अद्भुत : झारखंड की एक ऐसी जगह जहां नमक से होती है देवी पूजा

By Prabhat Khabar Digital Desk
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- डॉ आरके नीरद

झारखंड के संताल परगना में एक जगह ऐसी है, जहां नमक की देवी की नमक से पूजा होती है. देवी को प्रसाद में नमक और बताशे चढाये जाते हैं. यही देवी का भोग है. नमक का भोग चढ़ाने दूर-दूर से लोग आते हैं. बिहार और पश्चिम बंगाल से भी. यहां मेला भी लगता है. यह 'नुनबिल मेला' के नाम से सरकारी और ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है. यह मेला मकर संक्रांति के ठीक दूसरे दिन शुरू होता है और आठ दिनों तक चलता है. इन्हीं आठ दिनों में नमक की देवी की यहां पूजा होती है. यह मेला झारखंड के दुमका जिले के मसलिया अंचल कार्यालय से छह मील दूर दक्षिण दिशा में दलाही गांव में एक छाेटी-सी नदी के तट पर लगता है. इस देवी और नदी के नाम भी 'नुनबिल' हैं - 'नुनबिलबुढ़ी', 'नुनबिल नदी'. 'नुनबिल' में दो शब्दों का योग है- 'नून' यानी नमक और 'बिल' यानी बिला जाना, गायब हो जाना. यह पारिस्थितिकीय मानवशास्त्रीय दृष्टि से लघु परंपरा का अनोखा तत्व है. यहाँ लघु परंपरा की सार्वभौमिकता अौर दीर्घ परंपरा के सन्कुचितीकरण (Parochialisation) के संकुल की पारिस्थितिकीय संरचना अद्भुत है.



यहां नमक की देवी की नमक से पूजा की परंपरा कितनी पुरानी है, इसकी ठीक-ठीक जानकारी किसी को नहीं है. मान्यता है कि है कि यह पूजा पांच सौ साल पहले शुरू हुई थी. 1910 में प्रकाशित एसएसएल ओ'मैली के 'बंगाल डिस्ट्रिक्ट गजेटियर : संथाल परगना' के मुताबिक सन 1900 के बहुत साल पहले भी यह पूजा प्रचलन में थी और उस स्थान पर तब भी मेला लगता था. तब नुनबिल मेले की लोकप्रियता बासुकिनाथ श्रावणी मेले से भी ज्यादा थी और उससे भी ज्यादा भीड़ यहां जुटती थी. प्रोसिडिंग ऑफ द रॉयल आयरिश एकेडमी, 1893 (पेज-166) के मुताबिक इस मेले में एक लाख लोग जुटते थे, जबकि संताल परगना के दूसरे शीतकालीन मेलों में तब बहुत मामूली भीड़ जुटती थी. तब नुनबिल मेला दिसंबर में लगता था. उस समय यहां शाल का एक विशाल पेड़ था और लोगों की मान्यता थी कि नुनबिल देवी का वास इसी पेड़ में है. बाद के वर्षों में यह मेला जनवरी में मकर संक्रांति के ठीक दूसरे दिन से लगने लगा. आरएम दास के मेनू ऑन क्राइम एंड पनिशमेंट (पेज 125) के मुताबिक 1907-08 से 1935-36 तक जितनी भीड़ बासुिकनाथ मेले में जुटी थी, उतने ही लोग नुनबिल मेले में भी पहुंचे थे. जर्नल आॅफ द एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल (1891, खंड 59, पेज 233) और पीसी राय चौधरी के बिहार डिस्ट्रिक्ट गजेटियर : संताल परगना (1957, खंड 13, पेज 302) भी इस बात के साक्ष्य देते हैं कि नुनबिल मेला संताल परगना का अत्यंत प्रमुख मेला था. सेंसस ऑफ इंडिया (1961, बिहार, पेज 26) में यह पहाड़िया आदिवासी मेले के रूप में दर्ज है, जो माघ महीने में लगता था.



