अशिक्षा, कुरीति, भूख व कुपोषण के खिलाफ फिर हो हूल: डॉ रमेश
दुमका: सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय में हूल दिवस की पूर्व संध्या पर गुरुवार को संताल हूल और उसकी प्रासंगिकता पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसका उदघाटन बतौर अतिथि विनोबा भावे विश्वविद्यालय के कुलपति और अर्थशास्त्री प्रो डॉ रमेश शरण ने किया. प्रो शरण ने हूल के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए इस […]
दुमका: सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय में हूल दिवस की पूर्व संध्या पर गुरुवार को संताल हूल और उसकी प्रासंगिकता पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसका उदघाटन बतौर अतिथि विनोबा भावे विश्वविद्यालय के कुलपति और अर्थशास्त्री प्रो डॉ रमेश शरण ने किया. प्रो शरण ने हूल के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए इस बात पर जोर दिया कि किस तरह आज भी संतालपरगना क्षेत्र में हूल जैसी स्थिति बनी हुई है.
समता जजमेंट एवं भूरिया कमीशन का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह यहां के स्थानीय निवासियों की रजामंदी उनकी क्षेत्रीय विकास का ढांचा तैयार करने के लिए ज़रूरी है. उन्होंने एक नये हूल के लिए संतालपरगना के युवाओं से आगे आने की अपील की. कहा कि यह हूल हो नशापान के खिलाफ, अशिक्षा और कुरीति के खिलाफ, भूख और कुपोषण के खिलाफ. यह हूल हो सशक्त और सर्वोपरि ग्रामसभा के लिये. प्रो शरण ने कहा कि युवा आगे आयेंगे तो 162 साल पहले जो सपना अमरनायक सिदो कान्हू ने देखा था, वह सपना पूरा होगा और हूल के उद्देश्य पूरे होंगे.
सेमिनार की अध्यक्षता कर रहे वीसी प्रो मनोरंजन प्रसाद सिन्हा ने हूल को वैचारिक क्रांति की नींव बताया. कहा कि आज भी हूल प्रासंगिक है. हूल को नये नजरिये से देखने की जरूरत है. अब हमें हूल के उद्देश्यों को हासिल करना है. विश्वविद्यालय ने इसके बारे में सोचना प्रारंभ किया है. वीसी ने कहा कि सिदो कान्हू को यहां के लोग भगवान से कम नही मानते. क्योंकि उन्होंने अपने लिए नहीं समाज के लिए लड़ाई लड़ी थी. फोकस करते हुए इनके कृतित्व को सामने लाने की जरूरत है. आज हूल चाहिये, कलम से चाहिए. हूल की क्रांति को नई रचना मिलनी चाहिए. प्रो सिन्हा ने कहा कि हूल को हमने वो महत्त्व नही दिया, जो इसे दिया जाना चाहिए था. इतिहासकार और समाजशास्त्री इस पर चिंतन करें.
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