रांची : सिवरेज-ड्रेनेज मामले में हेमंत अपने गिरेबां में झांकें : सरयू राय
Updated at : 21 Jul 2019 9:38 AM (IST)
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मंत्री सीपी सिंह को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं रांची : राजधानी के सिवरेज-ड्रेनेज मामले में खाद्यापूर्ति मंत्री सरयू राय ने खुला पत्र जारी किया है. उन्होंने लिखा है कि राजधानी के निर्माणाधीन सिवरेज-ड्रेनेज सिस्टम की बदहाली के लिए नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन द्वारा नगर विकास मंत्री सीपी सिंह को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है. स्वयं […]
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मंत्री सीपी सिंह को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं
रांची : राजधानी के सिवरेज-ड्रेनेज मामले में खाद्यापूर्ति मंत्री सरयू राय ने खुला पत्र जारी किया है. उन्होंने लिखा है कि राजधानी के निर्माणाधीन सिवरेज-ड्रेनेज सिस्टम की बदहाली के लिए नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन द्वारा नगर विकास मंत्री सीपी सिंह को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है. स्वयं हेमंत सोरेन ने राज्य का नगर विकास मंत्री रहते हुए इस संबंध में महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी की तथा अयोग्य साबित हो चुके मेनहर्ट परामर्शी को 17 करोड़ रुपये बकाया भुगतान करने के लिए कैबिनेट से संकल्प पारित कराया है.
जबकि इसके पहले निगरानी (तकनीकी कोषांग) की जांच में यह साबित हो गया था कि रांची के प्रस्तावित सिवरेज-ड्रेनेज सिस्टम का डीपीआर बनाने और इसके क्रियान्वयन का पर्यवेक्षण करने के लिए मेनहर्ट परामर्शी की नियुक्ति अवैध थी और मेनहर्ट इस कार्य के लिए तकनीकी रूप से अयोग्य था.
छह अगस्त-2010 को निगरानी (तकनीकी कोषांग) के मुख्य अभियंता ने तत्कालीन निगरानी आयुक्त राजबाला वर्मा को जांच रिपोर्ट सौंपी थी और कहा था कि इस निविदा में प्रकाशन से लेकर निविदा निष्पादन की प्रक्रिया तक त्रुटिपूर्ण रही है और तकनीकी कारणों से मेनहर्ट अयोग्य है. राजबाला वर्मा ने जांच प्रतिवेदन पर अग्रतर कार्रवाई करने के बदले में 21 फरवरी 2011 को संबंधित संचिका नगर विकास विभाग में भेज दी. इसके बाद 13 जुलाई 2011 को नगर विकास विभाग ने कैबिनेट से संकल्प पारित कराकर मेनहर्ट को 17 करोड़ रुपये का बकाया भुगतान कर दिया. इस बारे में नगर विकास विभाग ने हाइकोर्ट के 25 अप्रैल 2011 के निर्णय के विरुद्ध झारखंड हाइकोर्ट की खंडपीठ में अपील दायर नहीं करने का निर्णय लिया.
इससे स्पष्ट है कि नगर विकास मंत्री रहते हेमंत सोरेन ने निगरानी जांच में अयोग्य साबित हो चुके मेनहर्ट को न केवल 17 करोड़ रु बकाया भुगतान किया, बल्कि इसके विरुद्ध हाइकोर्ट की खंडपीठ में अपील दायर करने से भी मना कर दिया. दूसरी ओर सीपी सिंह ने वर्तमान सरकार में नगर विकास मंत्री बनने के बाद मेनहर्ट को पर्यवेक्षण के काम से हटा दिया. बाद में ड्रेनेज निर्माण पर पथ निर्माण विभाग ने भी 140 करोड़ रुपये खर्च किये, पर ड्रेनेज सिस्टम कामयाब नहीं हुआ. सवाल है कि पथ निर्माण विभाग द्वारा बनाया गया ड्रेनेज सिस्टम मेनहर्ट के डीपीआर के अनुरूप था या नहीं? यह महज संयोग नहीं हो सकता कि जिन राजबाला वर्मा ने निगरानी (तकनीकी कोषांग) की जांच में दोषी पाये गये मेनहर्ट पर कार्रवाई करने की संचिका निगरानी आयुक्त के रूप में दबा दी, उन्हीं राजबाला वर्मा ने पथ निर्माण सचिव के नाते रांची में स्वतंत्र ड्रेनेज सिस्टम का निर्माण भी करा दिया.
यह उल्लेख अप्रासंगिक नहीं होगा कि 16 अक्तूबर 2009 से 28 अगस्त 2011 के बीच निगरानी ब्यूरो के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक एमवी राव ने हाइकोर्ट के निदेशानुसार आधा दर्जन से अधिक बार निगरानी आयुक्त से अग्रतर कार्रवाई के लिए निर्देश मांगा, लेकिन यह निर्देश उन्हें नहीं मिला. इस अवधि में शिबू सोरेन राज्य के मुख्यमंत्री तथा हेमंत सोरेन नगर विकास मंत्री रहे थे. इसलिए रांची के सिवरेज-ड्रेनेज सिस्टम की बदहाली के लिए सीपी सिंह को दोषी ठहराये जाने की जगह हेमंत सोरेन को अपने गिरेबां में झांकना चाहिए.
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