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दयार-ए-दिल्ली : मुसाफिरों की दिलरुबा

Updated at : 09 Dec 2018 7:10 AM (IST)
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दयार-ए-दिल्ली : मुसाफिरों की दिलरुबा

ऐश्वर्या ठाकुर आर्किटेक्ट एवं ब्लॉगर मिट्टी, मीटर और मेट्रो के जिक्र से आगे निकलने पर दिल्ली अपना हिजाब खोलती है और शाहजहानाबाद की गलियों से होकर शाहदरा की बस्तियों तक फैली अपनी रियासत बड़ी ठाठ से हर आनेवाले को दिखाती है. यहां कोई इख्लाकी ब्लैक एंड ह्वाइट चश्मों से आपको नहीं देखता; यहां इंद्रधनुषी रंगीनियों […]

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ऐश्वर्या ठाकुर
आर्किटेक्ट एवं ब्लॉगर
मिट्टी, मीटर और मेट्रो के जिक्र से आगे निकलने पर दिल्ली अपना हिजाब खोलती है और शाहजहानाबाद की गलियों से होकर शाहदरा की बस्तियों तक फैली अपनी रियासत बड़ी ठाठ से हर आनेवाले को दिखाती है. यहां कोई इख्लाकी ब्लैक एंड ह्वाइट चश्मों से आपको नहीं देखता; यहां इंद्रधनुषी रंगीनियों को सड़कों पर, काॅलेजों में, क्लबों में बिखरे देखा जा सकता है. सरकारी गलियारों से मीडिया के अखाड़ों का गढ़ है यह शहर, जो अपनी धुरी पर देश की सत्ता को घुमाता है. यहां सब मुसाफिर हैं, यूं कहें कि यह मुसाफिरों का ही शहर है.
अजनबियों की भीड़ में नयी वाकफियत ढूंढती दिल्ली जल्दी जगती है, सारा दिन दौड़ती है और देर से सोती है. दिल्ली रजवाड़ों का गढ़ हुई, मुसाफिरों का रैन-बसेरा, मुहाजिरों का कैंप हुई, फौजियों का कैंट हुई, शादियों का टैंट हुई, इवेंट का शामियाना, दफ्तर हुई, बस्ती हुई पर किसी का घर नहीं हुई.
धर्मनिरपेक्षता यहां सिर्फ कॉलेज-यूनिवर्सिटियों के सिलेबस में ही नहीं, बल्कि गली-कूचों में भी सहज ही मिल जायेगी, जहां हिंदू-मुसलमान एक ही प्याले से चाय पीते दिखायी देंगे. क्रांति के नारों से गूंजती आबो-हवा ही दिल्ली की असल रिवायत है. आंदोलनों में यहां की सड़कें मंच बनकर हर आवाज को लुटियंस तक पहुंचाती हैं. तांगे वाले, मर्सेडीज और साइकिल-सवार यहां एक ही तरह से ट्रैफिक-जाम का शिकार हुआ करते हैं.
दिल्ली में महराबें भी हैं और किले भी; महल भी हैं और झुग्गी-झोपड़ी भी. मेट्रो में फंदा-नुमा हैंडलों पर झूलते थके-हारे नौकरीपेशा लोग यहां अपने मुर्दा-ख्वाब ढोते रोज नजर आयेंगे. दिल्ली वह जेबकतरी भी है, जो महीने की तनख्वाह और दिहाड़ी पर चुपके से सेंध लगाकर हंसती है.
यहां दिलों में ख्यालों से ज्यादा हिसाब चलते रहते हैं. दिल्ली उन दलालों का मक्का भी है, जो जिस्मों से लेकर खोटे सिक्कों को चमकाकर बेचने की कवायद में लगे रहते हैं. माचिस की डीबिया-नुमा इमारतों में कितनी ही कहानियां रहती हैं. इस शहर की बेचारगी यह है कि यहां बसनेवाले जब भी अपनी उलझनों से छूटने बालकनी में आते हैं, तो सामने वाली बिल्डिंग की खिड़की से अंदर जूझती हुई किसी और की कहानी देखकर अपनी परेशानी भूल जाते हैं.
दिल्ली में लोगों का आई-कॉन्टैक्ट कम ही होता है, मगर इमारतों का आई-कॉन्टैक्ट मुसलसल रहता है! आमने-सामने सटी हुई ये इमारतें अपनी खिड़की-नुमा आंखों से एक-दूसरे को दिन-रात घूरती हैं! यहां जिंदगियां भी फ्लोर्ज (मंजिलों) की तरह एक के ऊपर एक स्टैक्ड हैं. इन इंसान-नुमा इमारतों तक पहुंचने के लिए भी इंसान-नुमा सीढ़ियां ही इस्तेमाल हो रही हैं. इंसान भी सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं.
संगदिल लोग होते गये और दिल्ली पर बार-बार बेवफाई का तगमा लगता रहा. गालिब, जौक, खुशवंत न होते, तो शायद दिल्ली का हुस्न सिर्फ खांसती हुई जर्जर इमारतें ही बयान कर पातीं. मीनारें और मल्टीप्लेक्स पीठ से पीठ सटाये गुजरनेवाले हुजूमों और हुकूमतों की गवाही देते खड़े हैं. चौक-चौराहों पर फ्लाईओवर-नुमा नाग कुंडली मारे बैठ गये हैं. रोशनी और रौनक के बीजों से चांदनी-चौक हर सड़क पर उग आया है.
नीम-गुलमोहर के झूमते पेड़ों की कतारें कितनी ही दोपहरों को पैदल पैरों की पनाहगाह बनी हैं. दिल्ली बसती है चाट-पकौड़ी के ठेलों से उठती दिलरुबा खुश्बू में. दिल्ली बसती है दरगाहों में गूंजती कव्वाली और हर दूसरे मोड़ पर ऊंघती कोतवाली में. दिल्ली चलती है सर्द रातों में सड़क किनारे सोते मजदूर के ख्वाब में. दिल्ली खेली जाती है रुपहले पर्दे से लेकर नुक्कड़ नाटकों में.
मोहब्बत के अहाते से मोहभंग के आश्रम तक जानेवाली एक लंबी गली है दिल्ली. सब की कुछ लगनेवाली रिश्तेदार है दिल्ली. हर आनेवाले की पक्की यार है दिल्ली. कहीं उजड़ती, तो कहीं गुलजार है दिल्ली.
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