शिक्षक दिवस पर विशेष : 200 शिक्षक तंगहाली में जीने को मजबूर

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हावड़ा: शिक्षक दिवस को लेकर जहां देश के सभी स्कूलों में छात्रों व शिक्षकों के बीच उत्साह का माहौल है. वहीं इस मौके पर जिले के लगभग 34 बाल श्रमिक स्कूलों के तकरीबन 200 शिक्षकों के बीच मायूसी का आलम है. शिक्षकों ने बताया कि पिछले दो वर्षो से उन सबों को वेतन नहीं मिला […]

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हावड़ा: शिक्षक दिवस को लेकर जहां देश के सभी स्कूलों में छात्रों व शिक्षकों के बीच उत्साह का माहौल है. वहीं इस मौके पर जिले के लगभग 34 बाल श्रमिक स्कूलों के तकरीबन 200 शिक्षकों के बीच मायूसी का आलम है.

शिक्षकों ने बताया कि पिछले दो वर्षो से उन सबों को वेतन नहीं मिला है, जिससे उन्हें परिवार चलाने में तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है. वे वेतन नहीं मिलने के कारण तंगहाली में जीवन बिता रहे हैं. उनके मुताबिक, पूरे जिले में शिशु श्रमिक स्कूलों की कुल संख्या 34 है, जिसमें लगभग 1700 बच्चे तालीम लेते हैं. ये स्कूल केंद्र सरकार के श्रम विभाग के अधीन है.

केंद्र सरकार से आर्थिक मदद नहीं मिलने के कारण सभी स्कूल बंद होने के कगार पर है. इन स्कूलों में तालीम लेने वाले बच्चों का इस दुनिया में कोई नहीं है. स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से आर्थिक मदद की गुहार लगायी गयी है.

नेशनल चाइल्ड लेबर प्रोजेक्ट के तहत खोले गये थे स्कूल
नेशनल चाइल्ड लेबर प्रोजेक्ट के तहत जिले में बाल श्रमिकों के लिए 34 स्कूल खोले गये हैं, जिनकी देखरेख का जिम्मा 16 एनजीओ के हाथों हैं. पहली से लेकर चौथी कक्षा तक के करीब 50 बच्चों को प्रत्येक स्कूल में शिक्षा दी जाती है. प्रत्येक स्कूल में शिक्षकों की संख्या तीन व नन टीचिंग स्टाफ की संख्या दो है. सुबह सात बजे से ग्यारह बजे तक इन बच्चों को स्कूल में पढ़ाया जाता है. यहां से पढ़ाई करने के बाद ये बच्चे दो वक्त की रोटी के लिए दुकान, होटल व अन्य जगहों पर मजदूरी करते हैं, लेकिन उन बच्चों को तालीम देकर उनकी जिंदगी में रोशनी लानेवाले ये शिक्षक व शिक्षिकाएं खुद अंधकार में जिंदगी गुजार रहे हैं. पिछले 23 महीनों से उन्हें वेतन नहीं मिला है.

बच्चों को पढ़ा पाना मुश्किल हो रहा
बागनान ह्यूमन रूरल डेवलेपमेंट नामक संस्था के अध्यक्ष शेख आलताब अली ने बताया कि उनके अधीन चार शिशु श्रमिक स्कूल हैं, जहां के शिक्षकों को वेतन नहीं मिलने से बच्चों को पढ़ाना मुश्किल साबित हो रहा है. इसके अलावा स्कूल के लिए प्रति महीने एक हजार रुपये किराया देना पड़ता है. पिछले 19 महीनों से स्कूल का किराया नहीं देने पर मकान मालिक स्कूल छोड़ने की जिद कर रहे हैं. इसके अलावा किताब, कॉपी व अन्य पाठय़ सामग्री खरीदने के लिए प्रति वर्ष प्रत्येक स्कूल को चार हजार रुपये मिलते थे, लेकिन ये रुपये भी नहीं मिल रहे हैं. उन्होंने कहा कि नेशनल चाइल्ड लेबर प्रोजेक्ट के तहत प्रत्येक शिशु के नाम से बैंक एकाउंट खोले जाने का नियम है. नियम के मुताबिक प्रत्येक माह बच्चों के एकाउंट में 150 रुपये जमा करना अनिवार्य है, लेकिन कई तकनीकी समस्याओं के कारण यह संभव नहीं हो रहा है. जिला प्रशासन को इन सभी समस्यायों से अवगत कराया गया है, लेकिन पिछले दो वर्षो से स्थिति जस की तस बनी हुई है.

क्या कहना है जिलाधिकारी का
हावड़ा डिस्ट्रिक्ट नेशनल चाइल्ड लेबर प्रोजेक्ट के निदेशक खुद जिलाधिकारी शुभंजन दास है. जिलाधिकारी ने बताया कि ये योजना केंद्र सरकार की है. ऑडिट रिपोर्ट भेजने के बाद केंद्र सरकार रुपये भेजती है. हावड़ा से रिपोर्ट भेजा गया है. रुपये मिलने में थोड़ा विलंब होता है.

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