्री सेल्सियस की सैद्धांतिक सीमा से भी कम है. यह 31 डिग्री सेल्सियस के वेट बल्ब तापमान के आसपास पाई गई. हाल में दुनियाभर में सामने आ रही ‘हीट वेव’ इस सीमा तक पहुंच रही है. इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिससे बुजुर्ग और बीमार लोगों को भी खतरा पैदा हो गया है.

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