सीएनटी एक्ट में संशोधन स्वीकार नहीं

Updated at : 10 Mar 2017 9:31 AM (IST)
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सीएनटी एक्ट में संशोधन स्वीकार नहीं

खूंटी : सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन के राज्य सरकार के प्रस्ताव को रद्द करने की मांग को लेकर गुरुवार को खूंटी के भंडरा गांव में संयुक्त ग्रामसभा की बैठक हुई. अध्यक्षता ग्राम प्रधान बिरसा मुंडा ने की. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की नजर आदिवासियों की भूमि पर है. उक्त दोनों एक्ट में संशोधन आदिवासियों […]

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खूंटी : सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन के राज्य सरकार के प्रस्ताव को रद्द करने की मांग को लेकर गुरुवार को खूंटी के भंडरा गांव में संयुक्त ग्रामसभा की बैठक हुई. अध्यक्षता ग्राम प्रधान बिरसा मुंडा ने की. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की नजर आदिवासियों की भूमि पर है.
उक्त दोनों एक्ट में संशोधन आदिवासियों की भूमि को हड़पने के लिए किया जा रहा है. सभी इसका पुरजोर विरोध तब तक करते रहेंगे, जब तक की उक्त एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव रद्द नहीं हो जाता है.
आदिवासी महासभा के राष्ट्रीय महासचिव एसी कृष्णा हांसदा ने कहा कि सीएनटी -एसपीटी एक्ट आदिवासियों की जान है. इसी से आदिवासियों की अस्मिता की रक्षा हो रही है. किसी भी हालत में उक्त दोनों एक्ट में संशोधन स्वीकार नहीं होगा. उन्होंने कहा कि उक्त दोनों एक्ट अगर संशोधित होता भी है तो वह नियमत: असंवैधानिक हो जायेगा.
डॉ युसुफ पूर्ति ने कहा कि आदिवासियों की जल, जंगल व जमीन ही पहचान है. किसी भी कीमत पर एक्ट में संशोधन होने नहीं देंगे. मंगल सिंह मुंडा, बिरसा मुंडा, डोमाय मुंडा, बीर सिंह मुंडा ने कहा कि आदिवासियों की सबसे बड़ी पूंजी जल, जंगल और जमीन है. एक्ट में संशोधन आदिवासियों को जमीन से बेदखल करने के लिए किया जा रहा है. पांडेया टूटी, शनिका मुंडू, सुखराम मुंडा ने कहा कि एक्ट में संशोधन करने के पीछे सरकार की मंशा कॉरपोरेट सेक्टर को आदिवासियों की जमीन दिलाना है. यह मंशा कभी पूरी नहीं होगी. कार्यक्रम में भंडरा सहित सोयको, जिकिलता, गुटूहातू, सिलादोन आदि गांवों से सैकड़ों की संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया. मौके पर हाली मुंडा, मंगल मुंडा, राय मुंडा, बालगोविंद तिर्की व अन्य मौजूद थे.
तीन बिंदुओं पर हुई चर्चा : सभा में तीन बिंदुओं पर चर्चा हुई. पहला सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन के प्रस्ताव को रद्द करने व स्वशासन व्यवस्था के सशक्तीकरण, दूसरी उच्चतम न्यायालय के केपी रमी रेड्डी जजमेंट (वर्ष 1988)जिसमें कहा गया है शिड्यूल एरिया में आदिवासियों की जमीन का स्थानांतरण नहीं होगा व तीसरी समता जजमेंट(1977)जिसमें कहा गया है कि शिड्यूल एरिया में जो भी जमीन है, वह न तो राज्य सरकार की है और न ही केंद्र सरकार की. यह जमीन भारत सरकार की है.
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