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patna

  • Sep 14 2017 11:25AM

जदयू पर कब्जे की लड़ाई : शरद यादव के सामने अपनी सियासी विरासत बचाने को ये हैं चुनौतियां!

जदयू पर कब्जे की लड़ाई : शरद यादव के सामने अपनी सियासी विरासत बचाने को ये हैं चुनौतियां!

पटना : बिहार में महागठबंधन से अलग होकर भाजपा के साथ दोबारा से गठबंधन कर नीतीश कुमार के नयी सरकार के गठन के फैसले के बाद से ही बगावत के रास्ते चल पड़े शरद यादव गुट को जदयू पर कब्जे की लड़ाई में चुनाव आयोग से करारा झटका लगा है. इस मामले में चुनाव आयोग ने अपने फैसले में कहा कि शरद गुट जदयू पर पुख्ता दावेदारी के मामले में अपने पक्ष को सही ढंग से नहीं रख सका. जिसके बाद साफ है कि जदयू पर वर्चस्व की लड़ाई में नीतीश खेमे ने बाजी मार ली है. अब बड़ा सवाल यह है कि जदयू पर कब्जे की लड़ाई में नीतीश गुट के भारी पड़ने के बाद वर्तमान राजनीति में शरद यादव क्या एक बार फिर परचम लहराने में कामयाब हो पायेंगे. शरद यादव के तेवर से साफ है कि वो अपनी लड़ाई को और आगे बढ़ायेंगे.

पहाड़ से लड़ रहे हैं, तो चोट लगेगी ही : शरद

जदयू के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव ने पार्टी और राज्यसभा की अपनी सदस्यता पर मंडराते संकट पर अपना पक्ष रखते हुए दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत में बुधवार को कहा कि उनकी लड़ाई पद की नहीं सिद्धांत और संविधान बचाने की है. शरद यादव ने कहा, उन्हें राज्यसभा से सदस्यता खत्म करने को लेकर नोटिस मिला है जिसका वह माकूल जवाब देंगे. चुनाव आयोग द्वारा पार्टी पर शरद गुट के दावे पर संज्ञान नहीं लेने और राज्यसभा का नोटिस मिलने के बाद अपना पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि इन कानूनी पहलुओं को उनके वकील देख रहे हैं, वह देश की साझी विरासत पर आधारित संविधान को बचाने की बड़ी लड़ाई के निकल पड़े हैं. राज्यसभा की सदस्यता जाने के खतरे के सवाल पर उन्होंने कहा कि हम पहाड़ से लड़ रहे हैं तो यह सोच कर ही लड़ रहे हैं कि चोट तो लगेगी ही. राज्यसभा की सदस्यता बचाना बहुत छोटी बात है, सिद्धांत के लिये हम पहले भी संसद की सदस्यता से दो बार इस्तीफा दे चुके हैं.

जदयू के भविष्य के सवाल पर शरद बोले...
जदयू के भविष्य के सवाल पर उन्होंने कहा कि 17 सितंबर को पार्टी कार्यकारिणी और 8 अक्टूबर को राष्ट्रीय परिषद की बैठक के बाद जदयू बड़े रूप में सामने आयेगी. अपनी भविष्य की रणनीति के बारे में शरद यादव ने कहा कि वह सिद्धांत और संविधान को बचाने की राह पर है और उनके विरोधी इसकी उलट राह पर हैं. उन्होंने जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार पर तंज कसते हुए कहा कि हमारे मुख्यमंत्री मित्र ने खुद राजद प्रमुख लालू प्रसाद से जब महागठबंधन बनाने की पहल की थी तब भी वह भ्रष्टाचार के आरोपों से बाहर नहीं थे. जबकि महागठबंधन की सरकार बनने के बाद अचानक शुचिता के नाम पर गठजोड़ तोड़ दिया. शरद यादव ने कहा कि हम सिद्धांत और संविधान के साथ खड़े हैं और साझी विरासत के मंच से इसे लड़ा जायेगा.

जानकारी के मुताबिक दिल्ली के कांस्टीच्यूशन क्लब में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उन सभी 27 राज्यों के प्रतिनिधि भाग लेंगे जहां पार्टी की इकाई कार्यरत है. उम्मीद जतायी जा रही है कि इस बैठक में पंद्रह से अधिक राज्यों के पार्टी अध्यक्ष भी शामिल होंगे. इसके बाद दिल्ली स्थित मावलंकर हॉल में 8 अक्टूबर को राष्ट्रीय परिषद की बैठक आयोजित होगी, जिसमें राष्ट्रीय कार्यकारिणी के फैसलों पर मुहर लगेगी. राष्ट्रीय कार्यकारिणी में 75 लोग शामिल हैं और आमंत्रित सदस्यों को लेकर यह संख्या करीब 125 है.

शरद को दोहरा झटका
भाजपा के साथ गठबंधन के नीतीश कुमार के फैसले से नाराज चल रहे जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव को बुधवार को दोहरा झटका लगा है. एक ओर चुनाव आयोग ने जहां जनता दल यूनाइटेड पर शरद यादव के दावे काे खारिज करते हुए नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जदयू को ही असली करार दिया है. वहीं दूसरी ओर राज्यसभा सचिवालय ने जदयू के बागी सांसदों शरद यादव और अली अनवर से स्पष्टीकरण मांगा है और पूछा है कि पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में क्यों न दोनों सांसदों की सदस्यता रद्द कर दी जाएं. राज्यसभा ने दोनों सांसदों से एक सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा है.

