पूरे राज्य के किसानों को नहीं मिल रहा सूकर विकास योजना का लाभ

Updated at : 29 Sep 2020 10:43 PM (IST)
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पूरे राज्य के किसानों को नहीं मिल रहा सूकर विकास योजना का लाभ

पूरे राज्य के किसानों को नहीं मिल रहा सूकर विकास योजना का लाभ

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रांची : पूरे राज्य के किसानों को सूकर विकास योजना का लाभ नहीं मिल रहा है. जबकि पशुपालन विभाग इच्छुक किसानों को रियायती दर पर बेहतर नस्ल का सूकर देता है.

झारखंड के कई इलाकों में सूकर के मीट का काफी प्रचलन है. इसकी मांग भी बहुत है. इस कारण संयुक्त बिहार के समय झारखंड वाले हिस्से में सूकर विकास योजना चलती थी. सूकर उत्पाद की मांग को देखते हुए कांके में एक बेकन फैक्टरी लगायी गयी थी. वहीं पर सूकर विकास पदाधिकारी का राज्य स्तरीय कार्यालय भी संचालित है. इसी के बगल में एक सूकर फार्म भी है. यहीं पर सूकर नस्ल विकास और बिक्री का काम होता है. पहले यहां केवल एक फार्म सूकर विकास प्रक्षेत्र, कांके के नाम से था. 2003 में अस्थायी व्यवस्था के तहत राज्य के अन्य जिलों में संचालित सूकर फार्म को यहां लाया गया था.

इसके तहत जमशेदपुर स्थित गोलपहाड़ी, सरायकेला और होटवार के दो फार्म यहां लाये गये थे. तब तर्क यह दिया गया था कि कुछ दिनों के बाद सभी प्रक्षेत्र खुद अपने-अपने स्थान से संचालित होने लगेंगे. लेकिन, 17 साल गुजर जाने के बाद भी यह प्रक्षेत्र आज भी कांके से ही चल रहा है. नौ पशु चिकित्सकों का है पदस्थापन कांके स्थित इस सूकर फार्म में सभी पांच फॉर्म (होटवार के दो फॉर्म, सरायकेला, गोलपहाड़ी, कांके) को मिला कर नौ पशु चिकित्सकों का पदस्थापन है. इसमें एक राज्य स्तरीय अधिकारी सूकर विकास पदाधिकारी का पद है. इनका अपना कार्यालय भी नहीं है.

बेकन फैक्टरी के गेस्ट हाउस से सूकर विकास पदाधिकारी के पद का संचालन होता है. यहां पदस्थापित पशु चिकित्सकों की पोस्टिंग सरायकेला, गोलपहाड़ी जमशेदपुर आदि जिलों के नाम से होती है, लेकिन इनका कार्यक्षेत्र कांके में ही है. 1350 रुपये में मिलता है 10 किलो का एक सूकर यहां किसानों को रियायती दर पर सूकर का बच्चा उपलब्ध कराया जाता है. इसके लिए किसान को 1350 रुपये देने पड़ते है. सूकर के बच्चे का वजन करीब 10 किलो का होता है. चूंकि राज्य के अन्य जिलों के किसान खुद यहां नहीं आ पाते हैं, इस कारण कई बिचौलिया इसमें सक्रिय हो गये हैं. वह यहां से सूकर ले जाकर किसानों को ऊंची कीमत पर बेचते हैं.

posted by : sameer oraon

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