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कल जहां बहती थी दूध की नदी, अब है वीरानी

Updated at : 05 Aug 2019 8:49 AM (IST)
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कल जहां बहती थी दूध की नदी, अब है वीरानी

गोविंदपुर : गोविंदपुर और बरवाअड्डा के बीच अवस्थित कौआबांध में कभी दूध की नदी बहती थी. जिले के कोने-कोने से लोग खांटी और सस्ता दूध के लिए कौआबांध आते थे. दूध के इस कारोबार में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से दस हजार लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई थी. परंतु अब यहां सन्नाटा पसरा रहता है. […]

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गोविंदपुर : गोविंदपुर और बरवाअड्डा के बीच अवस्थित कौआबांध में कभी दूध की नदी बहती थी. जिले के कोने-कोने से लोग खांटी और सस्ता दूध के लिए कौआबांध आते थे. दूध के इस कारोबार में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से दस हजार लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई थी. परंतु अब यहां सन्नाटा पसरा रहता है. कौआबांध के लोग ही अब दूध के लिए तरसते नजर आ रहे हैं.

1960 से लेकर 2012 तक यहां दूध का व्यवसाय चरम पर था. बिहार और उत्तर प्रदेश से कोलकाता के लिए दुधारु पशुओं का परिवहन ट्रकों के माध्यम से होता था. कौआबांध की पहचान मवेशी गाड़ियों के पड़ाव के रूप में थी. बिहार और उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों से गाय-भैंस लेकर चले ट्रक कौआबांध में रुकता था. इसके लिए यहां दर्जनों खटाल थे. मवेशियों के चारा-पानी की दुकानें थी.
ट्रक मरम्मत के गैरेज भी थे. बिचाली कटाई की मशीनें थीं. पशु व्यापारियों तथा ट्रकों के ड्राइवर खलासी को एवं अन्य लोगों के लिए यहां दर्जनों होटल में भी संचालित थे, जहां लोग भोजन करते थे. खटाल वाले पशु व्यापारियों को यहां सारी सुविधाएं उपलब्ध कराते थे. साथ ही हर तरह की सुरक्षा भी प्रदान करते थे.
कुछ लोग दुकानों से जीविकोपार्जन करते थे तो कुछ लोग खेतों से घास काटकर यहां लाते थे और बेचकर जीविकोपार्जन करते थे. पशु व्यापारी यहां ट्रक लगाकर मवेशियों को धोते तथा चारा देते थे. साथ ही मवेशी का दूध भी यहां दूहते थे. बड़ी संख्या में मवेशियों के आने के चलते काफी मात्रा में दूध की भी दुहाई होती थी.
स्वाभाविक रूप से यहां खांटी दूध सस्ता में मिलता था. दूध के इस धंधे में भी दर्जनों लोग लगे हुए थे. यहां से सस्ता दूध लेकर बाजार में बेच कर लाभ कमाते थे. आषाढ़ माह से लेकर अगहन माह तक यहां का व्यवसाय चरम पर होता था. शेष माह भी सामान्य कारोबार होता रहता था. यहां दूध के कारोबार से दर्जनों लोग झोंपड़ी से महल के मालिक बने हैं, परंतु वर्ष 2014 से दूध के धंधे पर यहां ग्रहण लग गया.
हरेराम सिंह, कमलेश सिंह, राम अयोध्या सिंह, भूलन सिंह, अजय सिंह, दुर्गा यादव, विजेंद्र सिंह, नागेश्वर सिंह, चंदन सिंह, श्रीकांत सिंह, प्यारेलाल साव, झारखंडी साव, फागूलाल साव, चंद्रिका यादव, शत्रुघ्न ठाकुर, जफर इकबाल, विमल यादव आदि के खटालों में मवेशी गाड़ियां अब नहीं लगती हैं. इन खटाला में सन्नाटा छाया हुआ है. इसके साथ ही दाना-भूसी, चोकर, बिचाली, राशन दुकान, गेराज, होटल, सैलून आदि दुकानें भी बंदी के कगार पर हैं. दूध के धंधे से जुड़े दर्जनों लोग बेरोजगार हो गये हैं.
सरकार बदली और व्यवसाय चौपट
केंद्र में सरकार बदलने के कुछ महीनों बाद ही एक बार यहां के खटालों से मवेशियों को लूट लिया गया. मवेशी तस्करी का आरोप लगाकर रातों रात खटालों से मवेशियों को जबरन ले जाया गया और मवेशी व्यापारी छाती पीटते रह गये. पुलिस प्रशासन चाह कर भी पशु व्यापारियों के साथ न्याय नहीं कर पाया.
इसके बाद से मवेशी व्यापारियों ने कौआबांध आना धीरे-धीरे बंद कर दिया. इस बवंडर के शांत होने के बाद कुछ गाड़ियां फिर से आने लगी, परंतु तथाकथित रक्षकों ने फिर से अड़ंगा शुरू कर दिया.
इससे मवेशी व्यापारियों ने अब रास्ता पूरी तरह बदल लिया है. जीटी रोड धनबाद होकर मवेशी गाड़ियों की आवाजाही लगभग बंद है और कोई गाड़ियां जाती हैं तो कौआबांध में नहीं ठहरती. यही कारण है कि कौआबांध का दूध व्यवसाय अब चौपट हो गया है. यहां के खटालो में सन्नाटा पसरा हुआ है.
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