संताल परगना में मकर संक्रांति पर और उसके बाद कई स्थानों पर मेले लगते हैं. कई मेले गर्म जलकुंडों और जलस्रोतों के निकट भी लगते हैं. वहां भी लोकदेवियों की सालाना पूजा की परंपरा है और वहां के पुजारी भी आदिवासी समाज के हैं. वहां आदिवासी और गैर आदिवासी, दोनों समुदाय के लोग जुटते हैं. दोनों की मान्यताओं और आस्था का स्वरूप समान है, लेकिन कहीं भी नमक से देवी की पूजा नहीं होती. नमक से पूजा की प्रथा केवल नुनबिल मेले में ही है. पाकुड जिले के पाकुड़िया प्रखंड के सीतापुर में मकर संक्रांति पर एक दिन का और लिट्टीपाड़ा प्रखंड के नावाडीह में दस दिनों का मेला लगता है. दोनों स्थानों पर गर्मजल के स्रोत (कुंड) हैं. दुमका जिले के जामा अंचल के बारापलासी में नदी के तट पर मकर संक्रांति के दिन तातलोई मेला लगता है. यहां भी गर्मजल कुंड है. गोड्डा जिले में पोड़ैयाहाट-हंसडीहा मार्ग पर कठौन से पांच किमी पश्चिम नीमकर गांव में मकर संक्रांति मेला लगता है. यहां गर्मजल कुंड और नीमकर तालाब है. यहां 'निहरनी माई' की पूजा होती है. इस मेले और यहां की लोकदेवी के विषय में भी कई दंतकथाएं और मान्यताएं प्रचलित हैं. जमाताड़ा जिले के नारायणपुर अंचल में मकर संक्रांति पर 15 दिनों का मेला लगता है. यहां 1907 से दुखिया बाबा की पूजा होती है. दुखिया बाबा को लेकर भी कई दंतकथाएं हैं. देवघर जिले में अजय नदी और पतरो नदी के मुहाने पर दो मुहानी मेला भी मकर संक्रांति के अवसर पर लगता है. इसी नदी के किनारे देवघर-सारठ पथ पर चारमारा घाट पर जियाखाड़ा मेला लगता है. जियाखड़ा मेले में जियामाता की पूजा होती है. जियामाता भी लोकदेवी हैं और उनको लेकर भी कई मान्यताएं हैं. इन सभी मेलों में आदिवासी समाज के लोग भी जुटते हैं. सीतापुर, तातलोई, नीमकर और नावाडीह आदि मेलों में तो संताल सफाहोड़ संप्रदाय के लोग भी आते हैं. इन सभी गर्मजल कुंडों को लेकर यही मान्यता है कि उनमें स्नान करने से चर्म रोग दूर होता है. नुनबिल मेले के गर्मजल कुंड को लेकर भी यही मान्यता है, मगर नमक से देवी की पूजा केवल इसी मेले में प्रचलित है और इस मेले को विशिष्ट बनाता है.



नुनबिल मेले, नुनबिल बूढ़ी और नुनबिल नदी को लेकर कई दंतकथाएं प्रचलित हैं. इनके मुताबिक प्राचीन काल में एक दिन कुछ गाड़ीवान नमक के बोरों से भरी बैलगाड़ी लेकर नुनबिल नदी के रास्ते गुजर रहे थे. नदी के तट तक पहुंचते-पहुंचते अंधेरा घिर गया. नदी में पानी अधिक था. इसलिए गाड़ीवानों ने वहीं पड़ाव डाला दिया. रात में जब सभी खाना खाने लगे, तब एक बुढ़िया प्रकट हुई. वह अत्यंत कुरूप थी. उसका शरीर घावों से भरा था. उसने गाड़ीवानों से खाना मांगा. दूसरी दंतकथा के अनुसार बुढ़िया ने गाड़ीवानों से नमक मांगा. गाड़ीवानों ने उसे दुत्कार दिया. एक नौजवान गाड़ीवान को दया आ गयी. उसने उसे थोड़ा खाना दे दिया. दूसरी दंतकथा के अनुसार दयालु नौजवान गाड़ीवान ने बुढ़िया को एक चुटकी नमक दिया. हथेली पर नमक के पड़ते ही बुढ़िया स्वस्थ और सुंदर हो गयी. बुढ़िया ने उस गाड़ीवान से कहा कि वह तुरंत वहां से चला जाए, क्योंकि थोड़ी देर में ही वहां भीषण तूफान आने वाला है. उस गाड़ीवान ने बुढ़िया की बात मान ली. नदी का पानी अचानक कम हो गया और वह वहां से चला गया. थोड़ी देर बाद वास्तव में भीषण तूफान आया और भारी वर्षा होने लगे. देखते-ही-देखते बाकी गाड़ीवानों की बैलगाड़ियों पर लदा नमक गल गया और दलदल में बदल गया. गाड़ीवान अपने बैलों सहित उस दलदल में डूब गये. दूसरे दिन पास के धोबना गांव का फुकाई पुजहर मवेशी चराता हुआ वहां पहुंचा. उसने वहां का दृश्य देखा, तो डर से कांपने लगा. वह भय से घर लौट गया. उसी रात उसे सपना आया. सपने में एक रात पहले की घटना उसने देखी. उससे कहा गया कि वह उस स्थन पर बेदी स्थापित करे और देवी को नमक एवं बताशा से पूजा करे. दूसरे दिन उसने आसपास के भी गांव वालों को बुलाया और सपने वाली बात सभी को बतायी. सभी की राय से उसने नदी के तट तक दलदल के बगल में शाल के विशाल वृक्ष के नीचे देवी का पिंड बनाया और पास के गर्मजल कुंड में स्नान कर देवी को नमक और बताशा चढ़ाया. तभी से इस नदी का नाम नुनबिल और देवी का नाम नुनबुढ़ी पड़ा. यहां नुनबुढ़ी देवी की नमक और बताशे से पूजा होने लगी. यहां मेले भी लगने लगे, जिसमें दूर-दूर से नमक के कारोबारी आने लगे और यहां नमक-बताशा बेचने लगे. अब भी दूर-दूर से व्यापारी इस मेले में नमक बेचने आते हैं. ऐसी मान्यता है कि यहां नमक बेचने से कारोबारी-जीवन में उन्नति आती है.



