भाषाओं की सीमा लांघ धर्मनिरपेक्षता का उदाहरण बन रही है खुशबू

Updated at : 07 Aug 2018 6:04 AM (IST)
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भाषाओं की सीमा लांघ धर्मनिरपेक्षता का उदाहरण बन रही है खुशबू

ओस्तानियां, फोकानिया, मौलवी की परीक्षा पास करने के बाद कर रही है आलिम मां-बाप के बाद पति भी उर्दू से पढ़ाई करने में दे रहे हैं साथ मधेपुरा के मधेली में ब्याही गयी है, उर्दू की व्याख्याता बनना है लक्ष्य सहरसा : हिंदी साहित्य के महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद और देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ […]

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ओस्तानियां, फोकानिया, मौलवी की परीक्षा पास करने के बाद कर रही है आलिम

मां-बाप के बाद पति भी उर्दू से पढ़ाई करने में दे रहे हैं साथ
मधेपुरा के मधेली में ब्याही गयी है, उर्दू की व्याख्याता बनना है लक्ष्य
सहरसा : हिंदी साहित्य के महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद और देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने अपनी पढ़ाई उर्दू से ही शुरू की थी. लेकिन बाद में उन्होंने हिंदी को अपना लिया था. हालांकि इन दोनों महापुरुषों को अंत-अंत तक उर्दू व फारसी भाषाओं का बखूबी ज्ञान था. इनके बाद हिंदी भाषी छात्र-छात्राओं का उर्दू भाषा में दिलचस्पी काफी कम हो गयी. ऐसे उदाहरण यदा-कदा ही सामने आये. लेकिन सुपौल जिले की खुशबू भाषाओं की सीमा लांघ धर्मनिरपेक्षता की उदाहरण बन चुकी है. फर्क इतना है कि प्रारंभ से यह हिंदी भाषी छात्रा थी. लेकिन आठवीं से यह हिंदी को त्याग पूर्ण रूप से उर्दू की छात्रा हो गयी.
रुचि जगी तो उर्दू को अपना लिया
सुपौल जिले के त्रिवेणीगंज प्रखंड के महेशुआ गांव निवासी बेचू साह व रंजू देवी की पुत्री खुशबू बचपन से हिंदी की छात्रा रही थी. सातवीं कक्षा तक वह हिंदी माध्यम के स्कूलों से ही पढ़ाई की. उसके घर के आसपास दो-तीन मुस्लिम परिवार रहते थे. जिनके यहां खुशबू के परिवार का आना-जाना था. आते-जाते खुशबू उस घर के बच्चों को उर्दू पढ़ते व लिखते देखती थी. इसे भी उर्दू सीखने की इच्छा हुई और उन बच्चों के साथ पहले अलीफ, बे, ते, से… सीखना शुरू किया. कुशाग्र बुद्धि की खुशबू की रुचि उस भाषा में जगने लगी और शीघ्र ही वह उर्दू पढ़ना और लिखना सीख गयी. माता-पिता की अनुमति लेकर आठवीं की पढ़ाई के लिए त्रिवेणीगंज के ही बलोखरी मदरसा में नामांकन ली. वहां वह अकेली हिंदू लड़की थी. लेकिन उस पर धर्म नहीं पढ़ाई का नशा सवार था. ओस्तानियां (आठवीं) की परीक्षा में वह अपनी कक्षा में अव्वल आयी.
पति ने कराया आलीम में नामांकन
हाइस्कूल की पढ़ाई के लिए खुशबू मल्हनी मदरसे में नाम लिखवायी और दो साल पढ़ते हुए खुशबू ने वहीं से फोकानिया (मैट्रिक) किया. अच्छे अंकों से पास होते जाने के कारण खुशबू का हौंसला बढ़ता चला गया और मौलवी यानी इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए वह थरबीटिया मदरसे में नामांकित हुई. इसमें भी वह अव्वल दर्जे से पास हुई. मौलवी करने के बाद साल 2015 में खुशबू की शादी मधेपुरा जिले के मधेली गांव निवासी अनिल कुमार से हुई. जो पंजाब के पाटियाला कोर्ट में क्लर्क हैं. शादी के बाद जब उन्हें अपनी पत्नी के उर्दू छात्रा होने की जानकारी हुई तो काफी खुश हुए. उन्होंने उससे आगे की पढ़ाई जारी रखने को कहा. पति ने ही खुशबू का नामांकन मधेपुरा के सरबेला मदरसा में आलीम की पढ़ाई के लिए करा दिया. खुशबू इस बार आलीम प्रथम वर्ष की परीक्षा दे रही है. वह पूरे केंद्र पर आलीम की परीक्षा देने वाली एक मात्र हिंदू छात्रा है. खुशबू ने बताया है कि भाषा किसी धर्म के बंधन में नहीं है. वह जिस भी मदरसे में पढ़ी. वहां अकेली हिंदू छात्रा थी. उसे अभी और आगे बढ़ना है. वह आलीम के बाद फाजिल भी करेगी. फिर उर्दू का व्याख्याता बनने का प्रयास करेगी.
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