नूतन वर्ष से जिले वासियों के हैं कई अरमान व उम्मीदें

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 11 Jan 2016 6:47 PM

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नूतन वर्ष से जिले वासियों के हैं कई अरमान व उम्मीदें ————–बीत गया साल, सपने रह गये अधूरे-जिले में समस्याओं का है अंबार- सरकार व जनप्रतिनिधियों के लिए इसे पूरा करना चुनौती- शिक्षा व उद्योग के मामले में काफी पिछड़ा है यह जिला-हजारों मजदूर प्रति दिन कर रहे हैं पलायन-12 साल बीत जाने के बावजूद […]

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नूतन वर्ष से जिले वासियों के हैं कई अरमान व उम्मीदें ————–बीत गया साल, सपने रह गये अधूरे-जिले में समस्याओं का है अंबार- सरकार व जनप्रतिनिधियों के लिए इसे पूरा करना चुनौती- शिक्षा व उद्योग के मामले में काफी पिछड़ा है यह जिला-हजारों मजदूर प्रति दिन कर रहे हैं पलायन-12 साल बीत जाने के बावजूद नहीं हुआ आमान परिवर्तन फोटो -8,9कैप्सन- अंग्रेज के जमाने में स्थापित छोटी रेल लाइन व उस पर दौड़ती ट्रेन अमरेंद्र, सुपौलनये साल के शुभारंभ के साथ ही जहां लोगों ने नयी जोश व उमंग के साथ नये संकल्प लिये हैं, वहीं नूतन वर्ष में जिले के कल्याण हेतु जिला वासियों के कई सपने व उम्मीदें भी हैं. जिन्हें इस वर्ष पूरा करना सरकार व जनप्रतिनिधियों के लिए चुनौती होगी. दरअसल जिला बनने के 24 साल बीत जाने के बावजूद सुपौल जिला आज भी कई मायनों में पिछड़ा है. कोसी प्रभावित इस जिले में बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है. हालांकि बीते वर्षों में कोसी कछार पर बसे इस जिले में कई बदलाव आये हैं. सड़कें चकाचक हुई. विशेष कर एनएच 57 फोर लेन बनने से बड़े शहरों से इसका जुड़ाव हुआ है.अस्पताल के हालात भी पहले से बेहतर हुए हैं. हालांकि वहां अब भी कई सुधार की दरकार है. शिक्षा के क्षेत्र में यह जिला राज्य स्तरीय सूची में निचले पायदान पर खड़ा है. वहीं कल-कारखाने व उद्योग की स्थापना नहीं होने से बेरोजगारी की समस्या मुंह बाये खड़ी है. रेल की समस्या से जिला वासी त्रस्त हैं. अंग्रेजों के जमाने की छोटी रेल लाइन आज भी यहां मौजूद हैं. रेल खंड के अधिकांश हिस्सों में मेगा ब्लॉक की वजह से यह सुविधा भी अब क्षीण हो गयी है.12 वर्ष बीत गये नहीं हुआ आमान परिवर्तन रेल का लंबित आमान परिवर्तन जिला वासियों की सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है. फारबिसगंज-सहरसा रेल खंड में अवस्थित इस जिले में अब भी छोटी रेल लाइन की ट्रेन दौड़ती है. 06 जून 2003 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने निर्मली में रेल महा सेतु व आमान परिवर्तन कार्य का शिलान्यास किया था. 2009 तक कार्य के पूर्ण होने का आश्वासन दिया गया था. रेल महा सेतु बन कर तैयार हो गया. लेकिन 12 साल बीत जाने के बावजूद आमान परिवर्तन कार्य अधूरा पड़ा है.मेगा ब्लॉक को बीत गये चार सालरेल मंत्रालय द्वारा आमान परिवर्तन हेतु वर्ष 2012 में राघोपुर और फारबिसगंज के बीच मेगा ब्लॉक किया गया था. लेकिन करीब चार साल बीत जाने के बावजूद इन स्टेशनों के बीच बड़ी रेल लाइन की पटरियां नहीं बिछ पायी. कार्य की गति भी इतनी सुस्त है कि अगर इस रफ्तार से काम चलता रहा तो अगले कई वर्षों तक इसके पूर्ण होने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती है. करीब दो माह पूर्व थरबिटिया से राघोपुर स्टेशन के बीच भी मेगा ब्लॉक कर दिया गया. नतीजतन अब छोटी लाइन की ट्रेन सहरसा से सुपौल होते महज थरबिटिया तक चलती है. मेगा ब्लॉक की वजह से सरायगढ़, राघोपुर, प्रतापगंज, ललितग्राम आदि स्थानों के लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ रही है.शिक्षा क्षेत्र में पिछड़ा है जिलाशिक्षा के क्षेत्र में सुपौल जिला राज्य स्तरीय सूची में काफी निचले पायदान पर खड़ा है.पड़ोसी जिलों में जहां बीते वर्षों में मेडिकल व इंजीनियरिंग कॉलेजों के साथ ही विश्व विद्यालय की स्थापना हो गयी, वहीं सुपौल जिला आज भी उच्च स्तरीय शिक्षण संस्थान की बाट जोह रहा है. विद्यालयी शिक्षा भी जर्जर है. सरकार के लाख प्रयासों के बाद भी 700 से अधिक विद्यालय भूमि व भवनहीन हैं.47 उच्च विद्यालयों को उच्चतर विद्यालयों में उत्क्रमित किया गया.लेकिन समुचित संसाधन उपलब्ध नहीं होने की वजह से अधिकांश विद्यालयों में प्लस टू की पढ़ाई नहीं हो रही है.परिणाम है कि मैट्रिक पास करने वाले हजारों छात्रों का स्थानीय कॉलेजों में दाखिला संभव नहीं हो पा रहा है.पलायन को विवश हैं मजदूरजिले में अब तक एक भी उद्योग व कल-कारखाने की स्थापना नहीं की जा सकी है. नतीजा है कि बेरोजगारी जिले की बड़ी समस्या बनी हुई है. हजारों मजदूर प्रतिदिन रोजगार की तलाश में अन्य प्रदेशों की ओर पलायन को विवश हैं.जबकि अकूत जल राशि से संपन्न इस जिले में कृषि व जल आधारित अनेक उद्योग की अपार संभावनाएं मौजूद हैं.रेफर सेंटर की भूमिका में है अस्पतालअन्य जिलों की भांति यहां के अस्पतालों में भी मुफ्त दवा आदि की सुविधा तो उपलब्ध करा दी गयी है. लेकिन चिकित्सक व स्वास्थ्य कर्मियों का घोर अभाव है.जिले में एक भी ट्रामा सेंटर नहीं है. वहीं जिला मुख्यालय स्थित सदर अस्पताल में अब तक ब्लड बैंक व सर्जरी की समुचित व्यवस्था नहीं की जा सकी है. संसाधन व सुविधा के अभाव में रोगियों का प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें रेफर कर चिकित्सक अपने कर्तव्य की इतिश्री कर रहे हैं.

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