आस्था. पछिया हवा उठने से पहले सुबह की रसोई का कार्य खत्म करने की मिलती है सीख
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 15 Apr 2016 4:00 AM
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सद्भाव का अदभुत मिलन है सिरुआ पर्व मौसम के मिजाज के अनुरूप जीवन शैली में बदलाव लाने व आपसी सद्भाव को मजबूत बनाने वाला लोक पर्व सिरूआ(बैशाखी) गुरुवार को जिले भर में मनाया गया़ लोक मान्यता के अनुसार चैत मास के अंतिम सप्ताह से ही ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ होता है़ सुपौल/प्रतापगंज : मौसम के […]
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सद्भाव का अदभुत मिलन है सिरुआ पर्व
मौसम के मिजाज के अनुरूप जीवन शैली में बदलाव लाने व आपसी सद्भाव को मजबूत बनाने वाला लोक पर्व सिरूआ(बैशाखी) गुरुवार को जिले भर में मनाया गया़ लोक मान्यता के अनुसार चैत मास के अंतिम सप्ताह से ही ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ होता है़
सुपौल/प्रतापगंज : मौसम के मिजाज के अनुरूप जीवन शैली में बदलाव लाने व आपसी सद्भाव को मजबूत बनाने वाला लोक पर्व सिरूआ(बैशाखी) गुरुवार को जिले भर में मनाया गया़ लोक मान्यता के अनुसार चैत मास के अंतिम सप्ताह से ही ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ होता है़ तेज गरमी के साथ पछिया हवा प्राय: चलने लगती है़
क्षेत्र के अधिकांश घरों में रसोई बनाने का कार्य परंपरागत चूल्हे में ही किया जाता है़ ऐसे में पछिया हवा उठने से पहले सुबह ही रसोई बनाने का कार्य खत्म करने की सीख मिलती है़ इतना ही नहीं यह लोक उत्सव रसोई कार्य खत्म करने व चूल्हे को पानी से जुराने के बाद ही किसी को भोजन परोसने की इजाजत होता है, सिरूआ का त्योहार.
घर के आगे करते हैं जल का छिड़काव
सिरुआ त्योहार के मौके पर सभी बड़े बुजुर्ग अपने से छोटे लोगों के सिर पर जल रख दीर्घायु का आशीर्वाद देते हैं. वहीं सिर के ऊपर जल रखते ही लोग पांव छूकर आशीर्वाद प्राप्त करते है. साथ ही लोगों द्वारा अपने अपने घर के आगे सड़कों पर पानी का छिड़काव किया जाता है. यह त्योहार गरमी से राहत पाने का तरीका भी बतलाता है.
सिरूआ पर्व के दिन परिवार के सदस्य बाल्टी, लोटा आदि पानी भर कर सूर्योदय से पूर्व घर-आंगन में पानी का छिड़काव करते हुए बाहर निकलते है़ सिरूआ पर्व के माध्यम से इस मौसम में आने वाले खतरों का एहसास कराते है़
चैत माह के अंत में पकाये गये भोजन को बैशाख में खाने की परंपरा : इस त्योहार में चैत मास का बनाया रसोई बैसाख में खाया जाता है. मान्यता रही है कि सिरूआ पर्व में चैत्र मास का बनाया भोजन वैसाख में खाया जाता है़ साथ ही आम्र फल का पहली बार रसा स्वादन किया जाता है. लोक मान्यता के अनुसार इस लोक पर्व से पहले आम के टिकोले खाने से अभिभावक अपने-अपने बच्चों को मना करते है, लेकिन त्योहार के मौके पर आम के टिकोले की चटनी अनिवार्य रूप से बनाई जाती है़
जल से सिक्त करतीं हैं महिलाएं
रसोई निर्माण के बाद घर की बुजुर्ग महिला चूल्हा से लेकर घर के सदस्यों व घरों का आम के पल्लव द्वारा जल से सिक्त (जुराती हैं) करती है़ं इसके बाद ही परिवार के सदस्य के बीच भोजन परोसा जाता है़ घर के सदस्यों को भोजन कराने के बाद पूरे दिन आसपास के सगे-संबंधियों सहित अन्य लोगों को भोजन करवाने का भी रिवाज है, जो आपसी सद्भाव का संदेश देने के साथ इस लोक पर्व में मौसम को परखने व मौसम के अनुरूप कार्य शैली में बदलाव का रहस्य छिपा है़
कुछ खास सब्जियों का है महत्व
त्योहार के मौके पर खमरूआ, सहजन सहित सब्जी का भी लोग लुफ्त उठाते हैं. इस लोक पर्व के दिन सब्जी खाने के पीछे कई मान्यताएं रही है. इस कारण इस पर्व में सभी घरों में इसकी सब्जी बनती है़ इतना ही नहीं इस लोक पर्व में अधिक से अधिक प्रकार की सब्जियां बनती है़ अधिकांश घरों में भोजन में चावल-दाल ही बनाया जाता है. इस त्योहार को लेकर ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों के लोगों काफी उत्साह देखने को मिला.
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