इंटरव्यू: बोले अक्षय कुमार- पहले मैं स्टंटमैन हूं फिर एक्टर

Updated at : 13 Mar 2019 10:05 AM (IST)
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इंटरव्यू: बोले अक्षय कुमार- पहले मैं स्टंटमैन हूं फिर एक्टर

अभिनेता अक्षय कुमार जल्द ही पीरियड फिल्म ‘केसरी’ में नजर आनेवाले हैं. यह फिल्म 1897 की असल घटना से प्रेरित है. अक्षय को अपनी इस फिल्म पर गर्व है. उनका कहना है कि वे फिल्म के आखिरी आधे घंटे देखकर सुन्न हो गये थे. उन्हें आठ से दस मिनट सहज होने में लगा था. पेश […]

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अभिनेता अक्षय कुमार जल्द ही पीरियड फिल्म ‘केसरी’ में नजर आनेवाले हैं. यह फिल्म 1897 की असल घटना से प्रेरित है. अक्षय को अपनी इस फिल्म पर गर्व है. उनका कहना है कि वे फिल्म के आखिरी आधे घंटे देखकर सुन्न हो गये थे. उन्हें आठ से दस मिनट सहज होने में लगा था. पेश है अक्षय कुमार की उर्मिला कोरी से हुई बातचीत के प्रमुख अंश.

-फिल्म केसरी किस तरह की फिल्म है?

केसरी का इतिहास रहा है. 21 सिख, सिख रेजिमेंट के थे. दस हजार अफगानी लोगों के साथ लड़े थे. अगर आप गूगल करोगे तो पांच सबसे बड़े वॉर दुनिया के तो उसमें इसका नाम आता है, लेकिन कमाल की बात ये है कि इसके बारे में कोई जानता नहीं है. कम लोग जानते हैं. मैं चाहता हूं कि ये कहानी स्कूल में दिखायी जाये क्योंकि ये हमारे हिम्मत की कहानी है. ये हमारे सैनिकों की कहानी है. अगर हम आज के यूथ को पूछे कि आपको 300 के बारे में पता है तो वो बोलेंगे हां क्योंकि सभी ने हॉलीवुड फिल्म देखी हैं. लेकिन अपनी कहानी के बारे में उन्हें पता नहीं है. उन्हें सारागढी के बारे में पता नहीं है. मुझे लगता है कि उन्हें अपनी कहानी के बारे में पता होनी चाहिए. वहां तो 300 हैं यहां तो 21 ही हैं जो दस हजार लोगों के साथ लड़े थे. दस हजार जब अफगानी घुसपैठिए आए थे तो उन्हें लगा था कि वे आधे घंटे में 21 सिखों की आराम से खत्म कर देंगे, लेकिन उनका कैलकुलेशन गलत हो गया.

-पहले से आपको पता था इस युद्ध के बारे में ?

हां! पता था, लेकिन इतनी डिटेल जानकारी नहीं थी. फिल्म करते मुझे सारी जानकारी होती गयी कि क्या-क्या हुआ था. 21 सोल्जर 10 हजार घुसपैठियों से लड़े थे बस ये पता था.

-‘बैटल ऑफ सारागढी’ में राजकुमार संतोषी भी फिल्म बना रहे थे. रणदीप हुडा को लेकर लेकिन पैसों की वजह से वह फिल्म नहीं पूरी हो पायी क्या आप मदद करेंगे?
मेरी वजह से थोड़ी न छूटी है, लेकिन मैं चाहता हूं कि वो भी फिल्म पूरी हो. मैं उस सोच से आता हूं कि जहां कोई फिल्म अधूरी न रहे. मुझे 21 साल हो गये हैं इंडस्ट्री में. आज तक कोई फिल्म मेरी ऐसी नहीं है जो अधूरी रही है सिवाए एक के लेकिन वो भी मैंने कंप्लीट कर ली. हालांकि निर्माता ने उसे अभी तक रिलीज नहीं की.

-फिल्म में आपका लुक काफी अलग है?
सच कहूं तो एक बार जब आदमी पगड़ी पहन लेता है तो उसे अपने आप से एक जिम्मेदारी का एहसास हो जाता है. आपकी जो रीढ की हड्डी है. वो अपने आप सीधी हो जाती है. एक भार आ जाता है. जिसका मजा ही कुछ और है. आप सबसे कहूंगा कि आप पगड़ी डालकर तो देखिए क्या महसूस होता है. मैं बोलने के लिए नहीं बोल रहा हूं. मुझे लगता है कि इसकी कोई साइनटिफिक वजह भी हो सकती है. सर को पकड़ लेती है पगड़ी तो आपके शायद रीढ की हड्डी भी नजर के साथ सीधी हो जाती है. 1897 में जब वो पगड़ी पहनते थे तो वो डेढ से दो किलो की होती थी. वैसे इस फिल्म में मेरी भी पगड़ी डेढ किलो की थी. उसको पहनकर कूदना फांदना बहुत मुश्किल था. तलवारें जो उस वक्त होती थी वो तकरीबन तीस किलो की होती थी वो तो उठा उठाकर मारते थे क्योंकि तब हम खाते थे घी, अब स्ट्रेराइड. यह फिल्म कितनी चलेगी मैं नहीं जानता हूं. लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि मुझे इस फिल्म पर गर्व है.

-वेब सीरिज ‘द एंड’ आप करने वाले हैं कितना अलग अनुभव रहा है?

कैमरा और मेरी एक्टिंग तो वही रहेगी. हां स्टोरी लाइन और वेब की सोच थोड़ी अलग होती है. तौर-तरीका बहुत अलग और तेज होता है. फिल्मों में आराम से शूट करते हैं. एक दिन में अगर एडिट के बाद की बात की जाये तो हम डेढ़ से दो मिनट का काम करते हैं, लेकिन वो बहुत ही तेज होते हैं. वेब सीरिज में एक दिन में सात से आठ मिनट का काम होता है. मैं उत्साहित हूं इस नये माध्यम से जुड़ने को लेकर. वैसे भी मैं समय की बर्बादी में यकीन नहीं करता हूं. उम्मीद है कि मुझे इस माध्यम में बहुत कुछ नया सीखने को मिलेगा.

-हाल ही में ‘द एंड’ के अनाउंसमेंट के मौके पर आपने आग के साथ एक स्टंट किया था. क्या आपको लगता है कि ऐसे स्टंट्स से युवाओं को गलत संदेश जाता है?

मैंने पहले भी कहा है कि घर पर स्टंट न करें. जो भी स्टंट हम करते हैं. वहां तीन सौ चार सौ लोग रहते हैं. ध्यान देने के लिए. हम जेल लगाते हैं फिर ये स्टंट करते हैं. एक्शन मैं बचपन से करता आया हूं. आज के युवा स्मार्ट हैं, लेकिन हमें बोलना भी चाहिए कि ये ना करें. हम गलत मैसेज नहीं दे रहे हैं, लेकिन जिंदगी रिस्की है. फुटबॉल और हॉकी में भी लोग मरते हैं. हर चीज रिस्की है. स्टंटमैंन स्टंट करता है. रिस्क है, लेकिन लोगों की आमदनी होती है. मैं पहले स्टंटमैंन हूं फिर एक्टर हूं. मैं स्टंट की वजह से ही फिल्मों में आया हूं. मेरे दादा परदादा फिल्मों में नहीं थे. जो ऐसे ही आ जाये.

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