नदी के तट पर जहां नुनबिल देवी का पिंड है, उसके पास ही अब भी बड़ा-सा दलदल है. इसके पास ही गर्मजल का स्रोत है, जिसे प्रशासन ने कुंड का रूप दे दिया है. आज भी चर्मरोग जैसी बीमारियों से मुक्ति की कामना लिए हजारों लोग यहां आते हैं और इस गर्मजल कुंड में स्थान करते हैं. हालांकि यहां का पानी गंदा है, लेकिन आस्था के आगे गंदगी कोई मायने नहीं रखती.



इन दंतकथाओं के विश्लेषण के आधार पर यही कहा जा सकता है कि पहाड़ों पर रहने वाली पहाड़िया जनजाति की जीवन शैली से उनमें चर्मरोग, घेघा और दूसरी बीमारियां थीं. अपने स्वभाव और सीमित पहुंच के कारण नमक का प्रयोग इस समाज में बहुत कम था. नमक का प्रयोग कम या नहीं करने से भी इनमें कई तरह की बीमारियां फैली हुई थीं. ये दंत कथाएं उन्हें नमक के प्रयोग के प्रति जागरूक और उत्प्रेरित करने के माध्यम रही होंगी. नमक की देवी और नमक से उनकी पूजा की परिकल्पा के पीछे भी यही कारण रहा होगा. यहां गर्मजल कुंड है, जिसमें स्नान के बहाने शारीरिक स्वच्छता का संदेश देने के लिए इस मेले की शुरुआत हुई होगी. इस मेले में पहाड़िया जनजाति के साथ-साथ दूसरी जनजातीय तथा गैर जनजातीय समाज के लोग यहां पूजा करने आते हैं. फुकाई पहाड़ियां के बाद उसके वंशज यहां के पुजारी होते आये हैं. ऐतिहासिक दस्तावेजों में यह पहाड़िया मेले के रूप में ही दर्ज है, किंतु वास्तव में यह सांस्कृतिक संकुल की रचना करता है, जहां लघु और वृहत समाज के लोग साल में आठ दिनों तक एक ही विश्वास और मान्यता के साथ जुटते हैं. रोसिडिंग ऑफ द रॉयल आयरिश एकेडमी के मुताबिक अगर 1893 में इस मेले में एक लाख लोग जुटते थे, तो जाहिर है कि वे केवल पहाड़िया जनजाति के लोग नहीं होते थे. सैंकड़ों सालों से यह मेला विभिन्न संस्कृतियों के बीच समन्वय का बड़ा माध्यम है. इसलिए संताल परगना के दूसरों सभी शीतकालीन मेलों से यह अलग भी है.

(नोट : नमक का उपयोग वैदिक काल के उत्तरार्द्ध में होने लगा था. अथर्ववेद, शतपत ब्राह्मण, छान्दोग्य उपनिषद् आदि प्राचीन ग्रंथो में 'लवण' का उल्लेख मिलता है. तब यह दुर्लभ वस्तु थी).

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