जलपाईगुड़ी : भांडानी देवी के रूप में पूजी गयीं वनदुर्गा

Updated at : 21 Oct 2018 8:58 AM (IST)
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जलपाईगुड़ी : भांडानी देवी के रूप में पूजी गयीं वनदुर्गा

जलपाईगुड़ी : दुर्गा पूजा की समाप्ति के बाद भी देवी की आराधना विभिन्न रुपों में होती रहती है. उन्हीं में शामिल हैं मां भांडानी यानी कि वनदुर्गा की पूजा जिसे एकादशी को संपन्न किया जाता है. शनिवार को इस पूजा के उपलक्ष में मयनागुड़ी के वार्निस में मेला लगा जिसमें काफी तादाद में लोग शामिल […]

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जलपाईगुड़ी : दुर्गा पूजा की समाप्ति के बाद भी देवी की आराधना विभिन्न रुपों में होती रहती है. उन्हीं में शामिल हैं मां भांडानी यानी कि वनदुर्गा की पूजा जिसे एकादशी को संपन्न किया जाता है.
शनिवार को इस पूजा के उपलक्ष में मयनागुड़ी के वार्निस में मेला लगा जिसमें काफी तादाद में लोग शामिल हुए. उल्लेखनीय है कि मां भांडानी की यह पूजा मयनागुड़ी के अलावा मेखलीगंज, माथाभांगा, रानीरहाट, खयेरकाटा, नागराकाटा और अन्य इलाकों में होती है.
दंतकथा है कि दुर्गा पूजा के बाद जब दुर्गा कैलास पर लौट जाती हैं तो महादेव के प्रश्न करने पर वह बताती हैं कि उन्हें मर्त्य लोक में भक्तों ने अत्यंत श्रद्धा के साथ पूजा की. लेकिन भक्तों से बिछुड़ने की पीड़ा नहीं सह सकने के कारण देवी एक बार फिर धरती पर लौट आती हैं. इस दौरान उन्होंने बाघ की वेश में ग्रामीण बच्चों को भयभीत किया जिसके बाद उन बच्चों ने उन्हें वनदुर्गा के रुप में पूजा.
राजवंशी समुदाय के अनुसार चूंकि देवी दुर्गा ने धोखे से यह पूजा ली है इसलिये इसका नाम उन्होंने भांडानी यानी भंडामी (धोखा) पूजा रखा. इस पूजा में देवी बाघ पर सवार रहती हैं और उनके साथ कार्तिक, गणेश, सरस्वती और लक्ष्मी भी पूजा लेती हैं.
एक अन्य मान्यता के अनुसार लोगों के घरों को धन-धान्य से भर देने के लिये ही इनका नाम भांडानी पूजा कहा जाता है. एकादशी को तड़के से ही इनकी पूजा अर्चना शुरु हो जाती है. भक्त बतासे, दूध, केले आदि से इनकी पूजा करते हैं. उनके नाम पर कबूतर उड़ाने का भी रिवाज है. पाठों की बलि दी जाती है. मेलों और सांस्कृतिक अनुष्ठान का आयोजन होता है.
पूजा व मेला कमेटी के उपाध्यक्ष दीनेश दास ने बताया कि दुर्गा पूजा के बाद भक्तों की उदासी को दूर करने के लिये ही देवी वनदुर्गा का रुप लेकर आती हैं. मां भांडानी पूजा के बारे में उत्तर बंगाल के शोधकर्ता उमेश शर्मा के अनुसार आज से 60 साल पहले यह क्षेत्र और भी जंगलों से भरा था. उस समय बाघ और तेंदुओं का भय लगा रहता था. इन भयानक पशुओं से रक्षा के लिये ही ग्रामीणों और वनबस्तीवासियों ने यह पूजा शुरु की होगी.
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