गुमनामी में जीते हैं पंडाल बनानेवाले कारीगर...ओके

Updated at : 18 Oct 2015 9:25 PM (IST)
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गुमनामी में जीते हैं पंडाल बनानेवाले कारीगर...ओके

गुमनामी में जीते हैं पंडाल बनानेवाले कारीगर…ओकेफोटो १,२,3,४ खूंटी. पंडाल का निर्माण करना एक कला है. पंडाल की तो खूब प्रशंसा होती है, लेकिन इसे बनानेवाले को कोई नहीं पूछता है. उक्त बातें पुरूलिया (पश्चिम बंगाल) के तपन पाल ने कही. वे अपनी टीम के साथ बाजारटांड़ खूंटी में नेताजी चौक पूजा पंडाल का निर्माण […]

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गुमनामी में जीते हैं पंडाल बनानेवाले कारीगर…ओकेफोटो १,२,3,४ खूंटी. पंडाल का निर्माण करना एक कला है. पंडाल की तो खूब प्रशंसा होती है, लेकिन इसे बनानेवाले को कोई नहीं पूछता है. उक्त बातें पुरूलिया (पश्चिम बंगाल) के तपन पाल ने कही. वे अपनी टीम के साथ बाजारटांड़ खूंटी में नेताजी चौक पूजा पंडाल का निर्माण कर रहे हैं. वे बताते हैं कि निश्चित समय पर काम पूरा करने की चुनौती रहती है. प्रतिदिन 20 घंटे तक लगातार काम करना पड़ता है. सहयोगी बापी दास, संजय पाल व कार्तिक पाल बताते हैं कि कारीगरों के हाथ पंडालों में रस्सी बांधते-बांधते छिल जाते है. शारीरिक थकान से चूर हो जाता है, लेकिन जब पंडाल बन कर तैयार हो जाता है, तो उसे देख कर सारी तकलीफ दूर हो जाती है. पंडाल बनाने की कला उन्हें विरासत में मिली है. प्रतिदिन मजदूरी में इन्हें चार सौ रुपये मिलते हैं. इसी से उनके परिवार का भरण-पोषण होता है.

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