कड़ाके की ठंड के बावजूद लगातार बढ़ रही है चुनावी तपिश, संभावित प्रत्याशी अभी से ही लग गये हैं जनसेवा में
Updated at : 10 Jan 2018 9:12 AM (IST)
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गोपी कुंवर लोहरदगा : नगर परिषद चुनाव की अधिसूचना जारी होने के पूर्व ही चुनाव की तैयारी होने लगी है. जिले में जहां एक ओर कड़ाके की ठंड पड़ रही है वहीं दूसरी ओर चुनावी तपिश लगातार बढ़ती जा रही है. इस बार निर्वाचन आयोग ने दलगत चुनाव कराने का निर्णय लिया है. यही कारण […]
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गोपी कुंवर
लोहरदगा : नगर परिषद चुनाव की अधिसूचना जारी होने के पूर्व ही चुनाव की तैयारी होने लगी है. जिले में जहां एक ओर कड़ाके की ठंड पड़ रही है वहीं दूसरी ओर चुनावी तपिश लगातार बढ़ती जा रही है. इस बार निर्वाचन आयोग ने दलगत चुनाव कराने का निर्णय लिया है. यही कारण है कि विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं की पूछ एकबारगी बढ़ गयी है.
कई ऐसे दल के लोग भी अखबारों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में लग गये हैं जिन्हें कल तक वे खुद भी पसंद नहीं करते थे. नगर परिषद चुनाव को लेकर जहां संभावित प्रत्याशी अपनी जीत हार का आकलन करने में जुटे हैं, वहीं कई दलों के नेता, कार्यकर्ता इसे एक सुनहरा अवसर मानकर इसका भरपूर लाभ उठा रहे हैं. उन लोगों के अच्छे दिन की शुरूआत नववर्ष के प्रारंभ से हो गयी है. खिलाने-पिलाने का दौर बदस्तूर जारी है. कल तक जो मोटरसाइकिल में घूमते थे, वे अब अचानक स्कार्पियो एवं खुली जीप में घूमते नजर आने लगे हैं. किसी को भी जिताना और हराना उनके बायें हाथ का खेल बन गया है.
अनुसूचित जन जाति महिला के लिए अध्यक्ष का पद आरक्षित हो चुका है और इस पद के लिए कई बड़े नाम और चेहरे सामने आने लगे हैं. सूत्र बताते हैं कि इस बार के चुनाव में संभावित उम्मीदवार दिल खोलकर पैसा खर्च करेंगे और इसकी बानगी भी अभी से नजर आने लगी है. समाज सेवा की एक लहर सी चल पड़ी है. इस कड़ाके की ठंड में लोगों की परेशानी देखी नहीं जा रही है और कंबल बांटने का कार्य बदस्तूर जारी है.
मजदूरों को हक दिलाने के लिए एक नहीं कई लोग आगे आ गये हैं. मुहल्लों की समस्याओं को देखकर संभावित प्रत्याशी अचानक से दुखी होने लगे हैं. उनका कहना है कि सेवा का एक मौका दें, तस्वीर एवं तकदीर दोनों बदल देंगे. संभावित प्रत्याशियों के व्यवहार एवं उनके ऊंचे आदर्श को देखकर लोग आश्चर्यचकित हैं. इधर नगर परिषद के उपाध्यक्ष पद के दावेदारों की लंबी सूची है.
कोई कह रहा है कि वे जनता के दबाव में चुनाव मैदान में उतर रहे हैं तो किसी का कहना है कि सेवा ही उनका धर्म है. कोई जनता की परेशानी को देखकर बेचैन हो रहा है और उपाध्यक्ष बनकर जनता की समस्याओं का निदान करना चाहता है. जनता बड़ी खामोशी से सबकुछ देख रही है. राजनीतिक दल के लोग इस बात से पूरी तरह वाकिफ हैं कि आने वाले दिनों में उनकी होली और दीवाली जबरदस्त तरीके से मनेगी.
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