कोल बेयरिंग एक्ट में 30 साल बाद रैयतों को लौटा देनी है जमीन

Published at :04 Jan 2017 5:38 AM (IST)
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कोल बेयरिंग एक्ट में 30 साल बाद रैयतों को लौटा देनी है जमीन

गोड्डा : राजमहल कोल परियोजना में धनबाद माइनिंग की तरह ही अंडरग्राउंड खनन का कार्य किया जाता है. सरकार 1974 में अंडर माइनिंग को अपने अंडर लेते वर्ष 1976 खनन कार्य शुरू किया था. परियोजना ने 1977 में अंडर माईिनंग को ओपेने कास्ट माइनिंग में तब्दील कर दिया. इस दौरान 1974 में जिन स्थानीय लोग […]

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गोड्डा : राजमहल कोल परियोजना में धनबाद माइनिंग की तरह ही अंडरग्राउंड खनन का कार्य किया जाता है. सरकार 1974 में अंडर माइनिंग को अपने अंडर लेते वर्ष 1976 खनन कार्य शुरू किया था. परियोजना ने 1977 में अंडर माईिनंग को ओपेने कास्ट माइनिंग में तब्दील कर दिया. इस दौरान 1974 में जिन स्थानीय लोग कोयले की खुदाई में लगे थे. उन्हें ओपेन कोल माइनिंग में परियोजना द्वारा रख लिया गया. लोहंडिया साइट के खादान संख्या 9, 10, तथा 11 में काम चल रहा था. परियोजना के ओपेन कास्ट के बाद से 12 नंबर खादान जहां पर आज ओसीपी कार्यालय है.

कोल बेरिरिंग एक्ट 1969 के तहत सरकार ने ली जमीन: केंद्र सरकार ने कोल बेरिरिंग एक्ट 1969 के तहत ईसीएल के लिये जमीन अधिग्रहण किया. एक्ट के तहत सरकार को लोगों ने स्वेच्छा से जमीन मुहैया कराया. इस एक्ट के तहत केंद्र सरकार के संधारित कानून में इस बात का जिक्र है कि कोल बेररिंग एक्ट में राज्य सरकार की ओर से पारित काेई भी कानून इसके परिपेक्ष में नहीं आयेगा. इस कारण यहां एसपीटी एक्ट लागू नहीं है. लेकिन सरकार की ओर ली जाने वाली जमीन में शर्त थी कि रैयतों से ली जाने वाली जमीन ‘क्रांप कंपनसेशन’के आधार पर अधिग्रहित की गयी थी.
इसमें 30 साल के लिये जमीन लेने का प्रावधान है. इसके बाद रैयतों को जमीन वापस करने का प्रावधान है. मगर 30 साल के दौरान जमीन का अधिकार इसीएल रहेगा. ऐसा एक्ट में दर्ज है. 30 साल बाद रैयतों से ली गयी जमीन को उसी रूप में वापस करने का भी प्रावधान है.
अरुण सहाय व रामजी साह .
राजमहल कोल परियोजना का घालमेल
एक्ट के अनुसार आउट सोर्सिंग कंपनी से काम कराने का सवाल ही नहीं
वन विभाग को दे दी गयी थी नीमाकला डंपिंग साइट की 40 एकड़ जमीन
काेर्ट ने भी लगाया स्टे ऑर्डर
दो वर्ष पूर्व इसीएल द्वारा वन विभाग को नीमाकला डंपिंग साइट में 40 एकड़ जमीन वन विभाग को स्थानांतरित कर दिया गया. जमीन स्थानीय रैयतों की थी. तात्कालीन सीओ ने म्यूटेशन कर दिया गया. इसे रैयतों ने कोर्ट में चुनौती के बाद
2015-16 में कोर्ट द्वारा संतालपरगना टेंंनेंसी एक्ट के तहत जमीन के नेचर में किसी भी तरह का बदलाव नहीं होने तथा स्थातरण पर रोक लगाते आॅर्डर जारी किया गया. इस तरह परियोजना के द्वारा हस्तांतरित जमीन वन विभाग को नहीं मिल पाया. माले नेता अरुण सहाय तथा ऐटक नेता रामजी साह ने बताया कि इसीएल के इस झालमेल के कारण कई दिनों तक मामला गरमाया रहा. बताया कि जब इसीएल का मालिकाना हक है और वन विभाग तक को जमीन नहीं दी जा सकती है. तो फिर महालक्ष्मी कंपनी को खुदाई के लिए जमीन देने का अधिकार ही नहीं है.
भू-विस्थापितों के साथ आंदोलन की बनेगी रणनीति
माले नेता अरुण सहाय ने जानकारी देते हुये बताया कि खादान हादसा को लेकर बुधवार को एआईसीसीटी यू के राज्याध्यक्ष सुवेंदु सेन आ रहे है. श्री सेन के साथ कृष्णा सिंह, उपेंद्र सिंह, गीता मंडल भी रहेंगी. ललमटिया के नीमाकला गांव में भू-विस्थापित गांवों में चितरकोठी, भोंडाय, लोहंडिया तथा बसडीहा के भू-विस्थापितों के साथ बैठक में आंदोलन की रणनीति बनेगी.
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