मांडर उपचुनाव : शिल्पी नेहा तिर्की की जीत के क्या हैं मायने? झारखंड की राजनीति पर कितना पड़ेगा असर?

Updated at : 27 Jun 2022 3:00 PM (IST)
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मांडर उपचुनाव : शिल्पी नेहा तिर्की की जीत के क्या हैं मायने? झारखंड की राजनीति पर कितना पड़ेगा असर?

देवकुमार धान के मैदान में होने मुकाबला त्रिकोणीय होने के कयास लगाए जा रहे थे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बंधु तिर्की की बेटी शिल्पी नेहा तिर्की की इस जीत के बाद झारखंड की राजनीति को लेकर तमाम लोगों के मन में कई सवाल घूम रहा है

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रांची : मांडर विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस की शिल्पी नेहा तिर्की 23 हजार से ज्यादा वोटों से चुनाव जीत गयीं. उन्होंने अपने निकटम प्रतिद्वंदी गंगोत्री कुजूर को हराया. भाजपा की तमाम रणनीति एक बार फिर फेल हो गयीं. इस चुनाव में भाजपा के पूर्व प्रत्याशी देवकुमार धान भी मैदान में थे. जिन्हें एआईएमआईएम का समर्थन हासिल था.

ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि उनके मैदान में होने से मुकाबला त्रिकोणीय हो जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बंधु तिर्की की बेटी शिल्पी नेहा तिर्की की इस जीत के बाद झारखंड की राजनीति को लेकर तमाम लोगों के मन में कई सवाल घूम होंगे. इन सभी सवालों का जवाब दिया है प्रभात खबर के ब्यूरो चीफ और एक्सपर्ट आनंद मोहन ने.

इस जीत को किस तरह देखा जाए

शिल्पा नेहा तिर्की अपने पिताजी बंधु तिर्की के द्वारा तैयार की गयी जमीन पर चुनाव लड़ रही थीं. भाजपा जो कि झारखंड में मुख्य विपक्षी दल है वो भ्रष्टाचार को ऐजेंडा व विकास को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ी. जिसे वहां की जनता ने नकार दिया. इस जीत में बंधु तिर्की का जो काम था, जो उनका व्यापक जनसंपर्क था वो काम आया है. वो लोगों को ये समझाने में कामयाब रहें कि मेरे ऊपर जो आय से अधिक संपत्ति का आरोप लगा है, वो गलत है. इसमें कांग्रेस की जो परंपरागत वोट थी, वो भी जीत का बड़ा कारण बनी. भाजपा भी आदिवासी वोट पर सेंधमारी नहीं कर पायी. जिसका फायदा कांग्रेस को मिला

ओवैसी फैक्टर क्यों काम नहीं आया

देवकुमार धान कभी भी जीत वाले उम्मीदवार के रूप नहीं थे. ऐसे कयास लगाये जा रहे थे कि देवकुमार धान के वोट का नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और देवकुमार धान महज 22 हजार वोट पर सिमट गये. इससे ये स्पष्ट है कि जो लोग ये चाह रहे थे कि भाजपा को इस चुनाव से दूर रखना है उन्होंने देवकुमार धान को वोट नहीं किया. जिसका फायदा कांग्रेस को मिला

क्या शिल्पी को सहानभूति का वोट मिला है

ये चुनाव मुद्दों पर थी. इसलिए हम इसे सहानभूति का वोट नहीं कहेंगे. महागठबंधन का एकजुट होकर लड़ना भी उपचुनाव में जीत का कारण बना. जो बंधु तिर्की पिछले दो चुनाव में अकेले लड़ रहे थे उन्हें इस बार पूरी यूपीए का साथ मिला जो जीत का कारण बनी.

झारखंड की राजनीति पर क्या असर होगा

फिलहाल इस चुनाव का झारखंड की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ने वाला. क्यों कि जो चुनावी गणित है वो सत्ता पक्ष के पास है. हालांकि इस जीत से यूपीए को एक ताकत तो जरूर मिली है और मांडर का चुनाव भाजपा को फिर से आकलन का मजबूर कर दिया है. यूपीए को इस लय बरकरार रखने के लिए फिर से बेहतर प्लानिंग करने की जरूरत होगी. क्यों कि 2024 में चुनाव के मुद्दे अलग होने वाले हैं. भाजपा को ये सोचना होगा कि महागठबंधन के खिलाफ किस मुद्दे को लाएं जिससे 2024 के चुनाव में जीत हासिल हों.

Posted By: Sameer Oraon

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