झारखंड : संसाधनों को बचाने के लिए गांवों को करें सशक्त : विनय सेंगर

By Prabhat Khabar Digital Desk
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‘धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियां’ विषयक तीन दिवसीय द्विवार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन का दूसरा दिन
रांची : फोरम ऑफ रिलीजियस फॉर जस्टिस एंड पीस के द्विवार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन के कार्यक्रम को आमंत्रित वक्ता, भारत जन आंदोलन के विनय सेंगर ने संबोधित किया. उन्होंने कहा कि राज्य सत्ता की निगाह संसाधन बहुल क्षेत्रों पर है़ पूंजीवाद समर्थक व्यवस्था को प्राकृतिक संसाधनों की जरूरत है, इसलिए यह समाज को एक नहीं होने देना चाहती.
हमारी रणनीति संसाधनों को बचाने की होनी चाहिए, अन्यथा हमारे संसाधनों से सशक्त होकर राज्य हमें ही तोड़ेगा और हमारी सभ्यता, संस्कृति व अस्मिता खतरे में आ जायेगी़ यह समझने की आवश्यकता है कि समाज संप्रभु है, राज्य नहीं. यह दुनिया भोगवादी व्यवस्था को बर्दाश्त नहीं कर सकती़ यह सम्मेलन 'धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियां' विषय पर नामकुम स्थित झरना स्प्रिचुएलिटी सेंटर में सोमवार तक आयोजित है़
क्या करोड़पति व्यक्ति हो सकते हैं गरीबों के प्रतिनिधि ?
मानवाधिकार कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग ने कहा कि आज देश का लोकतंत्र पूंजीपति चला रहे हैं. संसद भवन करोड़पतियों से भरा है़ क्या करोड़पति व्यक्ति गरीबों के प्रतिनिधि हो सकते हैं? देश की 73 प्रतिशत संपत्ति सिर्फ एक प्रतिशत लोगों के पास है़ विकास और आर्थिक तरक्की के नाम पर औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देनेवाली सरकारी नीतियों के कारण छोटे किसान अपनी खेती की जमीन नहीं बचा पा रहे़ भूमिहीन कृषक मजदूरों की संख्या 14.43 करोड़ तक पहुंच गयी है़
लोगों को भूमि का अधिकार मिलना जरूरी है, क्योंकि कमजोर तबकों की खाद्य सुरक्षा कृषि पर ही निर्भर है़ रविवार को सिस्टर एलिस ने 'प्रजातंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी', सिस्टर एस इमानुएल ने 'प्रजातंत्र आैर जाति आधारित असमानताएं', दयामनी बारला ने 'अमीरों व गरीबों के बीच बढ़ती खाई ' और वासवी किड़ो ने 'प्रजातंत्र में असहमति का अधिकार' विषय पर विचार रखे़ सम्मेलन में विभिन्न राज्यों से 70 से अधिक मसीही धर्मसमाजी उपस्थित हैं.
आदिवासी क्षेत्र ही बचायेंगे लोकतंत्र
विनय सेंगर ने कहा कि आदिवासियाें की जमीन पर हमले तेज हो रहे हैं. राज्यसत्ता हमारे गांव, खेत-खलिहान के खिलाफ है़ हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए, जो गांवों का मालिकाना स्वीकार करे और जो औद्योगिक सत्ता के खिलाफ हो़ आजादी की यह लड़ाई आदिवासी क्षेत्रों से शुरू होगी, क्योंकि जमीन से उनका गहरा लगाव है़
इस लड़ाई में गैर आदिवासियाें को भी साथ लेकर चलने की जरूरत है़ आदिवासी क्षेत्र ही लोकतंत्र बचायेंगे़ यह लड़ाई सिर्फ रक्षात्मक होकर नहीं लड़ सकते, अपना अस्तित्व बचाने के लिए आक्रामक भी होना होगा़ गांव को राजनीतिक अस्तित्व बनाना होगा़ गांव-गांव को जोड़ने की आवश्यकता है़ वैकल्पिक राजनीति समय की मांग है़

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