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Jharkhand Budget Session 2021 : राज्य का हर व्यक्ति 26 हजार रुपये से अधिक का बनेगा कर्जदार, सदन में आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट हुआ पेश

By Prabhat khabar Digital
Updated Date
Jharkhand news : वित्त मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव ने पेश किये आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट.
Jharkhand news : वित्त मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव ने पेश किये आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट.
फाइल फोटो.

Jharkhand Budget Session 2021, Ranchi News, रांची : झारखंड विधानसभा बजट सत्र के तीसरे दिन मंगलवार (2 मार्च, 2021) को आर्थिक सर्वेक्षण सदन में पेश किया गया. वित्त मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव द्वारा विधानसभा के बजट सत्र में पेश किये गये वित्तीय वर्ष 2020-21 की आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में कई तथ्यों का उल्लेख किया गया है. साथ ही यह भी कहा गया है कि नये कृषि कानून राज्य के किसानों के लिए लाभदायक नहीं है.

चालू वित्तीय वर्ष के अंत में राज्य पर कर्ज का बोझ बढ़ कर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक हो जायेगा. राज्य का हर व्यक्ति 26 हजार रुपये से अधिक का कर्जदार हो जायेगा. प्रति व्यक्ति आय के मामले में झारखंड 27 वें नंबर पर है. सिर्फ 5 राज्यों में ही प्रति व्यक्ति आय झारखंड से कम है. कोविड-19 की वजह से राज्य की अर्थव्यवस्था पर खराब असर पड़ा है. इससे राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) प्रभावित हुआ. वित्तीय वर्ष 2020-21 के दौरान राज्य के जीएसडीपी में स्थिर मूल्य पर 6.9 प्रतिशत और प्रचलित मूल्य पर 3.2 प्रतिशत तक की गिरावट का अनुमान है.

अगले वित्तीय वर्ष (2021-22) में राज्य की वास्तविक GSDP में 9.5 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है. कोविड-19 के दौरान राज्य में बेरोजगारी दर 59.2 प्रतिशत तक पहुंच गयी थी, जो धीरे-धीरे कम हुई. राज्य ने गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य नागरिक सुविधाओं के क्षेत्र में काफी प्रगति की है. फिर भी इन क्षेत्रों में राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे है.

प्रति व्यक्ति कर्ज का बोझ

आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ते राजकोषीय घाटे की वजह से राज्य पर कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है. इससे प्रति व्यक्ति कर्ज का बोझ भी बढ़ा है. वित्तीय वर्ष 2015-16 में 5553.4 करोड़ का पावर बांड लिए जाने की वजह से कर्ज की रकम में तेजी से वृद्धि हुई. वित्तीय वर्ष 2019-20 में कर्ज का बोझ बढ़ कर 94,406.59 करोड़ रुपये हो गया. चालू वित्तीय वर्ष में राज्य सरकार की कर्ज लेने की सीमा 11,505.23 करोड़ रुपये तय है. सरकार द्वारा जरूरी खर्चों को पूरा करने के लिए इस सीमा तक कर्ज लेने की स्थिति में चालू वित्तीय वर्ष के अंत तक यानी 31 मार्च 2021 को राज्य पर कर्ज का बोझ बढ़ कर 1,03,649.61 करोड़ रुपये हो जायेगा. इसके बावजूद यह वित्तीय मानकों के दायरे में हैं. यानी राज्य सरकार के पास कर्ज की रकम चुकाने की शक्ति है.

प्रति व्यक्ति आय और राज्य का सकल घरेलू उत्पाद

रिपोर्ट में कहा गया है कि झारखंड प्रति व्यक्ति कम आय वाले राज्यों में से एक है. सिर्फ बिहार, असम, मध्य प्रदेश, मणिपुर और उत्तर प्रदेश ही ऐसे राज्य हैं, जहां प्रति व्यक्ति आय झारखंड से कम है. शेष राज्य प्रति व्यक्ति आय के मामले में झारखंड से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं. प्रति व्यक्ति आय के मामले में झारखंड वर्ष 2011-12 के मुकाबले पिछड़ा है. 2011-12 में झारखंड प्रति व्यक्ति आय के मामले में 24 वें स्थान पर था. वहीं 2018-19 में यह 26 में स्थान पर पहुंच गया.

प्रति व्यक्ति आय में गोवा पहले स्थान पर

प्रति व्यक्ति आय के मामले में गोवा पहले स्थान पर है. वित्तीय वर्ष 2011-12 के दौरान झारखंड में प्रति व्यक्ति आय प्रचलित मूल्य पर 41,254 रुपये थी. 2014-15 में यह बढ़ कर 57,301 रुपये हो गयी. इस अवधि में राज्य के प्रति व्यक्ति आय का औसत वार्षिक वृद्धि दर 11.6 प्रतिशत रहा. 2019-20 में प्रचलित मूल्य पर राज्य में प्रति व्यक्ति आय 79,873 रुपये रहा. यानी 2014-15 से से 2018-19 तक प्रति व्यक्ति आय में वार्षिक औसत वृद्धि दर 5.7 प्रतिशत दर्ज की गयी.

