विभाजन का दंश: घर का आधा हिस्सा भारत में और आधा बांग्लादेश में देश के साथ बंट गयी रसोई भी

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कोलकाता: देश को आजाद हुए 67 वर्ष हो गये हैं. पाकिस्तान बनने के बाद धर्म के नाम पर बने इस देश को भी एक बंटवारे से गुजरना पड़ा. 1971 में बांग्लादेश के जन्म लेने के बाद इस महान देश के तीन टुकड़े दुनिया के नक्शे पर समा गये. विभाजन की इस महंगी कीमत को सभी […]

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कोलकाता: देश को आजाद हुए 67 वर्ष हो गये हैं. पाकिस्तान बनने के बाद धर्म के नाम पर बने इस देश को भी एक बंटवारे से गुजरना पड़ा. 1971 में बांग्लादेश के जन्म लेने के बाद इस महान देश के तीन टुकड़े दुनिया के नक्शे पर समा गये.

विभाजन की इस महंगी कीमत को सभी तरफ के लोग आज तक चुका रहे हैं, पर सबसे अधिक खमियाजा तो उन लोगों को भुगतना पड़ा, जिनके घर नये बननेवाले सरहदों के पास बसे हुए थे. ऐसे ही एक शख्स रेजाउल मंडल हैं. 65 वर्षीय रेजाउल भारत के नागरिक हैं, वह उत्तर 24 परगना के बागदा ब्लॉक के अंतर्गत बोयरा उत्तर पाड़ा गांव के निवासी हैं. इस भारतीय नागरिक का पूरा घर तो भारत में है, पर घर की रसोई बांग्लादेश में है.

सुरक्षा बलों के लिए 39/11 एस पिलर के निवासी

इस स्थिति के कारण जहां पड़ोसी उन्हें भारत-बांग्लादेश का नागरिक कहते हैं, वहीं बीएसएफ एवं बांग्लादेश सीमा सुरक्षा बल की नजरों में रेजाउल मंडल 39/11 एस पिलर के निवासी हैं. देश विभाजन की शायद यह सबसे पेचीदा कहानी है. रेजाउल का जन्म भारत में हुआ, उसके पिता व दादा सभी ने धरती के इसी हिस्से में जन्म लिया. रेजाउल के परिवार की गिनती गांवों के रईसों में होती थी, पर उनकी अधिकतर संपत्ति विभाजन की भेंट चढ़ गयी.

आठ बीघा जमीन भारत में और आठ बीघा बांग्लादेश में

कहने को तो आज भी उनके पास 16 बीघा जमीन है, जिनमें से आठ बीघा भारत में है, जबकि बाकी आठ बीघा जमीन पड़ोसी बांग्लादेश में है. सबसे मजे की बात यह है कि रेजाउल दोनों देशें में जमीन का राजस्व चुकाते हैं. वर्षो से वह बांग्लादेश स्थित अपने खेत में खेती भी कर रहे हैं और वहां से उपजा अनाज भारत स्थित अपने घर लाते रहे हैं, पर हालिया दिनों में भारत-बांग्लादेश सीमा पर कांटेदार तार लगाये जाने के कारण उनके लिए अब अपने खेतों से अनाज लाना संभव नहीं रह गया है. अब रेजाउल पहले ही तरह अपनी जमीन पर आजादी से घूम-फिर नहीं सकते हैं. कांटेदार बाड़ के उस तरफ स्थित अपने खेतों को देखने जाते समय उन्हें बीएसएफ चौकी में अपना वोटर पहचान कार्ड जमा कर जाना पड़ता है. उत्तर बोयरा पाड़ा गांव के उस तरफ बाड़ के पीछ बांग्लादेश का गदाधरपुर गांव है, जो बांग्लादेश के जैसोर जिले के अंतर्गत पड़ता है. गदाधरपुर गांव के सरकारी दस्तावेजों के अनुसार रेजाउल मंडल उस गांव के भी निवासी हैं, चूंकि वह वहां भी राजस्व व टैक्स का भुगतान करते हैं.

बेड रूम भारत में और रसोई बांग्लादेश में

भारत और बांग्लादेश के बीच बंटे अपने घर के इस पेचीदा किस्से के बारे में रेजाउल ने बताया कि सीमा क्षेत्र में तीन बार इलाके का सर्वेक्षण किया गया, प्रत्येक बार यह पाया गया कि उनका घर बिल्कुल दोनों देशों की सीमा पर है. इसलिए उनके घर के बीच 39/11 एस पिलर लगा दिया गया. नतीजन उनका घर दो देशों के बीच बंट गया. उनका बेड रूम जहां भारत में पड़ता है, वहीं उनकी रसोई, गायों का तबेला एवं चावल रखने का स्थान बांग्लादेश के हिस्से में है. इस स्थिति के कारण उन्हें अपने टूटे-फुटे मकान को पक्का बनाने की इजाजत भी नहीं दी गयी है.

बोयरा उत्तर पाड़ा गांव में 60 परिवार हैं, सभी पूरी तरह से भारतीय हैं. केवल मंडल परिवार ही सीमा की त्रसदी ङोल रहा है. रेजाउल मंडल इस स्थिति के आदी हो चुके हैं. उन्हें इस स्थिति का कोई मलाल नहीं है. उनके चार बेटे एवं दो बेटी हैं, इनमें से सबसे छोटा बेटा हफीजुर राज्य पुलिस में काम करता है. भविष्य में कभी बांग्लादेश में बसने के बारे में पूछे जाने पर रेजाउल इनकार करते हैं. उनका कहना है कि वह जिस हाल में भी हैं, खुश हैं और पड़ोसी देश का नागरिक बनने की उनकी या उनके परिवार की कोई योजना नहीं है. हम लोग भारतीय थे और भारतीय ही रहेंगे. वह चाहते हैं कि जिस तरह दोनों देश के लोग उन्हें अपना समझते हैं, उसी तरह दोनों देशों के सभी नागरिक अमन व शांति के साथ रहें और यह भाईचारे का माहौल यूं ही बना रहे.

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