पक्षियों का समर माइग्रेशन : उत्तर भारत और पूर्वोत्तर के जंगलों से झारखंड पहुंचे रहे हैं पक्षी

गर्मी आते ही रांची में देश के विभिन्न राज्यों से पक्षियों का आना शुरू हो गया है. यहां की हरियाली इनको खूब भा रही है. शहर के आस-पास के जंगल और फलदार पेड़-पौधे पर पक्षियों की चहचहाहट सुनाई दे रही है. राज्य के पक्षी अप्रैल से जून तक झारखंड में आशियाना बनाते हैं.
रांची, अभिषेक रॉय : परिंदे किसी सरहद के मोहताज नहीं होते, उन्हें तो बस उड़ान भरनी होती है. ये आजाद पक्षी कहीं भी किसी भी मुल्क में अपना आशियाना बना लेते हैं. इन दिनों गर्मी आते ही रांची में देश के विभिन्न राज्यों से पक्षियों का आना शुरू हो गया है. यहां की हरियाली इनको खूब भा रही है़ शहर के आस-पास के जंगल और फलदार पेड़-पौधे पर पक्षियों की चहचहाहट सुनाई दे रही है.
बर्ड वाचर के अनुसार अनुकूल मौसम और परिवेश के कारण दूसरे राज्य के पक्षी अप्रैल से जून तक झारखंड में आशियाना बनाते हैं. इसे समर माइग्रेशन कहा जाता है, जो 20 मार्च से शुरू हो जाता है. इस दौरान पक्षी अपना खास आशियाना ढूंढ़ते हैं. प्रजन्न और बच्चों का भरण-पोषण करते हैं. रोचक है कि ये पक्षी आशियाने का चुनाव अपने रंग के अनुरूप करते हैं. क्योंकि छिपकर रहना आसान होता है. इस दौरान पक्षी घोंसला तैयार करते हैं और अंडे देकर बच्चों को बड़े करते हैं. जून की शुरुआत तक इनके बच्चे उड़ना भरना सीख जाते हैं. फिर मॉनसून का आगाज होते ही सभी दोबारा अपना आशियाना बदल लेते हैं.
होरहाब जंगल में इन दिनों पलाश के पेड़ पर आप नजर डालेंगे, तो छोटे कद के क्रिमसन सनबर्ड दिख जायेंगे़ पेड़ के रंग के साथ मेल करता पक्षी का रंग दिख जायेगा़ शरीर का उपरी हिस्सा पलाश के फूल जैसा लाल और नीचला हिस्सा काला़ इससे पेड़ के रंग के साथ पक्षी आसानी से घुल मिल जाते हैं. हमिंग बर्ड प्रजाति के इस पक्षी की चहचहाहट सबको आकर्षित करती है़ बर्ड वाचर्स का कहना है कि लंबे समय बाद क्रिमसन सनबर्ड रांची के जंगल में नजर आ रहे है़ं मूल रूप से नेपाल और बांग्लादेश का यह पक्षी गर्मी में प्रजनन के लिए प्रवास करते हैं.
गर्मी के दिनों में प्रवास करनेवाले पक्षी अपनी प्रजाति के रंग के अनुरूप पेड़ के रंग का चयन करते हैं. इससे पेड़ पर कैमॉफ्लाज यानी छुपकर रहने में मदद मिलती है. पक्षी शिकार से बचते हैं. साथ ही पक्षियों का बॉडी टेम्परेचर भी सामान्य बना रहता है़ बर्ड वाचर्स का कहना है कि पक्षियों की असाधारण रंग दृष्टि होती है. रंगों को पहचानने में उनकी क्षमता मनुष्य की रंग दृष्टि से कई मायनों में बेहतर है. इंसान की आंखें लाल, हरे और नीले रंग से बननेवाले अनगिनत रंग की पहचान कर सकती है. वहीं, पक्षी पराबैंगनी (यूवी)े किरणों को भी देखने में सक्षम होते हैं. इस कारण तेज धूप के बावजूद अपने निश्चित ठिकाने पर आसानी से पहुंच जाते हैं.
झारखंड के विभिन्न जिलों में उड़ान भरनेवाले ज्यादातर पक्षी उत्तरी भारत, दक्षिण भारत और उत्तर-पूर्वी भारत से पहुंच रहे हैं. इनमें इडियन ग्रे हॉर्नबील, क्रिमसन सनबर्ड, येल्लो क्राउंड वुडपिकर, टिकेल्स ब्लू फ्लाइवाचर, ग्रीन सैन पिपर, ब्लैक रेडस्टार्ट, इंडियन गोल्डन एंड ब्लैक हेडेड ओरियोलस, ग्रीन बिल्ड मल्कोवा, इंडियन पैराडाइज फ्लाइकैचर, इंडियन पिट्टा, स्पॉटेड आउलेट, भ्रामणी मैना (माथा में कलगी), बैंक मैना (लाल चोंच), इंडियन मैना, पाइड मैना, कोयल, कुक्कू श्राइक, ब्लैक शोल्डर काइट, हनी बुजार्ड, इंडियन रॉबिन, ग्रे हेरॉन, रेड नेप्ड इबिज, केटल इग्रेट, इंडियन रोलर, यूरेसियन कॉलर्ड डव, स्पॉटेड डव, लिटिल कॉर्मोरेंट, लिटिल इग्रेट, वाइट आइड बुजार्ड, शिकारी, येल्लो फ्राउन्ड वुडपिकर, वाइट थ्रोट किंगफिशर आदि शामिल हैं.
समर माइग्रेशन में छोटे-बड़े पक्षी झारखंड पहुंचते हैं. इनकी पसंदीदा जगह होती है : जंगल, घनी झाड़ी, डैम व नदियों का किनारा़ राजधानी रांची के आस-पास प्रवासी पक्षियों का पसंदीदा इलाका है होरहाब जंगल, जुमार नदी, रूक्का डैम, बीआइटी मेसरा, गेतलातू, जोन्हा के कायनारडीह व हापतबेड़ा, हुंडरू, बोड़ेया, कांके, भगवान बिरसा मुंडा बायोलॉजिकल पार्क, आइटीबीपी, बरियातू पहाड़, जारगा हिल, कांके डैम और पतरातू़ साथ ही बरगद, डूमर, पीपल, सेमल, गुलमोहर, इमली, जामुन, आम के पेड़ इनके प्रमुख ठिकाने होते हैं. क्योंकि फल और फूल के साथ कीट-पतंग को पकड़ना आसान होता है.
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