गुमला को खुशहाल बनाने का लें संकल्प
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :21 Mar 2018 4:29 AM (IST)
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आदिवासियों का पवित्र पर्व : स्पीकर विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव ने कहा कि सरहुल आदिवासियों का पवित्र पर्व है. यह प्रेम व भाईचारगी के साथ रहने का संदेश देता है. वर्तमान समय में हम प्रकृति के साथ जितना अधिक सामंजस्य बनायेंगे, उतना ही हमारा विकास होगा. हम सभी को पर्व के अवसर पर प्रकृति के […]
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आदिवासियों का पवित्र पर्व : स्पीकर
विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव ने कहा कि सरहुल आदिवासियों का पवित्र पर्व है. यह प्रेम व भाईचारगी के साथ रहने का संदेश देता है. वर्तमान समय में हम प्रकृति के साथ जितना अधिक सामंजस्य बनायेंगे, उतना ही हमारा विकास होगा. हम सभी को पर्व के अवसर पर प्रकृति के संतुलन को बनाये रखने का संकल्प लेने की जरूरत है.
प्रकृति हमारी मां है : चमरा लिंडा
बिशुनपुर विधायक चमरा लिंडा ने कहा कि मैं धरती माता को नमन् करता हूं. प्रकृति हमारी जननी है. एक वह मां है, जो हमें जन्म देती है. दूसरी प्रकृति मां है, जिसके कोख पर हम खेल कर बड़े होते हैं. हम आज के दिन प्रकृति को बचाने का संकल्प लें. प्रकृति है, तो हमारा जीवन है. हम प्रकृति के पुजारी हैं. इसलिए हमारा कर्तव्य बनता है कि हम इसे बचायें. उन्होंने कहा कि सरहुल पर्व हमें भाईचारगी का संदेश देता है.
सरहुल पर्व धरती माता को समर्पित है : सुदर्शन
केंद्रीय मंत्री सह सांसद सुदर्शन भगत ने कहा कि सरहुल पूजा प्रकृति से प्रेम करना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना सिखाता है. प्रकृति से प्रेम करने वाला और उसे बचा कर रखने वाला जनमानस ही सही मायने में अपने अस्तित्व को युगों तक बचाये रख सकता है.
हालांकि सरहुल मुख्य रूप से जनजातियों का पर्व है, जो झारखंड, ओड़िशा, बंगाल और मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्रों में मनाया जाता है. लेकिन अन्य धर्म संप्रदायों के लोग भी बधाई देते हैं और उत्सव में शामिल होते हैं. यह पर्व नये साल की शुरुआत का प्रतीक है. यह बसंत ऋतु के दौरान मनाया जाने वाले वार्षिक महोत्सव की तरह है, जिसमें पेड़ और प्रकृति के अन्य तत्वों की पूजा होती है.
सरहुल का शाब्दिक अर्थ है साल (वृक्ष) की पूजा, बसंत ऋतु में साल (शोरिया रोबस्टा) पेड़ों को अपनी शाखाओं पर नये फूल मिलते हैं. हमारी जनजातीय संस्कृति का यह त्योहार धरती माता को समर्पित है. सरहुल कई दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें मुख्य पारंपरिक नृत्य किया जाता है. आदिवासी पूर्वजों का मानना है कि प्रकृति ही हमारा पालन-पोषण करती है, तो प्रकृति के इस उपकार के लिए हम धन्यवाद व्यक्त करते हैं और लोक नृत्य, गीतों आदि के साथ उत्सव मनाते हैं.
पेड़-पौधा को बचायेें : गीताश्री उरांव
पूर्व शिक्षा मंत्री गीताश्री उरांव ने कहा कि सरहुल प्रकृति पर्व है. यह प्रकृति व मनुष्य के मिलन का पर्व है. प्रकृति नहीं होगी, तो मनुष्य का जीवन समाप्त हो जायेगा. हवा व पानी प्रकृति से जुड़ा है. हम अपने जीवन के लिए प्रकृति को बचायें. सरहुल में हम संकल्प लें कि पौधा लगायेंगे और उसका संरक्षण करेंगे. सरहुल पर्व की महत्ता को समझें और प्रकृति संरक्षण पर ध्यान दें.
पृथ्वी व सूर्य के विवाह का पर्व : अशोक
आदिवासी छात्र संघ के जिलाध्यक्ष अशोक कुमार भगत ने कहा कि सरहुल पर्व अर्थात यह नये जीवन की शुरुआत का पर्व है. उन्होंने सरहुल पर्व मनाने की कथा बतायी. कहा कि यह पृथ्वी व सूर्य के विवाह का पर्व है. इस पर्व की कहानी के पीछे प्रकृति का इतिहास जुड़ा है. सरहुल के बाद कई महत्वपूर्ण कार्य शुरू होते हैं.
गुमला विकास के पथ बढ़े : शिवशंकर उरांव
गुमला विधायक शिवशंकर उरांव ने कहा कि आज प्रकृति पर्व सरहुल है. यह पर्व हमें आपसी प्रेम व भाईचारगी से रहने का संदेश देता है. आज के दिन हम सभी गुमला के विकास व खुशहाल बनाने का संकल्प लें. गुमला की जो परंपरा आपसी प्रेम का रहा है, वह बनी रहे. धरती मां हमें अन्न, जल देती है. प्रकृति से हमारा जीवन जुड़ा है, इसलिए हम इसका संरक्षण करें
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