कोलकाता : अग्नाशय नेक्रोसिस के शिकार युवक को मिली नयी जिंदगी

Updated at : 10 Sep 2018 12:55 AM (IST)
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कोलकाता : अग्नाशय नेक्रोसिस के शिकार युवक को मिली नयी जिंदगी

लैप्रोस्कोपिक रेट्रो पेरिटोनियल नेक्रोसॉक्टोमी सर्जरी का हुआ इस्तेमाल : डॉ मंडल कोलकाता : अग्नाशय नेक्रोसिस से शिकार झारखंड के रांची के 31 वर्ष के युवक महेश सिंह (नाम परिवर्तित) को लैप्रोस्कोपिक रेट्रो पेरिटोनियल नेक्रोसॉक्टोमी जिंदगी मिली. मेडिका सुपरस्पेशलिटी अस्पताल में मेडिका इंस्टीट्यूट के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग एवं जीआई सर्जरी के निदेशक और सीनियर कंसल्टेंट डॉ संजय […]

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लैप्रोस्कोपिक रेट्रो पेरिटोनियल नेक्रोसॉक्टोमी सर्जरी का हुआ इस्तेमाल : डॉ मंडल
कोलकाता : अग्नाशय नेक्रोसिस से शिकार झारखंड के रांची के 31 वर्ष के युवक महेश सिंह (नाम परिवर्तित) को लैप्रोस्कोपिक रेट्रो पेरिटोनियल नेक्रोसॉक्टोमी जिंदगी मिली. मेडिका सुपरस्पेशलिटी अस्पताल में मेडिका इंस्टीट्यूट के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग एवं जीआई सर्जरी के निदेशक और सीनियर कंसल्टेंट डॉ संजय मंडल (एमएस, डीएनबी, एमआरसीएस, एमसीएच) ने उक्त सर्जरी को अंजाम दिया.
डॉ मंडल ने प्रभात खबर से बातचीत करते हुए कहा कि युवक का अग्नाशय लगभग 60 फीसदी खराब हो चुका था. इस कारण उसे तेज बुखार और पेट में तीव्र दर्द था. रोगी की शारीरिक स्थिति इतनी खराब थी कि उसे अस्पताल में भर्ती के बाद ही वेंटिलेशन पर रखना पड़ा. उसके परिवार वाले मरीज की शारीरिक स्थिति को लेकर काफी चिंतित थे. उन्होंने कहा कि आरंभ में एंटीबायोटिक्स की दो से तीन सप्ताह की खुराक दी गयी, लेकिन रोगी की स्थिति में बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुई. उसके बाद रोगी का सर्जरी करने का निर्णय किया गया.
डॉ मंडल बताते हैं कि वर्तमान में ओपेन सर्जरी कर अग्नाशय का ऑपरेशन करने की पद्धति प्रचलित है, लेकिन रोगी के परिजनों से परामर्श कर मरीज की लैप्रोस्कोपिक रेट्रो पेरिटोनियल नेक्रोसॉक्टोमी सर्जरी की गयी. मरीज को सेरेब्रल पल्सी (सीपी) में रखा गया और एंडोस्कोपी कर अग्नाशय के खराब ऊतकों को माइक्रो सर्जरी के जरिये निकाल कर युवक को संक्रमण से मुक्ति दी गयी. संक्रमण से युवक को राहत मिल गयी और फिलहाल वह युवक पूरी तरह से स्वस्थ है.
डॉ मंडल बताते हैं कि ओपेन सर्जरी की तुलना में लैप्रोस्कोपिक रेट्रो पेरिटोनियल नेक्रोसॉक्टोमी सर्जरी मरीजों के लिए ज्यादा सुरक्षित है, क्योंकि इसमें पूर्ण एनेस्थेसिया की जगह लोकल एनेस्थेसिया का इस्तेमाल होता है, जो अपेक्षाकृत कम जोखिमभरा है तथा रोगी के इलाज के लिए ज्यादा अनुकूल व सुरक्षित है. इसमें रोगी को कम तनाव भी होता है. लैप्रोस्कोपिक रेट्रो पेरिटोनियल नेक्रोसॉक्टॉमी धीरे-धीरे पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो रहा है और आम लोगों में लोकप्रिय हो रहा है, लेकिन अभी भी इस चिकित्सा पद्धति का इस्तेमाल बहुत ही कम हो रहा है. केवल कुछ डॉक्टरों व अस्पताल में इस पद्धति का इस्तेमाल हो रहा है.
उल्लेखनीय है कि डॉ मंडल ने ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स), नयी दिल्ली से स्नातक (एमबीबीएस) तथा एमएस (जनरल सर्जरी) की डिग्री हासिल की है. उसके बाद जनरल सर्जरी में नेशनल बोर्ड (डीएनबी) में डिप्लोमा और रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन, एडिनबर्ग (एमआरसीएस एड) की सदस्यता हासिल की है. उनका गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सर्जरी और यकृत प्रत्यारोपण में सुपर-स्पेशलाइजेशन है.
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