राष्ट्रपति चुनावों के साथ ही नीतीश-शरद में शुरू हो गया था मतभेद

राजनीतिक जानकारों की मानें तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव के बीच मतभेद का दौर राष्ट्रपति चुनावों के साथ ही शुरू हो गया था. एनडीए द्वारा रामनाथ कोविंद को प्रत्याशी घोषित किये जाने के बाद, कांग्रेस की अगुवाई में करीब 18 दलों के गठबंधन ने साझा उम्मीदवार उतारने का एलान किया था, लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री सह जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने रामनाथ कोविंद को समर्थन देने का एलान किया था, जिसके बाद पार्टी के अंदर खींचतान शुरू होने की बात बतायी जाती है. इसके साथ-साथ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर नीतीश कुमार और लालू के रिश्तों में तल्खी आ रही थी. जिसके बाद जदयू के भीतर अंदरूनी कलह तेजी से बढ़ने की चर्चा जाेर पकड़ने लगी.

शरद पर राज्यसभा से इस्तीफा देने का दबाव

जदयू के राष्ट्रीय महासचिव व राज्यसभा में पार्टी के नेता आरसीपी सिंह ने पार्टी के बागी नेता शरद यादव पर पलटवार करते हुए कहा है कि अगर वे उसूल व शुचिता की बात कर रहे हैं तो पहले राज्यसभा से इस्तीफा दें. उन्होंने कहा कि सांसदी बचाने के लिए शरद यादव जोड़-तोड़ की राजनीति से परहेज करें. आरसीपी सिंह ने कहा कि भ्रष्टाचारियों के साथ रहकर शुचिता की बात करना बेमानी है. शुचिता होती तो वे पार्टी के साथ रहते, न कि स्वेच्छा से दल का त्याग करतें. उन्होंने आगे कहा कि दस साल जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष पद पर रहते हुए शरद यादव ने जदयू को राष्ट्रीय से बिहार की पार्टी तक सीमित कर दिया. हवा-हवाई नेताओं के साथ वे दिल्ली में ही बैठे रहें, जबकि बिहार ने उनको लोकसभा तो कभी राज्यसभा भेजा.

अपने दूसरे चरण की यात्रा पर 25 सितंबर को बिहार आयेंगे शरद
जदयू के बागी नेता शरद यादव अपने दूसरे चरण की बिहार यात्रा 25 सितंबर से आरंभ करेंगे. 28 सितंबर तक चलने वाली इस जन-संवाद यात्रा के दौरान जदयू के बागी नेता शरद यादव बिहार के छह जिलों में सभाएं करेंगे. शरद यादव भोजपुर, बक्सर, कैमूर, रोहतास, गया एवं औरंगाबाद में सभाएं करेंगे. इससे पहले शरद यादव ने 10 से 13 अगस्त के दौरान पहले चरण की यात्रा की थी.

शरद यादव के राजनीतिक सफर पर एक नजर
छात्र राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति में पहचान बनाने वाले शरद यादव बिहार की राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल किया है. जदयू के पूर्व अध्यक्ष ने मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और फिर बिहार में अपना राजनीतिक परचम लहराया है. शरद यादव का जन्म 1 जुलाई 1947 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में एक किसान परिवार के यहां हुआ था. पढ़ाई के दिनों से ही शरद की रुचि राजनीति में थी. शुरुआती शिक्षा के बाद उन्होंने 1971 में इंजीनियरिंग करने के लिए जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया और यहीं से उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई. इसी कॉलेज में वह छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गये.

- शरद यादव ने डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रेरित होकर कई राजनीतिक आंदोलनों में हिस्सा लिया और मीसा के तहत 1969-70, 1972, और 1975 में हिरासत में लिए गये. उन्होंने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करवाने में भी अहम भूमिका निभायी.
- 1974 में मध्य प्रदेश की जबलपुर लोकसभा सीट से शरद यादव पहली बार सांसद चुने गये. यह जेपी आंदोलन का समय था. इसके बाद 1977 में भी शरद यादव यहां से जीते. इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के बदायूं से चुनाव जीता.
इसके बाद शरद यादव ने बिहार का रुख किया. उन्होंने बिहार के मधेपुरा में 1991, 1996, 1999 और 2009 में जीत दर्ज की. इसके अलावा भी उन्होंने 3 बार अलग-अलग लोकसभा सीट से जीत दर्ज की.
- शरद यादव को मधेपुरा सीट पर 1998 और 2004 में लालू यादव ने हराया, जबकि एक बार वह राजद के किसी अन्य नेता से हार गये.
- 1995 में उन्हें जनता दल का कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया. इसके बाद वह 1997 में जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनें. - 13 अक्तूबर 1999 से 31 अगस्त 2001 तक वह नागरिक उड्डयन मंत्री रहे. इसके बाद 1 सितंबर 2001 से 30 जून 2002 तक शरद यादव श्रम मंत्रालय में कैबिनेट मंत्री चुने गये.
- 2004 में वह एक फिर राज्यसभा सांसद चुने गये और गृह मंत्रालय समेत कई कमेटियों के सदस्य बने.
- शरद यादव फिलहाल जदयू के टिकट से राज्यसभा सांसद हैं.

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