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आलू को लगे महंगाई के पर : किसानों से 10 में खरीदा, बेच रहे 40 में

By Prabhat Khabar Print Desk
Updated Date
किसानों से 10 में खरीदा, बेच रहे 40 में
किसानों से 10 में खरीदा, बेच रहे 40 में
प्रतीकात्मक तस्वीर

रांची : कोरोना काल में सब्जियों के महंगे भाव के कारण लोग वैसे ही परेशान हैं. इधर, आलू की महंगाई ने मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. फिलहाल, झारखंड के खुदरा बाजार में आलू 35 से 40 रुपये प्रति किलो बिक रहा है. विडंबना यह है कि किसानों के खेत से जब आलू निकला, तो बाजार में इसकी कीमत 10 रुपये किलो हो गयी थी. किसानों से वही आलू लेकर अब बिचौलिये उसे 35 से 40 रुपये किलो बेच रहे हैं. दरअसल, आलू से किसानों की कमाई नहीं होती है. किसान फसल तो लगाते हैं, लेकिन असली मुनाफा व्यापारियों और बिचौलियों के खाते में जाता है. यही वजह है कि झारखंड आलू उत्पादन करनेवाले राज्यों में सातवें स्थान पर है.

यहां देश के कुल उत्पादन का करीब दो फीसदी के आसपास ही आलू पैदा होता है. 2019 में झारखंड में करीब छह लाख 49 हजार टन आलू का उत्पादन हुआ था. मांग 10 लाख टन से अधिक का है. इसी कमी को पूरा करने के लिए दूसरे राज्यों से आलू मंगाना पड़ता है. यहां सबसे अधिक आलू पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश से आता है. गुजरात से भी कुछ आलू यहां आने लगा है. पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश आलू उत्पादन करनेवाले राज्यों में पहले और दूसरे स्थान पर हैं.

बंगाल से करनी पड़ी थी वार्ता : तीन साल पहले बंगाल ने झारखंड को आलू भेजने से इनकार कर दिया था. इसके कारण झारखंड में आलू की जबरदस्त कमी हो गयी थी. आलू की कमी को दूर करने के लिए राज्य सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा था. इसके बाद बंगाल के व्यापारियों ने झारखंड आलू भेजा था. इससे यहां कीमत पर नियंत्रण हो पाया था.

झारखंड में करीब 250 ट्रक आलू आता है रोज : राज्य में ऑफ सीजन (अभी) दूसरे राज्यों से करीब 250 ट्रक आलू हर दिन आता है. एक ट्रक में करीब 25 टन आलू आता है. केवल पंडरा बाजार में सामान्य दिनों से 30 से 35 ट्रक आलू आता है. आलू की कीमत तेज होने के कारण अभी 20 से 25 ट्रक के बीच आलू आ रहा है. रांची स्थित पंडरा बाजार से ही आसपास के कई जिलों में आलू जाता है.

कोल्ड स्टोरेज कम होने से परेशानी : किसानों के पास आलू रखने की समस्या है. इस कारण आलू की खेती नहीं करते हैं. पूरे राज्य में एक ही सरकारी कोल्ड स्टोरेज हैं. कुछ निजी कोल्ड स्टोरेज हैं, इसकी क्षमता भी कम है और ऊंची कीमत देनी पड़ती है. राज्य सरकार 2016 से ही सरकारी कोल्ड स्टोरेज का निर्माण करा रही है, लेकिन एक भी पूरा नहीं हुआ है.

Post by : Prirtish Sahay

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