धीमी चाक पर रेंग रही कुम्हारों की जिंदगी

Published at :24 Oct 2016 2:57 AM (IST)
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धीमी चाक पर रेंग रही कुम्हारों की जिंदगी

जागरूकता. परंपरागत धंधे से विमुख हो रहे कुम्हार, जरूरत है पहल कर इनके जीवन को संवारने की विलुप्ति के कगार पर कला, सरकारी पहल की भी है खास जरूरत बासुकिनाथ : रोशनी का पर्व दीपावली आने से पूर्व ही कुम्हार समुदाय के लोग मिट्टी की दीपक बनाने में जुट जाते थे. लेकिन अब मिट्टी की […]

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जागरूकता. परंपरागत धंधे से विमुख हो रहे कुम्हार, जरूरत है पहल कर इनके जीवन को संवारने की

विलुप्ति के कगार पर कला, सरकारी पहल की भी है खास जरूरत
बासुकिनाथ : रोशनी का पर्व दीपावली आने से पूर्व ही कुम्हार समुदाय के लोग मिट्टी की दीपक बनाने में जुट जाते थे. लेकिन अब मिट्टी की बनी सामग्री की घटती मांग को देख कुम्हारों ने इसे बनाना भी कम कर दिया है. बदलते जमाने के इस दौर में मिट्टी के दीये की जगह आधुनिक जमाने के रंग-बिरंगे बिजली के बल्ब व मोमबत्तियों ने ले ली है.
मिट्टी के पुश्तैनी व्यवसाय को छोड़कर कुम्हार अन्य कार्य करने लगे हैं. जरमुंंडी इलाके में रहने वाले कुम्हार ने बताया कि कभी एक समय था जब हमारे पास जीवन-यापन का एक मात्र साधन चाक ही था. मगर आज इसकी रफ्तार धीमी पड़ गयी है और पूरे परिवार का भरण-पोषण करने में असक्षम हो गयी है.
हम सभी करें भी तो क्या करें. अब हमारी पीढ़ी इसे सिखना नहीं चाहती और अगर ऐसा हुआ तो यह कला भी विलुप्त हो जायेगी. हां, आगे आने वाली पीढ़ी इसे तसवीरों व संग्रहालय में भी देख पायेगी. जरूरत है सरकार तक हमारी गुहार पहंचे और इसके संरक्षण के लिए खास कदम उठायें जाय.
मिट्टी के दीये की जगह बल्ब व मोमबत्तियाें की चकाचौंध में गुम हो रहे कुम्हार
मिट्टी के दीये व अन्य सामान बनाता कुम्हार परिवार.
सामग्री प्रयोग के संकल्प की जरूरत
कुम्हार का ठहरा हुआ चाक समाज के हर व्यक्ति से दीपावली पर मिट्टी के दीप के व्यापक प्रयोग करने की गुजारिश कर रहा है. एक समय था जब त्योहार में सभी व्यक्ति को मिट्टी से बने दिए की जरूरत पड़ती थी. आज किसी को इसकी आवश्यकता नहीं है. कुछ वर्ष पहले मिट्टी के बने घड़े, सुराही, कुल्हड़, बर्त्तन आदि का प्रयोग होता था और बाजार में इसकी डिमांड को देखते हुए व्यवसाय भी जीवकोपार्जन के लिये ठीक-ठाक ही था. मगर वर्तमान परिदृश्य में यह एकदम बदल गया है और यह कला विलुप्त होने के कगार पर है.
नहीं निकलती लागत
कुम्हारों ने बताया कि आजकल मिट्टी की कीमत में भी वृद्धि हो गयी है. जिसमें मेहनत जोड़ दिया जाय तो सामग्री की लागत भी बाजार से नहीं निकल पाती है. ऐसे में इस पेशे से जुड़कर रहना आत्महत्या हत्या करने के बराबर है.
कुम्हारों ने सुनायी व्यथा व लोगों ने रखी राय
कभी दीपावली जैसे त्योहार में वे करीब चालीस हजार मिट्टी के दीपक बेचते थे. इससे अच्छी आमदनी भी होती थी. वर्तमान समय में वे दस हजार दीपक बनाकर बेचते हैं. मेले में मिट्टी के बने रंग बिरंगी खिलौनों की भी काफी मांग थी. लेकिन आज बच्चे मिट्टी के खिलौनों की जगह प्लास्टिक के खिलौने ज्यादा पसंद करते हैं.
– पतितपावन पंडित, कुम्हार
मिट्टी से बने उस खिलौनों को प्रखंड क्षेत्र में लगने वाले सभी मेले में ले जाकर बेचते थे. जिससे अच्छी आमदनी भी हो जाती थी. लेकिन बदलते जमाने में सब कुछ बदल गया. बच्चे मुर्गा मोबाइल, बंदुक, प्लास्टिक की गाड़ी, हवाई जहाज, बैलून आदि की ज्यादा मांग करते हैं.
– प्रमिला देवी, कुम्हार
अब मेले में सिर्फ मिट्टी के बने गोलक बिकते हैं. प्लास्टिक के इस जमाने में मिट्टी के समान की मांग कम हो गयी है. मिट्टी का पुश्तैनी धंधा से जुड़कर रहने से अच्छा है कि मेहनत मजदूरी की जाय. इस धंधा से परिवार चलाना मुश्किल हो गया है.
– तेजु पंडित, कुम्हार
दीपावली के इस त्योहार में प्रत्येक व्यक्ति कुम्हारों द्वारा बनाये गये मिट्टी के बने दीपक, गणेश लक्ष्मी की मूर्ति का व्यापक रूप में प्रयोग करने का संकल्प लें ताकि कुम्हार अपने पुश्तैनी व्यवसाय से जीविकोपार्जन कर अपने बच्चों का लालन पालन सही तरीके से कर सकें. जिससे उनके जीवन में किसी प्रकार की कोई परेशानी न हो.
– रविकांत मिश्रा
लोगों ने रखी अपनी राय
मिट्टी के दीये के प्रयोग से पर्यावरण शुद्ध रहता है, कुम्हार बर्तन बनाकर परिवार व बच्चों का जीविकोपार्जन करते हैं. उसे प्रोत्साहन की आवश्यकता है जिससे उनके परिवार चल सके.
– बादल गण
मिट्टी के बने दीये को घर में जलाने की आवश्यकता है, यह शुभ माना जाता है, लोगों से प्लास्टिक के बने दीपक व अन्य समानों को छोड़ मिट्टी के बने सामानों का प्रयोग करना चाहिए.
मनोज पंडा
दीपावली के इस त्योहार में मिट्टी के दीये एवं भगवान गणेश एवं लक्ष्मी की मूर्ति का प्रयोग करें. इससे न केवल पर्यावरण शुद्ध रहेगा, बल्कि कुम्हारों का आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ होगी.
मनमोहन झा, सामाजिक कार्यकर्त्ता
मिट्टी के दीये जलाने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है, माता अपने भक्तों को आर्शीवाद प्रदान करती है. इस बार त्योहार में मिट्टी के दीये जलायें. जिससे आपके घर के साथ ही साथ कारीगरों के घर भी रोशन हो.
– देवीमुनी, मुखिया
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