देश की GDP में सिर्फ 1.6 फीसदी योगदान

रिपोर्ट में राज्य के सकल घरेलू उत्पाद(GSDP) की चर्चा करते हुए कहा गया है कि झारखंड का भौगोलिक क्षेत्र देश के भौगोलिक क्षेत्र के 2.4 प्रतिशत है. यहां देश की आबादी का 2.5 प्रतिशत रहता है. लेकिन देश के सकल घरेलू उत्पाद में राज्य का योगदान सिर्फ 1.6 प्रतिशत ही है. इसके बावजूद राज्य की विकास दर बेहतर रही. वित्तीय वर्ष 2011-12 से 2014-15 के बीच देश की औसत वार्षिक विकास दर 6.4 प्रतिशत रही. इस अवधि में राज्य का औसत वार्षिक विकास दर 7.3 प्रतिशत था.

देश से कम हो गयी झारखंड की विकास दर

वित्तीय वर्ष 2014-15 से 2018-19 के बीच राज्य की औसत वार्षिक विकास दर देश के औसत वार्षिक विकास दर से कम हो गयी. इस अवधि में देश का औसत वार्षिक विकास दर 7.4 प्रतिशत रही, जबकि राज्य की छह प्रतिशत. चालू वित्तीय वर्ष के दौरान कोविड-19 की वजह से राज्य की विकास दर प्रभावित हुई. इस दौरान स्थिर मूल्य पर राज्य की विकास दर में 6.9 प्रतिशत और प्रचलित मूल्य पर 3.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी.
तृतीयक (टर्शियरी) क्षेत्र का योगदान सर्वाधिक

चालू वित्तीय वर्ष के मुकाबले अगले वित्तीय वर्ष में राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में प्रचलित मूल्य पर 13.6 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है. राज्य की विकास में तृतीयक (टर्शियरी) क्षेत्र का योगदान सबसे ज्यादा है. 2019-20 के दौरान विकास में प्राथमिक क्षेत्र का योगदान नौ प्रतिशत, द्वितीयक क्षेत्र का 29 प्रतिशत और तृतीयक क्षेत्र का योगदान 62.5 प्रतिशत रहा. अक्तूबर 2019 से देश और राज्य, दोनों की महंगाई दर में वृद्धि हुई. नवंबर 2020 में राज्य में महंगाई दर 7.5 प्रतिशत रही.

गरीबी और बेरोजगारी

राज्य में गरीबी की चर्चा करते हुए कहा गया है कि यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) द्वारा गरीबी के सिलसिले में जारी आंकड़ों के अनुसार 2005-06 से 2015-16 में 72 लाख लोग गरीबी रेखा से बाहर आ गये हैं. इस अवधि में बहुआयामी गरीबों का प्रतिशत 74.7 प्रतिशत से घट कर 46.5 प्रतिशत हो गया. रिपोर्ट में बेरोजगारी की चर्चा करते हुए कहा गया है कि 2017-18 में राज्य में बेरोजगारी दर 8.1 प्रतिशत थी. 2018-19 में यह गिर कर 5.5 प्रतिशत तक पहुंच गयी.

कोविड के दौरान बेरोजगारी दर में वृद्धि

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) की रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2020 में राज्य की बेरोजगारी दर 10.6 प्रतिशत थी. कोविड-19 में लॉकडाउन की वजह से इसमें वृद्धि हुई. लॉकडाउन में काम काज बंद होने की वजह से अप्रैल 2020 में बेरोजगारी दर बढ़ कर 47.1 प्रतिशत हो गयी. मई 2020 में यह अपने उच्चतर स्तर 59.2 प्रतिशत तक पहुंच गयी. लॉकडाउन में छूट के साथ बेरोजगारी दर में कमी आती गयी.

राज्य के 26 प्रतिशत श्रम बल को ही सामाजिक सुरक्षा

रिपोर्ट में केंद्रीय सांख्यिकी मंत्रालय के आंकड़ों के हवाले से कहा गया है कि 2018-19 में राज्य के श्रम बल का 57.42 प्रतिशत स्वरोजगार के क्षेत्र में, 23.66 प्रतिशत श्रम बल नियमित वेतन के क्षेत्र में और 18.92 प्रतिशत श्रम बल दैनिक वेतन के आधार पर काम करता था. 2018-19 के आंकड़ों के अनुसार राज्य के 26 प्रतिशत श्रम बल को ही सामाजिक सुरक्षा की सुविधा है.

नया कृषि कानून किसानों के हक में नहीं

रिपोर्ट में नये कृषि बिल की चर्चा करते हुए कहा गया है इसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी का प्रावधान नहीं होने की वजह से यह किसानों के लिए लाभकारी नहीं है. एमएसपी की गारंटी नहीं होने की वजह से किसान, खरीदारों की दया पर निर्भर हो जायेंगे. इस कानून में छोटे किसानों के लिए कुछ नहीं है. नये कृषि कानून से इस बात की आशंका पैदा होती है कि यह कांट्रैक्ट फार्मिंग की तरफ बढ़ेगा. ज्यादा मुनाफा कमाने के उद्देश्य से एेसे में किसानों ने वैसी चीजें पैदा करने को कहा जायेगा, जो खाद्य सामग्रियों की सूची में शामिल नहीं है. एेसी स्थिति में खाद्य सुरक्षा को खतरा हो सकता है. नये कानून में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को विशेष परिस्थितियों में ही नियंत्रित करने का प्रावधान है. इससे कालाबाजारी और जमाखोरी को बढ़ावा मिलेगा. रिपोर्ट में शिक्षा व स्वास्थ्य सहित अन्य नागरिक सुविधाओं में काफी सुधार होने की बात कही गयी है. हालांकि, यह भी कहा गया है कि इन क्षेत्रों में राज्य अभी राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे है.

Posted By : Samir Ranjan.

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