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खास बातचीत: बोले अभिनेता अविनाश- मैं खुद को बोलता हूं बिहारी बंबईया

Updated at : 26 Aug 2018 12:21 PM (IST)
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खास बातचीत: बोले अभिनेता अविनाश- मैं खुद को बोलता हूं बिहारी बंबईया

अभिनेता अविनाश तिवारी एकता कपूर और इम्तियाज अली की फिल्म लैला-मजनूं में मजनूं की शीर्षक भूमिका निभा रहे हैं. वह खुद को लकी करार देते हैं कि उन्हें इतने बड़े बैनर की फिल्म में लीड भूमिका मिली है. मजनूं की भूमिका को वह दिलचस्प बताते हैं. वह कहते हैं कि कैश भट्ट और मजनूं एक […]

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अभिनेता अविनाश तिवारी एकता कपूर और इम्तियाज अली की फिल्म लैला-मजनूं में मजनूं की शीर्षक भूमिका निभा रहे हैं. वह खुद को लकी करार देते हैं कि उन्हें इतने बड़े बैनर की फिल्म में लीड भूमिका मिली है. मजनूं की भूमिका को वह दिलचस्प बताते हैं. वह कहते हैं कि कैश भट्ट और मजनूं एक होकर भी दो किरदार हैं. उर्मिला कोरी से हुई बातचीत के प्रमुख अंश.

बालाजी प्रोडक्शन हाउस की लैला मजनू फिल्म से किस तरह से आपका जुड़ना हुआ ?
फिल्म के लिए 2015 में साजिद अली से मेरी मुलाकात हुई थी. उस वक्त अभिषेक और अनमोल इस फिल्म की कास्टिंग कर रहे थे. मैंने ऑडिशन दिया फिर उसके बाद भी काफी ऑडिशन हुए. इसके साथ ही देशभर में मजनू के किरदार के लिए और लोगों की भी खोज जारी थी. काफी लंबा समय लगा यकीन दिलाने में कि मैं ये कर सकता हूं. मजाक में एक बार कहा भी था कि मुझसे ज्यादा अच्छे दिखने वाले लोग हैं. मुझसे ज्यादा टैलेंटेड लोग भी हैं, लेकिन इस किरदार को जितना बेहतरीन तरीके से मैं निभा सकता हूं. उतना और कोई भी नहीं निभा सकता है. यह बात शायद उनलोगों को जंच गयी और निश्चित तौर पर मेरे ढेर सारे ऑडिशन ने भी काम कर दिया लेकिन इसी बीच 2016 में यह फिल्म रुक गयी क्योंकि उस वक्त एकता कपूर का प्रोडक्शन हाउस वित्तिय घाटे से गुजर रहा था. 2017 में उन्होंने फिर से लैला मजनू को शुरू करने का फैसला कर लिया .

क्या मौजूदा दौर में भी लैला मजनू की प्रेम कहानी आज भी प्रसांगिक है?
मुझे इस बात की कोई चिंता ही नहीं थी कि क्योंकि सभी क्लासिकल और एपिक लवस्टोरीज हमेशा ही नयी होती है. वो टाइमलेस होती हैं. समय के उपर वो निर्भर ही नहीं करती हैं. मैं इस फिल्म की ही बात करूं तो अगर इस फिल्म का नाम लैला मजनू नहीं रखा गया होता और आप फिल्म देखकर आते और मैं आपसे कहता कि ये जो कहानी आप देखकर आएं हैं ये लैला मजनू की कहानी है तो आप गौर करते.

क्या फिल्मों में लीड़ रोल मिलना मुश्किल हो रहा था?
युद्ध में मैं मिस्टर अमिताभ बच्चन साहब के साथ वन एंड वन वाला मेरा किरदार था. मेरा किरदार ही उनसे बदला ले रहा था मुझे नहीं लगता कि वह किसी भी लिहाज से छोटा था. वैसे वह टीवी होते हुए भी एक फिल्म की तरह था. अमिताभ बच्चन उसमें एक्टिंग कर रहे थे. अनुराग कश्यप ने निर्देशन की कमान संभाली थी. उस फिल्म में भी मेरे काम को बहुत सराहा गया था.

आपके लिए संघर्ष क्या रहा है?
मैं 15 साल से एक्टिंग कर रहा हूं. 2003 में ही मैंने एक्टिंग शुरू कर दी थी. थिएटर से मेरी शुरुआत हुई थी. दो साल थिएटर करने के बाद दिल्ली में मैंने बैरी जॉन के यहां एक्टिंग की ट्रेनिंग ली. न्यूयॉर्क फिल्म एकेडमी गया वहां कोर्स किया लगा कि दुनिया मेरा इंतजार कर रही होगी, लेकिन हकीकत मालूम हुआ कि यहां तो कोई मुड़कर भी पीछे नहीं देखता है. मैं ये भी कहूंगा कि बतौर एक्टर आप भूखे नहीं मरोगे. इतने सारे माध्यम हैं. आपको कुछ न कुछ मिल ही जायेगा.

क्या कभी ख्याल आया कि एक्टिंग को छोड़ देना चाहिए ?
मुझेअपने पर विश्वास था. अपनी डिजायर को पाने के लिए डिजर्विंग बनना पड़ता है. मौका क्यों नहीं मिलेगा. मै अच्छी एक्टिंग कर सकता हूं. ठीक ठाक दिखता हूं. दूसरों से ज्यादा मेहनत कर सकता हूं तो मुझे मौका मिलेगा ही.मैंने हमेशा खुद को कहा और सही मौके का इंतजार किया.

आप अपने बैकग्राऊंड के बारे में बताइए.
मेरी पैदाइश बिहार की है. मैं बिहार के गोपालगंज का रहने वाला हूं. सात साल की उम्र में मुंबई अपने माता-पिता के साथ आ गया. यहीं पला बढ़ा मैं इंजीनियरिंग कर रहा था जब तय किया कि एक्टिंग करुंगा मैंने इंजीनियरिंग छोड़ दी क्योंकि मैं खुद को अभिनय की ट्रेनिंग देना चाहता था. घर वाले खिलाफ हो गये थे. डेढ साल उनको मनाने में लग गये. मां कई बार रोती भी थीं. एक बार घर में रंगाई का काम चल रहा था. उन्होंने कहा कि पेंटर भी 12वीं पास हैं. मैं भी 12वीं ही पास था. देश में अभी तक फिल्मों की पढ़ाई को इज्जत नहीं दी जाती है.

बिहार से क्या अब भी आपका जुड़ाव है?
बिहार बिहारी से कभी नहीं निकल सकता है. मैं हर साल बिहार जाता हूं. अक्टूबर में भी जा रहा हूं. मेरे पापा फिलहाल बिहार ही गये हैं. वह फिल्म के रिलीज के पहले वापस आयेंगे. अपनी फिल्म के प्रोमोशन के लिए भी बिहार जा रहा हूं. मैं खुद को बिहारी बंबईया बोलता हूं. मैं लोगों से कहता हूं कि बिहारी बंबईया से बचकर रहना क्योंकि बिहारी जुझारुपन और दिमाग का खेल है. बंबई का भी अपना जुझारुपन है और जब ये मिल जाता है तो फिर और कुछ नहीं चाहिए. किसी और में ताकत हो सकती है स्टेमिना हो सकता है, लेकिन टिके रहने का जो जज्बा ये बिहारी मुंबईया में है.

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