अभिमत

Columns, Review, Guest Authors

भ्रष्टाचार का आर्थिक पहलू

।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।
(अर्थशास्त्री)
यदि घूस लेनेवाले और गलत नीतियां बनानेवाले के बीच चयन करना हो तो मैं घूस लेनेवाले को पसंद करूंगा. कारण यह कि घूस में लिया गया पैसा अर्थव्यवस्था में वापस प्रचलन में आ जाता है. लेकिन गलत नीतियों का प्रभाव दूरगामी और गहरा होता है. जैसे ईमानदार नेता विदेशी ताकतों के साथ गैर-बराबर संधि कर ले अथवा गरीब के रोजगार छीन कर अमीर को दे दे, तो देश की आत्मा मरती है और देश अंदर से कमजोर हो जाता है.

कैसा राज, कैसा समाज!

।। कृष्ण प्रताप सिंह ।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
यह बात अब आईने की तरह साफ है कि इस देश को समता, स्वतंत्रता और न्याय पर आधारित संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी व पंथनिरपेक्ष गणराज्य बनाने के संकल्प को संविधान की पोथियों में अकेला छोड़ देना हम पर भारी पड़ने लगा है. क्योंकि इससे अंधाधुंध उपभोग व अमीरी की हवस पैदा करने वाला, असमानता व शोषण पर आधारित जो मानवीय गरिमाहीन, असामाजिक, निर्मम, बलात्कारी व स्वार्थी समाज बन रहा है, उसमें खास व आम के बीच की खाई निरंतर चौड़ी होती ही जा रही है.

भ्रष्टाचार कभी गुण में नहीं बदलता

।। एम जे अकबर ।।
(वरिष्ष्ठ पत्रकार)
- बीते एक दशक का सबसे बड़ा भ्रम यह रहा कि हम भरोसा करते रहे कि डॉक्टर मनमोहन सिंह एक भ्रष्टचार मुक्त सरकार और शासन देंगे, क्योंकि वे खुद बेहद ईमानदार हैं. टूजी स्पेक्ट्रम और कोल घोटालों में आये नये खुलासों ने साबित किया है कि उनकी अपनी छवि ने मंत्रियों के लिए भारी लूट को ढांपने का काम किया है. वे जानते थे, और उन्होंने इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया. -

कैग रिपोर्ट से आगे मनरेगा

।। अश्विनी कुमार ।।
(प्रोफेसर, टीआइएसएस)
- कैग का परीक्षण वित्तीय दृष्टिकोण से मनरेगा की कमियों को उजागर करता है, वहीं दूसरी तरफ इसकी ऐतिहासिक सफलताओं को नजरअंदाज करता है. -

दर्द का हद से बढ़ना दवा नहीं

।। विश्वनाथ सचदेव ।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
उस दिन अखबार के उस पन्‍ने पर सिर्फ बलात्कार की खबरें थीं. देश की राजधानी से लेकर असम की राजधानी तक से जुड़े वे समाचार एक बेबसी और लज्जा का बोध तो करा रहे थे, पर हैरानी की बात है कि कोई हैरानी नहीं हुई थी वह सब पढ़कर.

राधाकृष्णन बनाम इंदिरा

।।सुरेंद्र किशोर।।

बहस से बचने का खेल

।।अरविंद मोहन।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
संसद के इस सत्र पर भी खतरा है. खतरा किससे है और कौन जिम्मेवार है, इस बहस को आगे उठाएं, लेकिन यह कहना जरूरी है कि अगर सदन चला ही नहीं, तो हमारे लोकतंत्र का, इसकी संस्थाओं का महत्व कुछ नहीं रह जायेगा. बीते काफी समय से यह हो रहा है कि सिर्फ जरूरी औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए सांसद जमा होकर हाथ उठा देते हैं और सदन सामान्य काम नहीं कर पाता.

कॉलेजों की रेटिंग कीजिए

।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।
(अर्थशास्‍त्री)
सरकार ने बड़े औद्योगिक घरानों को निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों की स्थापना की छूट दे दी है. आज सरकारी कॉलेजों से बड़ी संख्या में इंजीनियरों को तैयार किया जा रहा है, पर उनकी गुणवत्ता कमजोर है. एक तरफ उद्योगों को कुशल इंजीनियर नहीं मिल रहे हैं, तो दूसरी तरफ घटिया इंजीनियर रोजगार के लिए तड़प रहे हैं. औद्योगिक घराने अपनी आवश्यकता के अनुरूप अच्छी गुणवत्ता के इंजीनियर तैयार कर सकें, इसलिए इन्हें अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण में कॉलेज खोलने की छूट दी गयी है. यह स्वागतयोग्य कदम है.

इस ‘शिकारी’ समय में

।। अंजलि सिन्हा ।।
(सामाजिक कार्यकर्ता)
- आज लगभग हर घर में टीवी है. गलाकाट प्रतियोगिता के दौर में बाजार का बड़ा नेटवर्क भी तैयार है. यहां भी युवा यौन कुंठा पालना सीख जाता है. शिकार तलाशना सीखता है. -

न्याय का ईमानदार एक्टिविस्ट

।। सुभाष कश्यप ।।
(संविधानविद्)
- भारतीय पूंजी का रूप-स्वरूप जैसा है, क्या उससे भारत का सामान्य जन लाभान्वित होगा? भारतीय समाज का स्वस्थ विकास होगा? क्या लुम्पेन और क्रोनी पूंजीवाद ही भविष्य है? -