या हसन, या हुसैन के नारों के साथ िनकला ताजिया जुलूस
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :14 Oct 2016 1:38 AM (IST)
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मुहर्रम. प्रखंडों के साथ ही शहर में कई स्थानों पर हुआ ताजिया का िमलान, प्रशासनिक अफसर व पुलिस भी रही मुस्तैद कैमरे की नजर से अखाड़ों के जुलूस सीतामढ़ी : ले में ताजिया का पर्व शांतिपूर्ण हो गया. ग्रामीण क्षेत्रों में बुधवार को तो शहर में गुरुवार को ताजिया का जुलूस निकाला गया. संबंधित अखाड़ा […]
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मुहर्रम. प्रखंडों के साथ ही शहर में कई स्थानों पर हुआ ताजिया का िमलान, प्रशासनिक अफसर व पुलिस भी रही मुस्तैद
कैमरे की नजर से अखाड़ों के जुलूस
सीतामढ़ी : ले में ताजिया का पर्व शांतिपूर्ण हो गया. ग्रामीण क्षेत्रों में बुधवार को तो शहर में गुरुवार को ताजिया का जुलूस निकाला गया. संबंधित अखाड़ा पर ताजिया का मिलान किया गया. उसके बाद संबंधित गांवों के लोग ताजिया लेकर लौट गये. इस दौरान विधि-व्यवस्था बनाये रखने को दंडाधिकारी व पुलिस पदाधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की गयी थी.
मेहसौल चौक पर ताजिया मिलान : खड़का, खैरवा, इस्लामपुर, चंडिहा, मधुबन, मुरलिया चक, जानकी स्थान, भवदेपुर, गुदरी बाजार व मिरचाइपट्टी के ताजिया का मिलान मेहसौल चौक पर हुआ. तब सुबह के करीब पांच बज रहे थे. वर्षों से मेहसौल चौक को अखाड़ा मानकर विभिन्न गांवों से ताजिया लाया जाता है. ताजिया जुलूस में बड़ी संख्या में लोग शामिल थे. सभी या हसन-या हुसैन बोल रहे थे. इसके माध्यम से यह संदेश दे रहे थे कि वे हजरत इमाम हुसैन के साथ है. कहा जाता हैं कि ताजिया जुलूस में शामिल लोग अपने को शहीद इमाम हुसैन का सेना मानते है. मौके पर एएसपी राजीव रंजन व नगर थानाध्यक्ष विशाल आनंद पुलिस बल के साथ मुस्तैद थे.
पर्व का तरीका अलग-अलग : शिया व सुन्नी समुदाय के लोग अलग-अलग तरीके से ताजिया का पर्व मनाते है. सुन्नी समुदाय के लोग ताजिया निकालते है. अखाड़ा पर ताजिया का मिलान करते है. अखाड़ा पर एक साथ आने के पीछे का मकसद यह है कि शहीद हुसैन को अहसास कराया जाता हैं कि कर्बला में उनकी मदद को हम सब आने को तैयार है.
जुलूस में लोग तरह-तरह के करतब भी करते है. इसके जरिये शहीद हुसैन को यह कहा जाता है कि वे लोग उनकी मदद को प्रशिक्षण ले रहे है. इधर, शिया समुदाय के लोग अपने शरीर को जख्मी कर लेते है. युवकों द्वारा खुद की शरीर पर यह कहते हुए चाकू से प्रहार कर जख्मी कर लिया जाता है कि ‘या हुसैन हम नहीं थे.’ यानी युवकों का कहना होता है कि वे सब कर्बला में होते तो हजरत इमाम हुसैन को शहीद होने से बचा लेते.
10 दिनों का मुहर्रम पर्व : इमाम हुसैन की शहादत की याद में हीं मुसलिम समुदाय के लोग मुहर्रम के 10 दिनों तक शोक मनाते हैं. इस दौरान गम से भरी गीत गाते हैं. साथ हीं करबला की यादों से जुड़ी बातों को एक-दूसरे से शेयर करते हैं. हदीश में कहा गया है कि उक्त 10 दिनों तक महिलाओं को चूड़ी व नये कपड़े तक नहीं पहनना है. पुरूषों का शराब पीने पर रोक है. इस तरह की अन्य कई चीजें वर्जित है. इधर, लोकसभा युवा कांग्रेस के अध्यक्ष मो अंजारूल हक तौहिद के नेतृत्व में पार्टी नेताओं व कार्यकर्ताओं ने एक-एक कर सभी अखाड़े पर जा कर लोगों से शांतिपूर्ण तरीके से पर्व मनाने की अपील की. ताजिया जुलूस में भी शामिल हुये.
श्री तौहिद के साथ अमजद राइन, रणधीर कुमार चौधरी, मजहर खां, सुमन कुमार, मो फैयाज, संजय कुमार, सुरेंद्र सिंह, मो उस्मान व सत्येंद्र सिंह सत्यवादी भी थे. रात में कांग्रेस अध्यक्ष विमल शुक्ला ने भी विभिन्न अखाड़ों पर जा कर लोगों से विधि-व्यवस्था बनाये रख पर्व मनाने की अपील की.
रोजा रखा, गरीबों की मदद की
अल्पसंख्यक एकता मंच की एक बैठक मदनी मुसाफिरखाना में मंच के संस्थापक मो तनवीर अहमद की अध्यक्षता में हुई. बैठक में कहा गया कि मुहर्रम में रोजा रखा गया और इमाम हुसैन की याद में गरीबों को मदद की गयी. विभिन्न गांवों में मिलन समारोह हुआ. मौके पर जिलाध्यक्ष बच्चू मस्तान, युवा जिलाध्यक्ष मो शाहिद मंसूरी, जिला छात्र अध्यक्ष मुन्ना भाई, अब्दुल कादिर, मो मेराज, प्रो ज्याउल्लाह व शम्मी अहमद मंसूरी समेत अन्य मौजूद थे.
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