जलजमाव से अगले साल निदान

Published at :27 Aug 2016 7:27 AM (IST)
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जलजमाव से अगले साल निदान

बारिश के बाद जलजमाव व उससे परेशानी के बाद ही जनप्रतिनिधियों को ड्रेनेज सिस्टम की याद आती है. बर्षों की मांग व टाल-मटोल के बाद स्टीमेट बनाने का काम चल रहा है. एक महीने में काम शुरू होने की संभावना जतायी जा रही है. सहरसा : बारिश कम हो रही है. पिछले पंद्रह दिनों से […]

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बारिश के बाद जलजमाव व उससे परेशानी के बाद ही जनप्रतिनिधियों को ड्रेनेज सिस्टम की याद आती है. बर्षों की मांग व टाल-मटोल के बाद स्टीमेट बनाने का काम चल रहा है. एक महीने में काम शुरू होने की संभावना जतायी जा रही है.

सहरसा : बारिश कम हो रही है. पिछले पंद्रह दिनों से गरमी परवान पर है. बारिश की आस से निराश हो चुके लोगों को पिछली रात हुई थोड़ी-सी बारिश से थोड़ा सकून जरूर मिला. लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि बारिश अब अपने अंतिम चरण में है. हर बारिश में जलजमाव स्थायी समस्या है. इसके निराकरण के लिए अभी से ही लग जाना होगा. फिलहाल शहर की सभी मुख्य सड़कें सहित गली मोहल्ले की सड़क जलजमाव से प्रभावित हैं.

अधिकांश लोगों को घर से निकलने तक में परेशानी होने लगी है. घरों में घुसे पानी को निकालने के लिए कारगर नाले व उसे सुचारु रूप से चलाने वाले ड्रेनेज सिस्टम की व्यवस्था लाजिमी है. लेकिन स्थानीय जनप्रतिनिधियों, नगर परिषद व जिला प्रशासन का इस अोर ध्यान नहीं है. शहर में वाटर ड्रेनेज सिस्टम बनाने की मांग एक दशक से हो रही है.

धीरे-धीरे स्थिति और भयावह होती जा रही है. लेकिन जिम्मेदार और शहर की जबावदेही तय करने वाले अधिकारियों का हाल ऐसा है कि एक बार तैयार हुआ सर्वे और डीपीआर, तय समय पर नहीं पहुंच पाया. और वह प्रोपोजल फेल हो गया. इसे दुबारा शुरू करवाया गया. जिसमें पिछले तीन सालों से लगातार स्टीमेट बनाने जैसे आश्वासन दिये जा रहे हैं, लेकिन नतीजा सिफर है.

बारिश अौर आश्वासन

वाटर ड्रेनेज सिस्टम नहीं होने के कारण जलनिकासी नहीं हो पाती है. नतीजा थोड़ी सी बारिश हुई नहीं, कि पूरे शहर की सड़कों पर तालाब जैसा नजारा होता है. पैदल चलने लायक तक जगह नहीं बचती. पिछले कई सालों से चले मंथन के बाद आठ वर्ष पूर्व शहर के लिए वाटर ड्रेनेज सिस्टम की परिकल्पना को साकार करने की कोशिश तत्कालीन विधायक द्वारा की गयी थी.

अधिकारियों सहित शहर के जनप्रतिनिधियों व बुद्धिजीवियों को बुला कर मास्टर प्लान बताया गया और नक्शा भी दिखाया गया. लोगों में आस बंधी कि अब शहर को जल जमाव से मुक्ति मिल जायेगी और सुंदरता के मामले में भी शहर निखर उठेगा. लेकिन सरकारी कामों की प्रचलित मान्यतों के अनुसार अब तक ऐसा कुछ नहीं हो पाया.

कौन है दोषी?

दो वर्ष पूर्व तक ड्रेनेज निर्माण की दिशा में विभागों के बीच हो रही खींचातानी से लगता था कि अभी इस पर काम होना मुश्किल है. मालूम हो कि पूर्व में बिहार सरकार के नगर विकास विभाग द्वारा शहर में जल निकासी की योजना बनायी गयी थी. इसके क्रियान्वयन की जिम्मेवारी स्थानीय पीएचइडी विभाग को दी गयी थी. इसके बाद विभाग द्वारा दिल्ली की एक कंपनी के माध्यम से शहर में सर्वे करा सिस्टम को चालू करवाने के लिए डीपीआर भी तैयार करवाया गया था. इसके बावजूद ड्रेनेज सिस्टम का काम शुरू नहीं हो पाया.

मालूम हो कि इस योजना को पूरा करने के लिए एनडीए एक के शासन में एक करोड़ छियालीस लाख की राशि भी विभाग द्वारा आवंटित कर दी गयी थी. फिलहाल नगर परिषद के अधीन यह कार्य आश्वासन से आगे बढ़ पाया है, ऐसा प्रतीत नहीं होता.

कहां जायेगा पानी

पिछली बार हुए सर्वे में यह तय किया गया था कि बारिश एवं नालियों के पानी को निकालने के लिए शहर के पश्चिम दिशा से निकलने वाले जल को मोरकाही के रास्ते बैजनाथपुर के निकट तिलावे नदी में गिराया जायेगा. वहीं पूरब दिशा से निकलने वाले जल को नरियार नहर के रास्ते महिडगरा घाट के निकट धेमुरा नदी में छोड़ा जायेगा.

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