अभिमत

Columns, Review, Guest Authors

गलत नीतियों की देन है मंदी

।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।
अर्थशास्‍त्री
- वर्तमान खपत नियंत्रित करने और निवेश बढ़ाने से दीर्घकाल में खपत बढ़ती है. मनमोहन सिंह की पॉलिसी इसके ठीक विपरीत है. वे सरकारी खजाने से वोट ‘खरीदना’ चाहते हैं. -

संवेदना के साथ खिलवाड़

।। नीलांशु रंजन ।।
(टीवी पत्रकार)
महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार एक दिन के उपवास पर बैठे- शायद यह दिखाने के लिए कि उन्हें अपनी बयानबाजी पर तकलीफ है. माफी तो शरद पवार को भी मांगनी चाहिए थी. पर यहां सवाल उपवास या माफी का नहीं है, सवाल है संवेदना का, मानवीय मूल्यों का. वे उपवास पर तब बैठे जब उनकी बयानबाजी को लेकर काफी बवाल मच गया. यह एक दूसरा धर्म है. अगर वे शुरू में ही इस बात को लेकर उपवास पर बैठते, और कहते कि जब तक आम जनों को पानी नहीं मिलेगा, वे दाना-पानी नहीं लेंगे, तो जनता उन्हें सिर आंखों पर बिठाती.

हिंदी सिनेमा के ‘प्राण’

।। विनोद अनुपम ।।
(फिल्म समीक्षक)
- 93 वर्ष की उम्र में भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान ‘दादा साहेब फाल्के सम्मान’ से उन्हें सम्मानित करने की घोषणा से यही लगता है, वास्तव में यह भाईचारे, समर्पण और अभिनय की उस परंपरा को याद दिलाने की कोशिश है जिसके प्रतीक पुरुष हैं प्राण. -

इस यात्रा का अंत क्या?

।। शीतला सिंह ।।
(जनमोर्चा के संपादक)
खुद को दलितों की मसीहा बताने वाली पार्टी के एक अरबपति उम्मीदवार के हत्यारों की खोज हो रही थी तो दूर के अपराधी के बजाय उसका सगा छोटा बेटा ही अभियुक्त निकला और इस कार्य के वाहक भी वे जिन्हें हम साधु-संन्यासी यानी सांसारिक सुखों से अलग बताते हैं. वह सन्यासी अभी पुलिस की पकड़ में नहीं आया है जिसने पैसे के कारण इस मौत को अंजाम देने में मदद की.

क्षितिज पर उभार ले रहा नया जीवन

।। एम जे अकबर ।।
(वरिष्ष्ठ पत्रकार)
- 1984 के सिख दंगों को उकसाने वाली भीड़ के कई लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं. कानूनी इंसाफ बेदम है, क्योंकि प्रतिष्ठान ने कसूरवार की रक्षा की है. इसके बावजूद ऐसे दो विशिष्ट लोग हैं, जो 29 साल तक कांग्रेस से मिली सुरक्षा और प्रमोशन के बावजूद अपने प्रेतों को दूर नहीं कर पाये. इस दौरान सज्जन कुमार सांसद रहे. दूसरे शख्स जगदीश टाइटलर हैं. -

‘हार्ट ऑफ इंडिया’ होगा बिहार!

।। अश्विनी कुमार ।।
(टीआइएसएस में प्रोफेसर है.)
- विशेष राज्य की बिहार की मांग का मतलब सिर्फ आर्थिक असंतुलन को दूर करना नहीं है, बल्कि आगामी चुनाव के बाद भारत की राजनीति की दिशा तय करने का भी संकेत है. -

जुमले नहीं, राह है जरूरी

।। विश्वनाथ सचदेव ।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
एक दौर था जब पत्रकारिता के स्कूलों में खबर की परिभाषा में कब, क्या, कहां, कैसे और क्यों के जवाबों को जोड़ कर रखा जाता था. यह भी सिखाया जाता था कि ‘क्या हुआ’ खबर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. यह भी कि नेताओं के भाषण कभी-कभी ही खबर बनने लायक होते हैं. पर अब तो हमारे मीडिया को देख कर ऐसा लग रहा है जैसे नेताओं के भाषण ही सबसे महत्वपूर्ण होते हैं. नेता कुछ भी बोलें, तो खबर बन जाती है और इसमें भी ‘क्यों बोला’ इतना महत्वपूर्ण नहीं होता. इसके उदाहरण हैं नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी.

फेरूमान का बलिदान

।।सुरेंद्र किशोर।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
एक प्रतिष्ठित संपादक अपने संवाददाताओं से कहा करते थे कि आम तौर पर आमरण अनशन न लिखें. इसकी जगह अनिश्चितकालीन अनशन लिखना चाहिए. लेकिन पंजाब के मशहूर नेता दर्शन सिंह फेरूमान का अनशन सचमुच आमरण ही साबित हुआ. 15 अगस्त, 1969 को उन्होंने अनशन शुरू किया था.

अधिनायक का घमंड!

।।अरविंद मोहन।।
(वरिष्ठ पत्रकार)

राजनीतिक जंग का यह मैदान

।। पीयूष पांडे ।।
(संपादक, सोशल मीडिया, आइबीएन7)
- सोशल मीडिया पर राजनीतिक जंग का आगाज हो चुका है, इस लड़ाई की पहली बड़ी झलक बीते सोमवार को तब दिखी जब ट्विटर पर ‘फेकू’ शब्द ट्रेंडिंग टॉपिक बन गया. -