41 साल बाद भी नहीं भरे नरसंहार के जख्म

Published at :14 Jun 2016 6:09 AM (IST)
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41 साल बाद भी नहीं भरे नरसंहार के जख्म

चिरूडीह. महाजनी प्रथा के विरोध में आंदोलन के दौरान 13 लोगों ने गंवायी थी जान, फटेहाल हैं परिजन जामताड़ा जिले के चिरूडीह गांव में सन 1975 में महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन चलाने के दौरान 13 लोग मारे गए थे. चार दशक बीत जाने के बाद भी सरकारी महकमे ने उनके परिजनों को किसी तरह […]

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चिरूडीह. महाजनी प्रथा के विरोध में आंदोलन के दौरान 13 लोगों ने गंवायी थी जान, फटेहाल हैं परिजन

जामताड़ा जिले के चिरूडीह गांव में सन 1975 में महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन चलाने के दौरान 13 लोग मारे गए थे. चार दशक बीत जाने के बाद भी सरकारी महकमे ने उनके परिजनों को किसी तरह की सहायता मुहैया नहीं करायी है. पेश है खास रिपोर्ट
जामताड़ा : जामताड़ा जिला का नारायणपुर प्रखंड. गांव का नाम चिरूडीह. दिन 23 जनवरी,1975. मुहर्रम का त्योहार. आज भी इस दिन को याद करके गांव के लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं. क्योंकि आज से 41 वर्ष पहले ठीक मुहर्रम के दिन चिरूडीह गांव में मातम छा गया था. यही वह काला दिन था जिस दिन इस गांव के 13 लोगों ने अपनी जान गंवायी थी. इन लोगों की जानें किसी सांप्रदायिक दंगे में नहीं बल्कि महाजनी प्रथा के विरुद्ध छिड़े आंदोलन के कारण गयी थी. महाजनी प्रथा के विरुद्ध छिड़े आंदोलन का कलंक आज भी यहां के लोग ढोने को मजबूर हैं.
इस संघर्ष में किसी ने अपना पिता खोया, तो किसी ने मां तो किसी ने बेटा. एक घर के तीन-तीन लोगों की हत्या कर दी गयी. आज उनके परिवार का हाल यह है कि कोई मजदूरी करके गुजर-बसर कर रहा है तो कोई पकौड़ी बेचकर परिवार चला रहे हैं.
नहीं मिली कोई सहायता : मातमी कलंक की टीस आज भी उनके परिजनों के मन में है. उनके परिजनों को दर्द इस बात की भी है कि इस घटना में घर जला दिया गया, गाय-मवेशी भाग गये,
बेघर होकर दर-दर भटकना पड़ा. बड़ी मुश्किल से परिवार के लोगों ने फिर घर बनाया. लेकिन सरकार और प्रशासन ने सहायता के नाम पर फूटी कौड़ी भी नहीं मिली. और न ही किसी राजनीतिक दल के लोगों ने उनकी सुधि ली. बस नेताओं ने उन लोगों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया. लोगों का कहना था कि आखिर उनका क्या गुनाह था कि सरकार और प्रशासन ने मुंह मोड़ लिया. सरकार की नजर में तो अमीर-गरीब सब समान हैं. लेकिन आज तक सरकारी व प्रशासनिक महकमा चिरूडीह गांव में झांकने तक नहीं आया, सहायता तो दूर की बात है.
जनवरी 1975 में जामताड़ा जिले के नारायणपुर प्रखंड में हुआ था आंदोलन
घर जला दिये गये, दाने-दाने को मोहताज हो गये थे परिजन
कुछ का पकौड़ी बेचकर, तो कुछ का मजदूरी से चल रहा गुजारा
राजनीतिक दलों ने नहीं ली सुधि, केवल राजनीति साधते रहे
कितनी सरकारेें आयी और गयी, पर नहीं मिली किसी तरह की मदद
सहायता की आस में गुजर रही पीढ़ी दर पीढ़ी
कहने को थे महाजन आज हैंड टू माउथ
कहने के लिए वे परिवार कभी महाजन थे. उनके परिजनों की जान भी उसी कारण गयी. लेकिन उन परिवारों की स्थिति को देखेंगे तो तरस आयेगा. आज वह परिवार महाजनी का कलंक झेल रहा है. महाजनी प्रथा में जान गंवाने वाले कई परिवारों की स्थिति तो यह है कि लोग मजदूरी करने को विवश हैं. हालांकि चिरूडीह गांव में हुए महाजनी लड़ाई का न्यायिक फैसला आ गया है. दोषियों को सजा भी मिल गयी है. लेकिन जिनके घर के लोगों की जानें गयी, उनके अंदर की टीस, उनके अंदर का दर्द आज भी बरकरार है.
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